समाज

“दोष का दर्पण:  हर बुराई के लिए केवल सरकार को जिम्मेदार ठहराना ठीक” ?

डॉ. शैलेश शुक्ला 

हमारे समय की सबसे सुविधाजनक आदतों में से एक यह है कि हम अपनी लगभग हर परेशानी, हर असुविधा और हर असफलता के लिए सीधे सरकार की ओर उंगली उठा देते हैं। सड़क टूटी है—सरकार दोषी। अस्पताल में भीड़ है—सरकार दोषी। शिक्षा का स्तर गिरा है—सरकार दोषी। समाज में हिंसा बढ़ी है—सरकार दोषी। इस तरह देखते-देखते सरकार हमारे जीवन की हर छोटी-बड़ी समस्या का एकमात्र कारण घोषित कर दी जाती है। यह दृष्टिकोण सुनने में जितना सरल लगता है, उतना ही अधूरा और कई बार भ्रामक भी होता है क्योंकि इससे हम अपने स्वयं के दायित्वों से बच निकलते हैं और समस्या के वास्तविक स्वरूप को समझने से चूक जाते हैं।

यह सच है कि सरकार का दायित्व बहुत व्यापक होता है। वह कानून बनाती है, नीतियाँ तय करती है, प्रशासनिक व्यवस्था चलाती है और नागरिकों के लिए आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास करती है परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि सरकार कोई अलग से आकाश से उतरी हुई सत्ता नहीं होती बल्कि वही समाज का एक रूप होती है। जिन लोगों को हम चुनते हैं, वही हमारे प्रतिनिधि बनकर शासन चलाते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो सरकार और समाज के बीच कोई दीवार नहीं है बल्कि दोनों एक-दूसरे का प्रतिबिंब हैं। यदि समाज में जागरूकता, अनुशासन और नैतिकता का स्तर ऊँचा होगा तो उसका असर शासन में भी दिखाई देगा और यदि समाज स्वयं लापरवाह, स्वार्थी और उदासीन होगा तो सरकार से पूर्णता की अपेक्षा करना यथार्थ से आँखें मूँदने जैसा है।

समाज की अनेक समस्याएँ ऐसी हैं जिनका जन्म स्वयं नागरिकों के आचरण से होता है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाना, यातायात नियमों की अनदेखी करना, कर न देना, अफवाहें फैलाना, छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए रिश्वत देना—ये सब ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं जो किसी नीति की कमी से नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यवहार से उत्पन्न होती हैं। सरकार नियम बना सकती है, दंड का प्रावधान कर सकती है, परंतु वह हर व्यक्ति के पीछे खड़ी होकर उसे सही आचरण के लिए विवश नहीं कर सकती। यदि नागरिक स्वयं नियमों का पालन करने के प्रति सजग नहीं होंगे, तो केवल सरकार को दोष देना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि समस्या को और गहरा करना है।

स्वच्छता का उदाहरण अत्यंत स्पष्ट है। हम चाहते हैं कि हमारे शहर साफ-सुथरे हों, नालियाँ स्वच्छ हों, सड़कें चमकती रहें लेकिन जब वही नागरिक घर का कूड़ा सड़क पर फेंक देते हैं, प्लास्टिक का उपयोग बिना सोचे-समझे करते हैं, और सार्वजनिक स्थानों को अपना नहीं समझते, तब समस्या पैदा होती है। बाद में उसी समस्या के लिए सरकार को दोष देना एक प्रकार का आत्मविरोध है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने छोटे-छोटे कर्तव्यों का पालन करे, तो अनेक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं।

सामाजिक कुरीतियों के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। दहेज प्रथा, लिंग भेदभाव, जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास—ये सभी ऐसी समस्याएँ हैं जिनके विरुद्ध कानून मौजूद हैं परंतु ये पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। इसका कारण यह है कि इन कुरीतियों को समाज के एक हिस्से का समर्थन मिलता रहता है। यदि लोग स्वयं इन प्रथाओं को स्वीकार करते रहेंगे तो केवल कानून बन जाने से परिवर्तन संभव नहीं होगा। सरकार दंड दे सकती है परंतु मानसिकता में परिवर्तन समाज के भीतर से ही आता है। जब तक समाज स्वयं इन बुराइयों के विरुद्ध खड़ा नहीं होगा, तब तक केवल सरकार को दोष देने से कोई ठोस परिणाम नहीं निकलेगा।

शिक्षा के क्षेत्र में भी समाज और परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यालय और महाविद्यालय ज्ञान प्रदान कर सकते हैं परंतु जीवन के मूल संस्कार—ईमानदारी, अनुशासन, सहानुभूति, परिश्रम—ये सब घर और समाज से ही आते हैं। यदि परिवार बच्चों को जिम्मेदारी का पाठ नहीं पढ़ाते, यदि समाज में अच्छे आचरण का सम्मान नहीं होता, तो केवल शिक्षा व्यवस्था से आदर्श नागरिकों की अपेक्षा करना उचित नहीं है। आज जब हम बच्चों में अनुशासन की कमी या सामाजिक संवेदनशीलता के अभाव की बात करते हैं, तो यह भी देखना आवश्यक है कि हमने उन्हें क्या वातावरण दिया है।

लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका केवल मतदान तक सीमित नहीं होती। मतदान एक महत्वपूर्ण अधिकार है, परंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है जागरूकता और विवेकपूर्ण निर्णय। यदि नागरिक केवल भावनाओं, जातीय या धार्मिक पहचान के आधार पर निर्णय लेते हैं, तो बाद में नीतियों की गुणवत्ता पर प्रश्न उठाना एक प्रकार का विरोधाभास बन जाता है। इसके अतिरिक्त, समाज की उदासीनता भी एक बड़ी समस्या है। यदि लोग स्थानीय मुद्दों पर ध्यान नहीं देते, जनहित के कार्यों में भागीदारी नहीं करते, तो शासन की जवाबदेही भी कमज़ोर पड़ जाती है। एक सक्रिय और जागरूक समाज ही एक उत्तरदायी सरकार को जन्म देता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि सरकार के सामने अनेक सीमाएँ और चुनौतियाँ होती हैं। विशाल जनसंख्या, संसाधनों की कमी, विविधता, प्रशासनिक जटिलताएँ—इन सबके बीच हर समस्या का त्वरित समाधान संभव नहीं होता। कई बार नीतियाँ अच्छी होती हैं, परंतु उनका क्रियान्वयन कमजोर पड़ जाता है। ऐसे में यदि समाज सहयोग करे, सामूहिक प्रयास करे, तो समाधान अधिक प्रभावी हो सकता है। लेकिन यदि हर समस्या के लिए केवल सरकार को ही जिम्मेदार माना जाए, तो यह सहयोग की भावना को कमज़ोर करता है।

आज के समय में सूचना के साधनों के विस्तार ने सरकार की आलोचना को बहुत आसान बना दिया है। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक भी है, क्योंकि इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है। परंतु जब आलोचना एकतरफा हो जाती है और समाज की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है, तब यह संतुलन बिगड़ जाता है। हर समस्या को केवल सरकार की विफलता बताना एक सरल समाधान है, परंतु यह वास्तविकता की जटिलताओं को नहीं समझता।

समाज के रूप में हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम केवल अधिकारों के उपभोक्ता नहीं हैं बल्कि कर्तव्यों के पालनकर्ता भी हैं। यदि हम अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं और केवल अधिकारों की मांग करते हैं, तो संतुलन बिगड़ जाता है। एक स्वस्थ समाज वही है, जहाँ नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हों और सरकार अपने दायित्वों के प्रति उत्तरदायी हो।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि समाज और सरकार अलग-अलग इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि एक ही व्यवस्था के दो पहलू हैं। यदि हम हर समस्या के लिए केवल सरकार को दोष देते रहेंगे, तो हम स्वयं को सुधारने का अवसर खो देंगे। समस्याओं का वास्तविक समाधान तभी संभव है, जब हम दोषारोपण से आगे बढ़कर अपनी भूमिका को समझें और उसे निभाएँ। जब समाज और सरकार दोनों अपने-अपने दायित्वों का संतुलित रूप से पालन करेंगे, तभी एक न्यायपूर्ण, समृद्ध और संतुलित व्यवस्था का निर्माण संभव होगा।

डॉ. शैलेश शुक्ला