आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी
मुक्तिनाथ धाम नेपाल के मुस्तांग जिले में हिमालय की गोद में भगवान विष्णु का एक प्राचीन और अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थल है। जो हिमालयी क्षेत्र में, बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में, 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर थोरोंग-ला पहाड़ियों के पास स्थित है, जो पोखरा से लगभग 197 किमी उत्तर- पश्चिम में है। यह स्थल हिंदुओं और बौद्धों दोनों के लिए पवित्र है।
मुक्तिनाथ यात्रा हर प्राणी को प्राकृतिक सुंदरता और शांत माहौल के साथ-साथ मोक्ष की अनुभूति कराती है। इस मंदिर का उल्लेख रामायण, वराह पुराण और स्कंद पुराण जैसे हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है। नेपाल के पोखरा से जोमसोम तक हवाई मार्ग से या फिर जीप/बस के माध्यम से मुस्तांग पहुँचकर ट्रेकिंग द्वारा यहाँ पहुँचा जा सकता है। मुक्तिनाथ पहुंचकर मंदिर तक 2 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है । यदि कोई श्रद्धालु चलने में असमर्थ हों तो सवारी के लिए घोड़े की सवारी की व्यवस्था हो जाती है।
शालिग्राम शिला के रूप में विष्णु:-
इसे मोक्ष का स्थान माना जाता है और यह हिंदू धर्म के 108 दिव्य देशों में से एक है। यहाँ मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु शालिग्राम शिला के रूप में विराजमान हैं,
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शालिग्राम शिला में विष्णु का निवास होता है। इस संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इन्हीं कथाओं में से एक के अनुसार जब भगवान शिव जालंधर नामक असुर से युद्ध नहीं जीत पा रहे थे तो भगवान विष्णु ने उनकी मदद की थी। जब तक असुर जालंधर की पत्नी वृंदा अपने सतीत्व को बचाए रखती तब तक जालंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था। ऐसे में भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सतीत्व को नष्ट करने में सफल हो गए। जब वृंदा को इस बात का अहसास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी। इससे दुखी वृंदा ने भगवान विष्णु को कीड़े-मकोड़े बनकर जीवन व्यतीत करने का शाप दे डाला। फल स्वरूप कालांतर में शालिग्राम पत्थर का निर्माण हुआ, जो हिंदू धर्म में आराध्य हैं।
भगवान विष्णु को वृंदा के श्राप से मुक्ति:-
यह वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु को वृंदा के श्राप से मुक्ति मिली थी। इसलिए मुक्तिनाथ में उनकी पूजा मोक्ष के देवता के रूप में की जाती है। मुक्तिनाथ हिमालय के अन्य किसी भी तीर्थ स्थल से अलग एक शांत और रहस्यमय वातावरण प्रदान करता है। यह स्थल हिंदुओं के लिए विष्णु और बौद्धों के लिए अवलोकितेश्वर का निवास स्थान है।
सती का गाल गिरने से शक्ति पीठ:-
स्वस्थानी व्रत के अनुसार, भगवान शिव सती के मृत शरीर को अपने साथ लेकर अनेक स्थानों पर विचरण करते रहे। भ्रमण के दौरान सती के शरीर के अंग अनेक स्थानों पर गिरे और जहाँ-जहाँ गिरे, वही स्थान शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हो उठा। मुक्तिनाथ में सती का गाल गिरा था, जिससे यह शैव और शाक्त भक्तों के लिए पवित्र स्थान बन गया। परिसर में “मुक्तेश्वर महादेव” नामक एक छोटा मंदिर भी है, जहाँ शिव भक्त दर्शन करने आते हैं।
हिरण के टूटे सींग को शिव लिंग के रूप में की मान्यता:-
एक पौराणिक कथा के अनुसार, शिव और पार्वती ने बागमती नदी के पूर्वी तट पर स्थित जंगल में हिरण का रूप धारण किया था। बाद में देवताओं ने उनका पीछा किया और उनके एक सींग को पकड़कर उन्हें अपना दिव्य रूप धारण करने के लिए विवश किया। टूटे हुए सींग को लिंग के रूप में पूजा जाता था, लेकिन समय के साथ वह दब गया और खो गया।
108 जलधाराएं और कुंड :-
मंदिर परिसर में 108 गौमुख हैं, जिनसे जल धाराएं गिरती हैं, और दो पवित्र लक्ष्मी कुंड और सरस्वती कुंड भी यहां हैं, जिनमें स्नान को पाप मोचन माना जाता है। यह भी माना जाता है कि यहां स्थित 108 जलधाराओं के नीचे स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इन धाराओं में स्नान करने से जन्म- जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। विश्व भर से तीर्थयात्री मुक्तिनाथ मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए यहां आते हैं। पवित्र जल धाराओं के नीचे स्नान करने से आत्मा की शुद्धि होती है और आंतरिक शांति तथा अतीत के कुकर्मों से मुक्ति मिलती है । 108 मुक्ति धाराओं और 2 मुक्ति कुंडों के नीचे पवित्र स्नान करें। हिंदू ज्योतिष के अनुसार, 12 राशियां और 9 ग्रह मिलकर 108 का आध्यात्मिक संयोजन बनाते हैं, जो ब्रह्मांडीय पूर्णता का प्रतीक है। तिब्बती बौद्ध इसे ‘चुमिग ग्यात्सा’ (सौ जल) कहते हैं, जहाँ गुरु रिनपोछे ने ध्यान किया था।
ज्वाला मां का मंदिर: –
मुख्य मंदिर के परिसर में ही ‘ज्वाला मां’ का मंदिर है, जहाँ एक पवित्र ज्योति लगातार प्रज्वलित रहती है, जो पृथ्वी, जल और अग्नि का अद्भुत संगम है। जहाँ बिना किसी ईंधन के पानी के कुंड के ऊपर शाश्वत अग्नि (ज्वाला) जलती रहती है। यह स्थान वैष्णव संप्रदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और यहाँ की नीली ज्वाला को देवी का रूप माना जाता है।
लेखक:-
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी