लेखक परिचय

अनुश्री मुखर्जी

अनुश्री मुखर्जी

श्रीमती अनुश्री मुखर्जी, महिला सशक्तीकरण की दिशा में कार्य को लेकर वह नाम हैं, जो पिछले 20 वर्षों से लगातार गैर-सरकारी संगठनों से जुड़कर महिलाओं के अधिकार व प्रशिक्षण को लेकर प्रयासरत रही हैं। श्रीमती मुखर्जी मानती हैं कि देश में महिलाओं को पुरुषों से बराबर कहा तो जाता है, लेकिन आज भी हमारा समाज उस पुरानी मानसिकता में ही जी रहा है, बस शब्द और कहने के मायने बदल गए हैं। महिलाओं को समानता का अधिकार तभी मिल सकता है जब उन्हें बराबर शिक्षा देकर तथा कुशल कामगार बनाकर प्रोत्साहित करेंगे।

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उत्तर प्रदेश वि‍धानसभा की 403 सीटों में से समाजवादी पार्टी को महज 47 सीटें मिली हैं। पिछले 25 सालों में यह सबसे बड़ी हार है। मुलायम सिंह यादव ने जिस वोट बैंक को 25 सालों की मेहनत से सपा से जोड़ा था वह एक झटके में तहस-नहस हो गया। वैसे को सपा में अब संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि अखिलेश, मुलायम-शिवपाल के साथ आ सकते हैं। लेकिन हकीकत तो साफ है कि स्क्रिप्टेड चीजें काम न आईं तो अब तैयारी फिर से जैसा असल में है, वैसा स्थापित करने को लेकर है। दिखावे के तौर पर अब अखिलेश यादव के पास ऑप्शन है कि‍ वे मुलायम-शिवपाल से कॉम्प्रोमाइज कर सकते हैं और पार्टी में उनके निर्देशों पर काम कर सकते हैं। वजह है कि अखिलेश के अगुआई में सपा ने अगर 100 सीटें भी क्रॉस की होती तो यह संकेत मिलते कि‍ अखिलेश की प्रदेश की राजनीति‍ में पकड़ है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिस तरह पुराने नेताओं को दरकिनार किया गया और नए लोगों को कोर टीम में जगह दी गई उससे सांगठनिक क्षमता पर भी सवाल खड़े हुए हैं। ऐसे में पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए मुलायम और शिवपाल के साथ आ सकते हैं।

अखिलेश के सामने एक और विकल्प है कि जो पुराने नेता या विधायक नाराज हैं और जो दूसरे दलों में जाकर भी चुनाव नहीं जीते, उन्हें एक बार फिर से पार्टी में बुलाने और नए सिरे से पार्टी को खड़ा करने की कोशि‍श कर सकते हैं। कारण है कि चुनाव हारने की वजह से अखिलेश की संगठन पर ढीली पकड़ भी सामने आई है। अब इस कमी को पूरा करने के लिए पुराने लोगों को साथ लाना होगा। सपा में अब ये भी हो सकता है कि मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद वापस सौंप सकते हैं। वजह है कि जब मुलायम परिवार में झगड़ा हुआ था तब अखिलेश ने कई बार कहा था कि मैं नेताजी से सिर्फ तीन महीने के लिए पार्टी कमान लेना चाहता हूं। ऐसे में अब वह चुनाव हार चुके हैं तो मुलायम से किया अपना वादा भी पूरा कर सकते हैं।

जाहिर है, हर गठबंधन के बाद और खासकर चुनाव-परिणा के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर होता है, ठीक उसी तरह यहां भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के संरक्षक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव पार्टी की हार से काफी व्यथित हैं। उन्होंने कहा है कि यदि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया होता, तो राज्य में फिर सपा की ही सरकार बनती। होली के लिए सैफई पहुंचे मुलायम सिंह यादव ने कहा कि हार के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं है। उन्होंने मीडिया से कहा, “हम पहले ही गठबंधन के विरोध में थे और सबके सामने कहा था कि इससे कोई फायदा नहीं होगा, इसलिए गठबंधन का प्रचार भी नहीं किया। सपा को अपने बूते अकेले चुनाव लड़ना चाहिए था।” मुलायम सिंह यादव ने कहा कि हमारे लोग समझ नहीं पाए कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कोई पसंद नहीं करता, गठबंधन करने की क्या ज़रूरत है” मुलायम ने अपने छोटे भाई शिवपाल यादव के इस बयान पर सहमति भी जताई कि गठबंधन के घमंड के कारण हार हुई।

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