राजनीति

मोदी और शाह की रणनीति ने किया कमाल

संजय सिन्हा

चुनाव के बाद कभी कभी ऐसे नतीजे आते हैं,जो हैरत में डाल देते हैं। चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों के जैसे नतीजे सामने आए हैं, उनसे साफ है कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में जहां मतदाताओं ने बदलाव के पक्ष में मतदान किया, वहीं असम और पुदुचेरी में लोगों ने मौजूदा सरकार पर भरोसा कायम रखा। इसमें चौंकाने वाले नतीजे तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल से आए, जहां चुनाव प्रचार के क्रम में बहुस्तरीय उतार-चढ़ाव के बावजूद लोगों के लिए यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल था कि सत्ताधारी पार्टियों का प्रदर्शन बेहद कमजोर हो सकता है। इन राज्यों में इतने बड़े उलटफेर की उम्मीद कम ही लोगों ने की थी।

दरअसल, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार के प्रति दिखने वाला जनसमर्थन चुनाव और मतदान के मोर्चे पर उलट नतीजे देने वाला साबित हुआ। पश्चिम बंगाल में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और  गृह मंत्री अमित शाह की मजबूत रणनीति ने कमाल किया।हालांकि राज्य में भाजपा ने जीत के लिए जिस स्तर पर जाकर मेहनत की, मतदाताओं के वोट अपने पक्ष में लाने के लिए एक व्यापक रणनीतिक राजनीति पर काम किया और यहां तक भावनात्मक मुद्दों का भी सहारा लिया, उसका साफ असर मतगणना और नतीजों पर दिखा। जाहिर है, लंबे समय के बाद अब पश्चिम बंगाल एक और सत्ता परिवर्तन का गवाह बन रहा है, जहां विचारधाराओं का सफर क्रमश: बदलता दिखा है।

वहीं तमिलनाडु में एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) को लेकर बहुत कम लोगों ने यह अंदाजा लगाया होगा कि चुनाव के परिणाम में उसकी स्थिति इस कदर खराब रहेगी। गौरतलब है कि फिल्मों की दुनिया से तमिलनाडु की राजनीति में आकर हाल के वर्षों में उभरे और अपने प्रशंसकों के बीच थलपति के नाम से मशहूर जोसेफ विजय ने अपने पहले ही चुनाव में राज्य की राजनीति में बीते कुछ सालों से एकछत्र राज करने वाले नेता एमके स्टालिन और उनकी पार्टी द्रमुक को करारी शिकस्त दी। अब तमिलनाडु द्रमुक और अन्नाद्रमुक के इर्द-गिर्द घूमने वाली राजनीति के समांतर एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। यह देखने की बात होगी कि आने वाले वर्षों में यह राज्य किस राजनीतिक धारा का केंद्र बनेगा।जहां तक केरल का सवाल है, तो वहां आमतौर पर वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चे और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड लोकतांत्रिक मोर्चे के बीच सत्ता में फेरबदल होता रहा है। इस लिहाज से देखें तो दो कार्यकाल के बाद वामपंथी मोर्चा सत्ता से बाहर हुआ है और अच्छी उपस्थिति के साथ कांग्रेस को महत्त्वपूर्ण जीत मिली है।

इसके अलावा, असम में एक तरह से अपेक्षित नतीजे आए हैं, जहां भाजपा ने फिर से भारी जीत हासिल की है। यह तब भी संभव हुआ, जब राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के रुख को लेकर कई तरह के विवाद चुनाव प्रचार के केंद्र में रहे। इसी तरह, केंद्रशासित प्रदेश पुदुचेरी के परिणामों के मुताबिक, वहां सत्तारूढ़ राजग गठबंधन ने एक बार फिर बहुमत हासिल कर अपनी सत्ता कायम रखी।कहा जा सकता है कि इन चुनावों में भाजपा ने जहां पश्चिम बंगाल, असम और पुदुचेरी में जीत हासिल कर अपनी उपस्थिति साबित की है, वहीं कांग्रेस भी केरल की जीत को अपनी बड़ी उपलब्धि बता सकती है। चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में एसआईआर के तहत करीब सत्ताईस लाख लोगों को मतदाता सूची से बाहर किए जाने को लेकर भी सवाल उठे। इसके बावजूद राज्य में मतदान का कीर्तिमान कायम हुआ। बहरहाल, चुनाव प्रचार के दौरान चाहे जिस तरह की तल्खियां देखी गईं, लेकिन अब जरूरत इस बात की है कि एक लोकतांत्रिक ढांचे के तहत समावेशी विकास सभी सरकारों का मुख्य उद्देश्य बने।

आपको बताता चलूं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा ने दीर्घकालिक योजना के दम पर निर्णायक जीत हासिल की है। राज्य के राजनीतिक इतिहास, दागी चुनाव प्रक्रिया और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की राजनीति की ढलान ने उसकी कामयाबी में मदद पहुंचाई। बंगाल भारत के राष्ट्रीय आंदोलन और हिंदुत्व के विचारों का केंद्र रहा है। अन्य जगहों पर फैलने से काफी पहले हिंदुत्व के विचार यहीं पनपे और क्षेत्रीय पहचान की भावना यहां काफी प्रबल रही है। भाजपा ने सालों की सुनियोजित रणनीति के जरिए राज्य की एक सीमित आबादी को अपने सर्वव्यापी राष्ट्रवादी विमर्श में दीक्षित कर दिया। महाराष्ट्र, असम और ओडिशा की क्षेत्रीय राजनीति को अपने आगोश में समा लेने के बाद, भाजपा ने अपना पूरा ध्यान पश्चिम बंगाल पर केंद्रित किया और आखिरकार फतह हासिल की। टीएमसी के सामने अब अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। उसकी संस्थापक नेता ममता बनर्जी 71 साल की हो चुकी हैं और उसके कार्यकर्ता व मतदाता अब भाजपा के दबाव में आसानी से आ सकते हैं।