मृतकों का श्राद्ध अशास्त्रीय एवं वेद विरुद्ध होने से त्याज्य कर्म

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-मनमोहन कुमार आर्य

आश्विन मास का कृष्ण पक्ष मृत पितरों का श्राद्ध कर्म करने के लिए प्रसिद्ध सा हो गया है। इन दिनों पौराणिक नाना प्रकार के नियमों का पालन करते हैं। अनेक पुरुष दाढ़ी नहीं काटते, बाल नहीं कटाते, नये कपड़े नहीं खरीदते व सिलाते, यहां तक की विवाह आदि का कोई भी शुभ कार्य नहीं करते हैं। कहा जाता है कि इन दिनों मृतक माता-पिता, दादी-दादा और परदादी-परदादा अपने अपने परिवारों में भोजन के लिए आते हैं और भोजन करके सन्तुष्ट होते हैं। आज के वैज्ञानिक युग में यह देखकर आश्चर्य होता है कि लोग मध्यकालीन इस मिथ्या परम्परा को बिना सोचे विचारे मानते व पालन करते आ रहे हैं। ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने मृतक श्राद्ध का युक्ति व तर्क सहित शास्त्र प्रमाणों से खण्डन किया था। यह बता दें कि 18 पुराणों की शास्त्रों में गणना नहीं होती। पुराणों की असलियत जानने के लिए ‘पौराणिक पोल प्रकाश’ ग्रन्थ का अध्ययन करना चाहिये जो आर्य विद्वान पं. मनसाराम वैदिक-तोप द्वारा रचित है। पं. मनसाराम जी वैश्य परिवार में जन्म लेकर भी वेदों व शास्त्रों के मर्मज्ञ थे। महर्षि दयानन्द ने मृतक श्राद्ध के विरुद्ध अनेक शास्त्रीय विधान भी दिये थे जिससे यह सिद्ध होता था कि श्राद्ध मृत पितरों का नहीं अपितु जीवित माता-पिता, दादी-दादा व अन्य वृद्धों का किया जाना चाहिये। मृतक का तो दाह संस्कार कर देने से उसका शरीर नष्ट हो जाता है। उस मृतक का उसके कुछ समय बाद ही पुनर्जन्म हो जाता है। वह अपने कर्मानुसार मनुष्य या पशु-पक्षी आदि अनेक योनियों में से किसी एक में जन्म ले लेता है व यही क्रम चलता रहता है। आरम्भ में वह बच्चा होता है और समय के साथ उसमें किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था आती है और उसके बाद उसकी पुनः मृत्यु होकर पुनर्जन्म होता है। अतः हो सकता है कि वर्तमान में वह किसी अन्य प्राणी योनि में वह जीवन निर्वाह कर रहा होगा। जिस प्रकार हम अपने पूर्व जन्मों के परिवारों में श्राद्ध पक्ष में नहीं जा सकते, उसी प्रकार हमारे मृत पितर भी हमारे यहां भोजन करने नहीं आ सकते। यह भी असम्भव है, धार्मिक व वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से, की जन्मना ब्राह्मण का खाया हुआ हमारे पितरों को प्राप्त हो जाये। अतः किसी के भी द्वारा अपने मृत पितरों का श्राद्ध करना अनुचित व अवैदिक कार्य होने से अधार्मिक कृत्य ही है जिसका कोई तर्क, युक्ति व वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह असत्य व अविवेकपूर्ण है एवं अन्धविश्वास से युक्त कृत्य है।

 

वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थ पढ़ने पर यह तथ्य सामने आता है कि शास्त्रों में जहां जहां श्राद्ध का वर्णन हुआ है वह जीवित पितरों का श्राद्ध करने के लिए ही हुआ है। भोजन कौन खा सकता है?, वस्त्र कौन धारण कर सकता है? आशीर्वाद कौन दे सकता है? यह सब कार्य जीवित पितर ही कर सकते हैं। यदि यह सब कार्य हम पण्डितों व पुजारियों को सामान देकर करेंगे तो इसका लाभ पितरों को न होकर उन पण्डित-पुजारियों को ही होगा। आश्चर्य इस बात का है कि आज के वैज्ञानिक युग में भी लोग इन मध्ययुगीन अन्धविश्वासपूर्ण बातों पर विश्वास करते हैं और हमारे पण्डे-पुजारी लोगों की धार्मिक भावना व उनके भोलेपन व सज्जनता का गलत लाभ उठाते हैं।

 

हम सभी सनातनी व पौराणिक भाईयों को यह निवेदन करना चाहते हैं कि महर्षि दयानन्द व आर्यसमाज की कृपा से हमारे वेद आदि सभी शास्त्र हिन्दी अनुवाद सहित उपलब्ध है जिसे पांचवी कक्षा पास व्यक्ति भी आसानी से पढ़ व समझ सकता है। अब स्वामी दयानन्द जी कृपा से वेदों पर ब्राह्मण वर्ग का एकाधिकार नहीं रहा अपितु यह मानवमात्र को मिल चुका है। अनेक दलित भाई व बहिन भी आर्यसमाज के गुरूकुलों में पढ़ते हैं और वेदों के अच्छे विद्वान है। यह अतिरंजित बात नहीं अपितु तथ्यपूर्ण है कि हमारे आर्यसमाज के अनेक दलित परिवारों में जन्में स्त्री व पुरूष ब्राह्मणों के शास्त्रीय गुणों कर्म व स्वभाव से पूर्ण हैं और वेदों पर अधिकारपूर्वक प्रवचन करने के साथ यज्ञ व महायज्ञ भी सम्पन्न करते व कराते हैं।

 

हमारा यह लेख लिखने का यही तात्पर्य है कि हिन्दुओं को अपनी मध्ययुगीन निद्रा का त्याग कर देना चाहिये। वेद व अन्य शास्त्रों के हिन्दी अनुवादों को स्वयं पढ़ना चाहिये और अपने विवेक से सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिये। क्रान्तिकारी धार्मिक सामाजिक ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर भी सत्य व असत्य का विवेक कर सकते हैं। आप पायेंगे कि मृतक श्राद्ध एक शास्त्रीय कृत्य वा कर्तव्य नहीं अपितु मिथ्या विश्वास है जिसके करने से किसी लाभ की प्राप्ति होना सम्भव नहीं है अपितु प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष अनेक प्रकार की हानि हो सकती है क्योंकि अज्ञानता से किया गया कार्य अधिकांशतः हानि ही पहुंचाता है। ओ३म् शम्।

 

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