आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
हिमालय एशिया में स्थित एक सर्वाधिक प्राचीन पर्वत-शृंखला है। इसको ‘पर्वतराज’ हिमालय भी कहते हैं, जिसका अर्थ है – पर्वतों का राजा । कालिदास तो हिमालय को पृथ्वी का मानदंड मानते हैं। हिमालय की पर्वत श्रंखलाएँ शिवालिक कहलाती हैं। सदियों से हिमालय की कन्दराओं (गुफाओं) में ऋषि-मुनियों का वास रहा है और वे यहाँ समाधिस्थ होकर तपस्या करते रहे हैं । हिमालय आध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र रहा है। हिमालय एक पर्वत तन्त्र है जो भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया और तिब्बत से अलग करता है।
चार श्रेणियों में हिमालय की भू-आकृतियों का विभाजन
हिमालय पर्वत तन्त्र को तीन मुख्य श्रेणियों के रूप में विभाजित किया जाता है जो पाकिस्तान में सिन्धु नदी के मोड़ से लेकर अरुणाचल के ब्रह्मपुत्र के मोड़ तक एक-दूसरे के समानान्तर पायी जाती हैं। चौथी गौड़ श्रेणी असतत है और पूरी लम्बाई तक नहीं पायी जाती है। यह पर्वत तन्त्र मुख्य रूप से चार समानांतर श्रेणियां ये चार श्रेणियाँ हैं-
(क) परा-ट्रांस- हिमालय
परा हिमालय जिसे ट्रांस हिमालय या टेथीज हिमालय भी कहते हैं, यह हिमालय की सबसे प्राचीन श्रेणी है। यह कराकोरम श्रेणी, लद्दाख श्रेणी और कैलाश श्रेणी के रूप में हिमालय की मुख्य श्रेणियों और तिब्बत के बीच स्थित है। इसका निर्माण टेथीज सागर के अवसादों से हुआ है। इसकी औसत चौड़ाई लगभग 40 किमी है। यह श्रेणी इण्डस-सांपू-शटर-ज़ोन नामक भ्रंश द्वारा तिब्बत के पठार से अलग है।
(ख) महान हिमालय
महान हिमालय जिसे हिमाद्रि भी कहा जाता है हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है। इसके क्रोड में आग्नेय शैलें पायी जाती है जो ग्रेनाइट तथा गैब्रो नामक चट्टानों के रूप में हैं। पार्श्वों और शिखरों परअवसादी शैलों का विस्तार है। कश्मीर की जांस्कर श्रेणी भी इसी का हिस्सा मानी जाती है। हिमालय की सर्वोच्च चोटियाँ मकालू, कंचनजंघा, एवरेस्ट, अन्नपूर्ण और नामचा बरवा इत्यादि इसी श्रेणी का हिस्सा हैं। यह श्रेणी मुख्य केन्द्रीय क्षेप द्वारा मध्य हिमालय से अलग है। यद्यपि पूर्वी नेपाल में हिमालय की तीनों श्रेणियाँ एक दूसरे से सटी हुई हैं।
(ग) मध्य लघु या मध्य हिमालय
हिमालय पर्वत का वह भाग जो महान हिमालय के दक्षिण सामानान्तर तक फैला हुआ है, लघु हिमालय कहलाता है। इस चाप का उभार दक्षिण की ओर अर्थात उत्तरी भारत के मैदान की ओर है और केन्द्र तिब्बत के पठार की ओर है। यह अंचल मध्य हिमालय या हिमाचल हिमालय के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में यह मध्य हिमालय ही है। लघु हिमालय 80 से 100 किलोमीटर चौड़ाई में फैला हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 1628 मीटर से लेकर 3000 मीटर है। इसकी अधिकतम ऊँचाई 4500 मीटर है।
मध्य हिमालय हिमालय के दक्षिण में स्थित है। महान हिमालय और मध्य हिमालय के बीच दो बड़ी और खुली घाटियाँ पायी जाती है – पश्चिम में काश्मीर घाटी और पूर्व में काठमाण्डू घाटी। जम्मू-कश्मीर में इसे पीर पंजाल, हिमाचल में धौलाधार, उत्तराखंड में मस्सोरी या नागटिब्बा तथा नेपाल में महाभारत श्रेणी के रूप में जाना जाता है।
(घ) शिवालिक परा या ट्रांस हिमालय
उपरिवर्णित तीन मुख्य श्रेणियों केआलावा चौथी और सबसे उत्तरी श्रेणी को परा हिमालय या ट्रांस हिमालय कहा जाता है जिसमें कराकोरम तथा कैलाश श्रेणियाँ शामिल है। यह शिवालिक से मिलकर बना है जो पश्चिम से पूर्व की ओर एक चाप की आकृति में लगभग 2500 कि॰मी॰ की लम्बाई में फैली हैं। शिवालिक श्रेणी को बाह्य हिमालय या उप हिमालय भी कहते हैं। यहाँ सबसे नयी और कम ऊँची चोटी है। पश्चिम बंगाल और भूटान के बीच यह विलुप्त है बाकी पूरे हिमालय के साथ समानांतर पायी जाती है। अरुणाचल में मिरी, मिश्मी और अभोर पहाड़ियां शिवालिक का ही रूप हैं। शिवालिक और मध्य हिमालय के बीच दून घाटियाँ पायी जाती हैं।
हिमालय पर्वत 7 देशों की सीमाओं में फैला हुआ हैं। ये देश हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, चीन और म्यांमार।
प्रादेशिक विभाजन
अनेक भू–वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय को पांच क्षैतिज प्रदेशों में बाँटा है।
कश्मीर हिमालय – सिन्धु नदी से सतलुज नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
कुमाऊँ हिमालय – सतलुज से काली नदी (सरयू) के बीच के भाग को कहा जाता है।
नेपाल हिमालय – सरयू नदी से कोसी नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
बंगाल हिमालय – कोसी नदी से मानस नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
असम हिमालय – मानस नदी से ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक के भाग को कहा जाता है।
100 सर्वोच्च शिखर
संसार की अधिकांश ऊँची पर्वत चोटियाँ हिमालय में ही स्थित हैं। विश्व के 100 सर्वोच्च शिखरों में हिमालय की अनेक चोटियाँ हैं। विश्व का सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट हिमालय का ही एक शिखर है। हिमालय में 100 से ज्यादा पर्वत शिखर हैं
दुनिया में कम से कम 109 चोटियां ऐसी है जिनकी ऊंचाई समुद्र तल से ऊंचाई 7200 मीटर से ज्यादा है। इनमें से अधिकांश चोटियां हिमालय क्षेत्र में हैं। इनमें दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट भी शामिल है। हिमालय के कुछ प्रमुख शिखरों में सबसे महत्वपूर्ण सागरमाथा हिमालय, अन्नपूर्णा, शिवशंकर, गणेय, लांगतंग, मानसलू, रॊलवालिंग, जुगल, गौरीशंकर, कुंभू, धौलागिरी और कंचनजंघा है। कुछ प्रमुख शिखरों की ऊंचाई इस प्रकार है –
माउंट एवरेस्ट : 8848.86 मीटर
के – 2 : 8611 मीटर
कंचनजंघा : 8,586
लहोस्ते : 8,516
मकालू : 8,463
15 हजार हिमनद
हिमालय श्रेणी में 15 हजार से ज्यादा हिमनद हैं जो 12 हजार वर्ग किलॊमीटर में फैले हुए हैं। 72 किलोमीटर लंबासियाचिन हिमनद विश्व का दूसरा सबसे लंबा हिमनद है। हिमालय की कुछ प्रमुख नदियों में शामिल हैं – सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और यांगतेज।
सांस्कृतिक हिमालय
हिमालय भारतभूमि का अभिभावक है। वैदिक काल से ही हिमालय के पर्वतों की महिमा का उल्लेख होता आया है। यह भारत की पवित्र नदियों गंगा तथा यमुना का उद्गम स्थल भी है। मानसरोवर और कैलास में भारत के प्राण बसते हैं। दोनों भारत के अनादि इतिहास से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। मानसरोवर’मानस-सरोवर’ का संक्षेपण है जो तिब्बत में स्थित एक झील है, और इसकी कुछ दूरी पर स्थित है – कैलास पर्वत। इसे कुबेर का वैभवपूर्ण निवास और शिव का स्वर्ग माना जाता है। कैलास हिमालय पर्वतमाला में स्थित है और मानसरोवर झील के उत्तर में सबसे ऊँची चोटियों में से एक माना जाता है। कैलास जैसे पावन पुष्करिणी समावृत अनन्त सौंदर्यप्रिय पर्वत का गुणगान संस्कृत साहित्य में प्रचुर हुआ है। यह शुभ्र पर्वत शिव और पार्वती का क्रीडा-स्थल है। इसे संस्कृत साहित्य में भगवान शिव का मुक्त अट्टहास कहा गया है।
अमरकोष में कैलास की व्युत्पत्ति इस प्रकार बताई गई है –” के जले लासो लसनमस्य केलासः स्फटिकः तस्यायं कैलासः” = जो जल के मध्य स्फटिक के समान विद्यमान हो, वह कैलास है।
रत्नों का जन्मदाता
‘हिमालय अनेक रत्नों का जन्मदाता है “अनन्तरत्न प्रभवस्य यस्य”, उसकी पर्वत-शृंखलाओं में जीवन औषधियाँ उत्पन्न होती हैं। “ भवन्ति यत्रौषधयो रजन्याय तैल पुरत सुरत प्रदीपः”, वह पृथ्वी में रहकर भी स्वर्ग है। “भूमिर्दिवभि वारूढं।”
धार्मिक स्थल
हिमालय में कुछ महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल भी हैं। इनमें हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, देव प्रयाग, ऋषिकेश, कैलाश, मानसरोवर तथा अमरनाथ,शाकम्भरी प्रमुख हैं। भारतीय ग्रंथ गीता में भी इसका उल्लेख मिलता है।
राष्ट्रकवि श्री दिनकर की अभिव्यंजना
भारत के राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह “दिनकर” ने हिमालय की महत्ता इन शब्दों में व्यक्त किया है –
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
साकार, दिव्य, गौरव विराट्,
पौरूष के पुन्जीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम-किरीट!
मेरे भारत के दिव्य भाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त,
युग-युग गर्वोन्नत, नित महान,
निस्सीम व्योम में तान रहा
युग से किस महिमा का वितान?
कैसी अखंड यह चिर-समाधि?
यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान?
तू महाशून्य में खोज रहा
किस जटिल समस्या का निदान?
उलझन का कैसा विषम जाल?
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
ओ, मौन, तपस्या-लीन यती!
पल भर को तो कर दृगुन्मेष!
रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल
है तड़प रहा पद पर स्वदेश।
सुखसिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र,
गंगा, यमुना की अमिय-धार
जिस पुण्यभूमि की ओर बही
तेरी विगलित करुणा उदार,
जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त
सीमापति! तू ने की पुकार,
‘पद-दलित इसे करना पीछे
पहले ले मेरा सिर उतार।’
उस पुण्यभूमि पर आज तपी!
रे, आन पड़ा संकट कराल,
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे
डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल।
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
कितनी मणियाँ लुट गईं? मिटा
कितना मेरा वैभव अशेष!
तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर
वीरान हुआ प्यारा स्वदेश।
वैशाली के भग्नावशेष से
पूछ लिच्छवी-शान कहाँ?
ओ री उदास गण्डकी! बता
विद्यापति कवि के गान कहाँ?
तू तरुण देश से पूछ अरे,
गूँजा कैसा यह ध्वंस-राग?
अम्बुधि-अन्तस्तल-बीच छिपी
यह सुलग रही है कौन आग?
प्राची के प्रांगण-बीच देख,
जल रहा स्वर्ण-युग-अग्निज्वाल,
तू सिंहनाद कर जाग तपी!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिर हमें गाण्डीव-गदा,
लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
कह दे शंकर से, आज करें
वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे,
‘हर-हर-बम’ का फिर महोच्चार।
ले अंगडाई हिल उठे धरा
कर निज विराट स्वर में निनाद
तू शैलीराट हुँकार भरे
फट जाए कुहा, भागे प्रमाद
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद
रे तपी आज तप का न काल
नवयुग-शंखध्वनि जगा रही
तू जाग, जाग, मेरे विशाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!!
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी