राम शर्मा
भारत की अर्थव्यवस्था की चर्चा जब भी होती है, तो तेज आर्थिक विकास, बढ़ती प्रति व्यक्ति आय, डिजिटल क्रांति और उपभोग के विस्तार को उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। देश का मध्यवर्ग आज आय बढ़ने के बावजूद आर्थिक दबाव महसूस कर रहा है। उसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि आमदनी बढ़ने की रफ्तार और जीवन की आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं की लागत के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है।
मध्यवर्ग भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यही वर्ग शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, वाहन, बीमा, बैंकिंग, पर्यटन और उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को गति देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसी वर्ग की आर्थिक प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। पहले जहां परिवार बचत को आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार मानता था, वहीं अब आय का बड़ा हिस्सा घर चलाने, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास की ईएमआई, बीमा, परिवहन और डिजिटल सेवाओं पर खर्च हो रहा है।
सरकार के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 के आंकड़े इस बदलाव को समझने में मदद करते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार भारत में औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय ग्रामीण क्षेत्रों में 4,122 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 6,996 रुपये रहा। शहरी भारत में कुल उपभोग व्यय का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा गैर-खाद्य मदों पर खर्च हुआ, जबकि ग्रामीण भारत में यह हिस्सा लगभग 53 प्रतिशत था।
इन आंकड़ों का महत्व केवल इतना नहीं है कि लोग कितना खर्च कर रहे हैं। असली सवाल यह है कि खर्च की संरचना किस तरह बदल रही है और परिवार की बचत पर उसका क्या असर पड़ रहा है।
आय बढ़ रही है, लेकिन आकांक्षाएं भी बढ़ रही हैं
मध्यवर्ग की समस्या केवल महंगाई नहीं है। उसकी समस्या ‘आकांक्षात्मक महंगाई’ भी है। आज एक सामान्य परिवार अपने बच्चों को बेहतर निजी स्कूल में पढ़ाना चाहता है, स्वास्थ्य के लिए निजी अस्पताल को प्राथमिकता देता है, बेहतर घर और वाहन चाहता है, मोबाइल और इंटरनेट की आधुनिक सुविधाएं चाहता है और साल में कम से कम एक बार घूमने की इच्छा रखता है।
इनमें से कई खर्च अब विलासिता नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। परिणामस्वरूप परिवार की आय बढ़ने के बावजूद बचत का अनुपात अपेक्षाकृत कम महसूस होने लगता है।
यही कारण है कि मध्यम आय वाला परिवार अब अपने बजट को पहले की तुलना में कहीं अधिक सावधानी से संचालित करता है। मकान की ईएमआई, बच्चों की फीस, वाहन का खर्च, स्वास्थ्य बीमा, बिजली-पानी, इंटरनेट, घरेलू सहायिका और रोजमर्रा की वस्तुओं के खर्च मिलकर आय का बड़ा हिस्सा ले लेते हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य सबसे बड़ी चिंता
मध्यवर्गीय परिवारों पर सबसे बड़ा दबाव शिक्षा और स्वास्थ्य का है। सरकारी आंकड़ों से अलग-अलग परिवारों की वास्तविक स्थिति भिन्न हो सकती है, लेकिन व्यवहार में निजी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत परिवारों की वित्तीय योजनाओं को प्रभावित करती है।
एक बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए आज परिवार वर्षों पहले से निवेश की योजना बनाता है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रबंधन या विदेश में पढ़ाई जैसे विकल्पों की लागत कई परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। इसी प्रकार गंभीर बीमारी की स्थिति में एक मध्यमवर्गीय परिवार की वर्षों की बचत कुछ ही समय में समाप्त हो सकती है।
इसलिए मध्यवर्ग के लिए आर्थिक सुरक्षा का अर्थ अब केवल बैंक खाते में पैसा रखना नहीं रह गया है। स्वास्थ्य बीमा, जीवन बीमा, पेंशन और दीर्घकालीन निवेश उसकी वित्तीय रणनीति का अनिवार्य हिस्सा बनते जा रहे हैं।
आवास ने बढ़ाया दबाव
शहरी भारत में आवास मध्यवर्ग की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में शामिल है। महानगरों और तेजी से विकसित हो रहे शहरों में अच्छी लोकेशन पर घर खरीदना सामान्य वेतनभोगी परिवार के लिए आसान नहीं है। इसके लिए लंबे समय की ईएमआई लेनी पड़ती है।
ईएमआई का अर्थ केवल मासिक किस्त नहीं है। इसके साथ रखरखाव, बिजली, परिवहन, पार्किंग, संपत्ति कर और दूसरी लागतें भी जुड़ती हैं। परिणामस्वरूप परिवार की आय का एक बड़ा हिस्सा स्थायी खर्चों में चला जाता है।
यहीं से जीवनशैली में बदलाव शुरू होता है। परिवार बाहर खाना कम करता है, पर्यटन पर खर्च सीमित करता है, बड़े उपभोक्ता सामान की खरीद टालता है और कभी-कभी बच्चों की गतिविधियों तक में कटौती करता है।
डिजिटल सुविधा ने खर्च का नया रास्ता खोला
डिजिटल अर्थव्यवस्था ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन उसने खर्च करने की आदत भी बदल दी है। ऑनलाइन खरीदारी, भोजन की होम डिलीवरी, मनोरंजन के विभिन्न डिजिटल मंच, डिजिटल सदस्यताएं और आसान ऑनलाइन भुगतान ने उपभोग को बेहद सुविधाजनक बना दिया है।
पहले जिस वस्तु को खरीदने के लिए बाजार जाना पड़ता था, वह अब कुछ क्लिक में घर पहुंच जाती है। सुविधा के साथ खर्च की आवृत्ति भी बढ़ी है। छोटी-छोटी डिजिटल खरीदारी मिलकर महीने के बजट पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है।
यहां वित्तीय अनुशासन की आवश्यकता और बढ़ जाती है। मध्यवर्ग के सामने चुनौती यह है कि वह आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठाते हुए अनावश्यक उपभोग से कैसे बचाए।
महंगाई का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
महंगाई का प्रभाव केवल आंकड़ों में नहीं दिखाई देता। परिवार तब सबसे अधिक दबाव महसूस करता है जब उसे रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बार-बार बदलते हुए दिखाई देते हैं।
भारतीय सांख्यिकी व्यवस्था में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक महंगाई को मापने का प्रमुख आधार है और इसका उपयोग आर्थिक नीति तथा मुद्रास्फीति नियंत्रण में किया जाता है। लेकिन किसी परिवार का अनुभव केवल औसत महंगाई दर से तय नहीं होता। जिस परिवार के बजट में भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास या परिवहन का हिस्सा अधिक है, उसके लिए कीमतों में बदलाव का प्रभाव अलग हो सकता है।
इसीलिए एक ओर सरकार के आंकड़े नियंत्रित मुद्रास्फीति दिखा सकते हैं और दूसरी ओर परिवार को अपनी मासिक खरीदारी महंगी महसूस हो सकती है। दोनों बातें एक साथ सही हो सकती हैं।
बचत से निवेश की ओर बदलाव
मध्यवर्ग की आर्थिक सोच में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन निवेश को लेकर आया है। पारंपरिक रूप से बैंक जमा और सोना भारतीय परिवारों की प्रमुख बचत रहे हैं। अब म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार, पेंशन योजनाओं और अन्य वित्तीय साधनों की ओर भी आकर्षण बढ़ा है।
यह बदलाव सकारात्मक है, लेकिन इसके साथ वित्तीय साक्षरता की आवश्यकता भी बढ़ती है। अधिक रिटर्न की चाह में बिना जोखिम समझे निवेश करना परिवार की आर्थिक सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसलिए मध्यवर्ग को ‘अधिक कमाने’ के साथ-साथ ‘सही ढंग से बचाने और निवेश करने’ की संस्कृति विकसित करनी होगी।
समाधान केवल आय बढ़ाने में नहीं
मध्यवर्गीय आर्थिक दबाव का समाधान केवल यह कह देने से नहीं होगा कि लोगों की आय बढ़नी चाहिए। आवश्यक है कि आर्थिक विकास के साथ गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाओं का भी विस्तार हो।
बेहतर सरकारी स्कूल, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, सस्ती और विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था तथा सामाजिक सुरक्षा का मजबूत ढांचा मध्यवर्ग के खर्च को कम कर सकता है। यदि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए परिवारों को अत्यधिक निजी खर्च करना पड़े, तो बढ़ती आय का बड़ा हिस्सा इन्हीं मदों में चला जाएगा।
दूसरी ओर रोजगार की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। केवल रोजगार की संख्या नहीं, बल्कि स्थिर आय, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, बीमा और कौशल विकास जैसी सुविधाएं मध्यवर्गीय परिवारों को आर्थिक स्थिरता प्रदान कर सकती हैं।
बदलती जीवनशैली का सकारात्मक पक्ष
इस आर्थिक दबाव के बीच जीवनशैली में कुछ सकारात्मक बदलाव भी दिखाई दे रहे हैं। परिवार स्वास्थ्य और बीमा को पहले से अधिक महत्व दे रहे हैं। डिजिटल बैंकिंग और निवेश के प्रति जागरूकता बढ़ी है। युवा पीढ़ी अनुभवों पर खर्च करना चाहती है और पारंपरिक संपत्ति संचय के बजाय संतुलित जीवन को भी महत्व देने लगी है।
इस बदलाव को नकारात्मक दृष्टि से देखने के बजाय यह समझने की जरूरत है कि आर्थिक विकास के साथ उपभोग की प्राथमिकताएं बदलती हैं। चुनौती यह है कि उपभोग और बचत के बीच संतुलन बना रहे।
निष्कर्ष
भारत के मध्यवर्ग की आर्थिक स्थिति देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण संकेतक है। यदि यह वर्ग आर्थिक रूप से सुरक्षित और आशावादी है तो उपभोग, निवेश और विकास की गति मजबूत रह सकती है। लेकिन यदि बढ़ती आकांक्षाओं के साथ आय, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की लागत का दबाव बढ़ता गया, तो आर्थिक विकास का लाभ महसूस करने और वास्तविक जीवन में उसका अनुभव करने के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
इसलिए भारत की विकास यात्रा का अगला चरण केवल सकल घरेलू उत्पाद बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। विकास का वास्तविक अर्थ तब होगा जब सामान्य परिवार यह महसूस करे कि उसकी आय बढ़ रही है, बचत सुरक्षित है, बच्चों का भविष्य बेहतर है और किसी आकस्मिक बीमारी या आर्थिक संकट से उसका पूरा जीवन अस्थिर नहीं हो जाएगा।
मजबूत अर्थव्यवस्था की पहचान केवल शेयर बाजार के रिकॉर्ड और जीडीपी की ऊंची वृद्धि दर से नहीं होती; उसकी असली परीक्षा मध्यमवर्गीय परिवार के मासिक बजट में होती है।
राम शर्मा