अनुश्री मुखर्जी

श्रीमती अनुश्री मुखर्जी, महिला सशक्तीकरण की दिशा में कार्य को लेकर वह नाम हैं, जो पिछले 20 वर्षों से लगातार गैर-सरकारी संगठनों से जुड़कर महिलाओं के अधिकार व प्रशिक्षण को लेकर प्रयासरत रही हैं। श्रीमती मुखर्जी मानती हैं कि देश में महिलाओं को पुरुषों से बराबर कहा तो जाता है, लेकिन आज भी हमारा समाज उस पुरानी मानसिकता में ही जी रहा है, बस शब्द और कहने के मायने बदल गए हैं। महिलाओं को समानता का अधिकार तभी मिल सकता है जब उन्हें बराबर शिक्षा देकर तथा कुशल कामगार बनाकर प्रोत्साहित करेंगे।

न मुलायम की स्क्रिप्ट, न अखिलेश का पैंतरा, अब कांग्रेस पर गुस्सा उतरा

अखिलेश के सामने एक और विकल्प है कि जो पुराने नेता या विधायक नाराज हैं और जो दूसरे दलों में जाकर भी चुनाव नहीं जीते, उन्हें एक बार फिर से पार्टी में बुलाने और नए सिरे से पार्टी को खड़ा करने की कोशि‍श कर सकते हैं। कारण है कि चुनाव हारने की वजह से अखिलेश की संगठन पर ढीली पकड़ भी सामने आई है। अब इस कमी को पूरा करने के लिए पुराने लोगों को साथ लाना होगा।

देश मजहब-प्रेम से ऊपर है

दीदी का मुस्लिम प्रेम ही था कि उन्होंने 30000 मदरसों को 2500 रुपये और 1500 मस्जिदों को 1500 रुपए प्रतिमाह देने का फैसला कर लिया था, जिसकी भविष्य में गंभीरता को देखते हुए माननीय कोलकाता हाईकोर्ट ने उस फैसले को ही खारिज कर दिया था। मां, माटी और मानुष की राजनीति के नारे की उस वक्त भी पोल खुली, जब मालदा हमले के ठीक पहले एक मदरसे के प्रधानाध्यापक काजी मसूम अख्तर पर इसलिए हमला कर दिया गया क्योंकि काजी छात्रों से राष्ट्रीय गान सुनना चाहते थे। यही नहीं सरकार ने कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा आपत्ति जताने के बाद बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन द्वारा लिखी गई पटकथा वाले नाटक सीरीज के प्रसारण पर भी रोक लगा दी और सलमान रुश्दी को कोलकाता आने पर प्रतिबंध लगा दिया।