पंकज जायसवाल
भारत एक संघीय देश जिसे राज्यों का संघ भी कहते हैं. इस संरचना का मूल उद्देश्य विविधताओं से भरे देश को एकता के सूत्र में बांधते हुए क्षेत्रीय संतुलन और समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है लेकिन समय-समय पर यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या हमारी संस्थागत संरचनाएँ वास्तव में इस संतुलन को प्रतिबिंबित करती हैं या नहीं। अबकी बार जब सीटों के बढ़ाने और परिसीमन का बिल संसद में आया तो एक तेलगु पत्रकार का एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा था जिसमें वह इस बिल के पास होने के बाद कैसे दक्षिण के सांसदों की संख्या और इससे जुड़ा दबदबा ख़त्म हो जायेगा, इसके बारे में बात कर रहे थे. अगर लोकतंत्र में कोई सामूहिक चिंता पटल पर आ रही है तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. ऐसी चिंताओं का बहुआयामी चिंतन कर त्वरित समाधान आवश्यक है. ऐसे जन चिंताओं पर तुरंत संज्ञान लेते हुए राजनैतिक पार्टियों और सरकार को ध्यान देना चाहिए।
यह चिंता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संघीय मनोविज्ञान से जुड़ी है। जब किसी क्षेत्र को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज़ कमजोर हो रही है तो वह असंतोष लोकतांत्रिक संरचना के लिए चुनौती बन सकता है। इसे जनभावना के तौर पर लेते हुए इसका समाधान ढूँढना चाहिए। मैंने इस विषय पर काफी मंथन किया और मेरे कुछ विचार हैं जो शायद इस विषय में समाधान हो सकते हैं. शायद शब्द इसलिए कि यह बहुत व्यापक प्रभाव वाला विमर्श है. इसलिए इस एक कच्चे विचार को पक्के विचार में बदलने के लिए विमर्श के कई पड़ाव पार करने होंगे जो बुद्धिजीवियों के विमर्श, जन विमर्श से होते हुए संसद के विमर्श तक पहुंचना चाहिए।
क्षेत्रीय संतुलन के कई भारतीय उदाहरण भारत में पहले से ही मौजूद हैं. भारत में पहले से ही कुछ ऐसे मॉडल मौजूद हैं, जो क्षेत्रीय संतुलन और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण के सफल उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जैसे महाराष्ट्र में दो राजधानियाँ हैं मुंबई प्रशासनिक तो नागपुर शीतकालीन । यह व्यवस्था नागपुर पैक्ट के तहत हुई, जिसका उद्देश्य विदर्भ क्षेत्र को प्रशासनिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना था। हर वर्ष विधानमंडल का शीतकालीन सत्र नागपुर में आयोजित होता है, जिससे प्रशासन केवल मुंबई तक सीमित नहीं रहता। इसी प्रकार, पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य में “दरबार मूव” की परंपरा थी, जिसके तहत सरकार गर्मियों में श्रीनगर और सर्दियों में जम्मू स्थानांतरित होती थी। यह व्यवस्था 19वीं शताब्दी से थी. हिमाचल प्रदेश में भी शिमला ग्रीष्मकालीन और धर्मशाला शीतकालीन के रूप में द्वितीयक राजधानी की व्यवस्था देखने को मिलती है। अंग्रेजों के समय भारत में भी दो राजधानी की कभी व्यवस्था थी. कलकत्ता अब कोलकाता 1911 तक प्राइमरी कैपिटल था, जबकि शिमला 1864 से 1939 तक ऑफिशियल समर कैपिटल था, जहाँ सरकार गर्मी से बचने के लिए हर साल दूसरी जगह जाती थी।
यह अवधारणा केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों ने बहु-राजधानी मॉडल अपनाया और कई देशों में आज भी दो या उससे ज़्यादा राजधानियाँ हैं, जो अक्सर एक ऑफिशियल संवैधानिक राजधानी और एक एडमिनिस्ट्रेटिव लेजिस्लेटिव सीट के बीच काम बाँट देती हैं। सबसे सटीक उदाहरण स्वरुप साउथ अफ्रीका की 3 राजधानी प्रिटोरिया कार्यपालिका, केप टाउन विधायिका, ब्लोमफोंटेन न्यायपालिका का है। बोलीविया की 2 राजधानी पहला सुक्रे संवैधानिक और न्यायपालिका तो ला पाज़ प्रशासनिक और कार्यपालिका के लिए है। मलेशिया 2 राजधानी कुआलालंपुर और पुत्रजया । श्रीलंका की भी 2 राजधानी श्री जयवर्धनेपुरा कोट्टे और कोलंबो । नीदरलैंड की भी 2 राजधानी एम्स्टर्डम और द हेग । ऐसे और भी उदाहरण हैं. इन मॉडलों का उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन, ऐतिहासिक समझौते और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को मजबूत करना है।
ऐसे में एक नई सोच के रूप में बहु-स्थानिक पीएमओ के बारे में भी सोचा जा सकता है. उपरोक्त उदाहरणों से प्रेरणा लेकर भारत में भी एक अभिनव प्रयोग हो सकता है। राजनैतिक प्रतिनिधित्व, व्यवस्थागत सुगमता, संघीय संतुलन और जनाकांक्षाओं को साधने के उद्देश्य से इसी तरह का कोई मिला जुला मॉडल भारत सरकार अपना सकती है. जैसे संसद और सर्वोच्च संस्थाएँ दिल्ली में बनी रहें, लेकिन कार्यपालिका विशेषकर प्रधानमंत्री कार्यालय PMO और गृह मंत्रालय को बहु-स्थानिक बनाया जा सकता है। मौजूदा बंगाल चुनाव में गृह मंत्री अमित शाह के कोलकाता प्रवास ने इस विचार को पुष्ट भी किया है की गृह मंत्रालय दिल्ली से दूर कोलकाता में रहकर भी चलाया तो जा सकता है. पहले के समय में ये विचार शायद प्रासंगिक नहीं होता लेकिन आज के डिजिटल और कनेक्टेड युग में तो यह संभव है.
कल्पना कीजिए कि वर्ष के 6 महीने पीएमओ दिल्ली में कार्य करे, 3 महीने दक्षिण भारत के किसी प्रमुख शहर जैसे बैंगलोर या चेन्नई में और शेष 3 महीने पूर्वी उत्तर-पूर्वी क्षेत्र जैसे कोलकाता या गुवाहाटी में. भारत का संघीय ढांचा कितना मजबूत होगा, कार्यपालिका और प्रशासन कितना व्यावहारिक होगा लोग कितना कनेक्टेड फील करेंगे और राजनैतिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व साकार होता नजर आएगा। यह केवल प्रतीकात्मक बदलाव नहीं होगा, बल्कि शासन की संरचना में वास्तविक विकेंद्रीकरण का संकेत देगा।
लोकतंत्र और समावेशीकरण होगा और जब देश के विभिन्न हिस्सों में केंद्र सरकार की प्रत्यक्ष उपस्थिति होगी, तो लोगों में यह भावना विकसित होगी कि केंद्र केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है यह उनके नजदीक भी है. यह कदम संघीय एकीकरण को मजबूती देगा। नीतिगत संवेदनशीलता में वृद्धि होगी, स्थानीय स्तर पर बैठकर निर्णय लेने से नीति-निर्माण अधिक यथार्थवादी और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप होगा। प्रशासनिक दक्षता आयेगी स्थानीय अधिकारियों और संस्थाओं के साथ सीधा समन्वय बेहतर होगा, जिससे परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आ सकती है। राजनीतिक संतुलन और राजनैतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा, उत्तर-दक्षिण, पूर्वोत्तर या केंद्र-राज्य के बीच जो मनोवैज्ञानिक दूरी बनती है, उसे कम किया जा सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था मजबूत होगी। यदि गृह मंत्रालय भी इसी प्रकार से आंशिक रूप से विकेंद्रित हो, तो विभिन्न क्षेत्रों की सुरक्षा चुनौतियों पर अधिक फोकस किया जा सकता है।
हालांकि यह विचार आकर्षक है लेकिन इसके साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी आ सकती हैं. जैसे प्रशासनिक लागत और लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा प्रबंधन फाइल मूवमेंट और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता, नौकरशाही के समन्वय की जटिलता लेकिन ये इतनी बड़ी नहीं हैं कि जिसका समाधान नहीं है. डिजिटल गवर्नेंस, ई-ऑफिस और वर्चुअल समन्वय के इस युग में ये चुनौतियाँ असंभव नहीं हैं।
मेरा मानना है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में केवल संवैधानिक ढांचा ही पर्याप्त नहीं है; उस ढांचे की आत्मा को जीवंत बनाए रखने के लिए समय-समय पर संस्थागत नवाचार आवश्यक हैं। यदि परिसीमन या जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व से किसी क्षेत्र में असंतोष की संभावना बनती है, तो उसका समाधान केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधारों से किया जाना चाहिए।
पीएमओ और प्रमुख मंत्रालयों का आंशिक विकेंद्रीकरण एक ऐसा ही प्रयोग हो सकता है, जो भारत के संघीय चरित्र को और मजबूत बनायेगा। यह विचार अभी प्रारंभिक है, लेकिन यदि इस पर गंभीर विमर्श हो बौद्धिक स्तर से लेकर जनस्तर और फिर संसद तक तो यह भविष्य की शासन प्रणाली का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है। सरकार और समाज यदि चाहें, तो इस दिशा में एक नया अध्याय लिखा जा सकता है।