कुमार कृष्णन
कुछ आवाजें कानों से होकर गुजरती हैं और कुछ आवाजें भीतर कहीं ठहर जाती हैं। नाना पाटेकर ऐसी ही आवाज थे। उनकी आवाज में खुरदरापन था, गुस्सा था, करुणा थी और सबसे बढ़कर जिंदगी की सच्चाई थी। वे संवाद बोलते थे तो लगता था, कोई अभिनेता नहीं, हमारे बीच का कोई आदमी अपनी बात कह रहा है।
आज जब नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, तो भारतीय सिनेमा ने केवल एक बड़ा अभिनेता नहीं खोया है। उसने अपनी एक ऐसी आवाज खो दी है, जो पर्दे से उतरकर समाज से संवाद करती थी और कई बार ऐसे सवाल पूछती थी, जिनसे हम बचना चाहते थे।
मृत्यु किसी भी कलाकार की अंतिम खबर हो सकती है, लेकिन उसके कला-जीवन की अंतिम पंक्ति नहीं। नाना पाटेकर के मामले में तो यह और भी सच है। वे अपने किरदारों में रहेंगे, अपनी आवाज में रहेंगे और उन सवालों में भी रहेंगे, जिन्हें उन्होंने अपने अभिनय के जरिए हमारे सामने रखा।
किसी शायराना अंदाज में कहें तो—
“आवाजें मरती नहीं,
बस चेहरे से उतरकर यादों में चली जाती हैं।”
नाना पाटेकर की आवाज भी अब शायद इसी तरह हमारे भीतर सुनाई देती रहेगी।
उनका जन्म विश्वनाथ पाटेकर के रूप में हुआ। अभिनय की दुनिया में वे नाना पाटेकर बने और देखते-देखते ऐसा नाम बन गए, जिसे किसी परिचय की जरूरत नहीं रही। 1978 की गमन से शुरू हुई उनकी फिल्मी यात्रा आगे बढ़ती गई और अंकुश, परिंदा, प्रहार, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, खामोशी, तिरंगा, अब तक छप्पन, अपहरण, राजनीति, वेलकम और नटसम्राट जैसी फिल्मों तक पहुंची।
लेकिन नाना पाटेकर को केवल फिल्मों की सूची से समझना संभव नहीं है। उनके अभिनय में एक बेचैनी थी। वे पात्र को निभाते नहीं थे, उसके भीतर उतर जाते थे। उनके चेहरे पर संवाद आने से पहले ही कहानी शुरू हो जाती थी।
क्रांतिवीर में उनका आक्रोश केवल एक फिल्मी किरदार का गुस्सा नहीं था। उसमें व्यवस्था से नाराज आम आदमी की बेचैनी दिखाई देती थी। परिंदा में हिंसा और अपराध के बीच फंसे मनुष्य की त्रासदी थी। अब तक छप्पन में कानून और अपराध के बीच खड़े पुलिस अधिकारी की कठोरता थी। और नटसम्राट में एक ऐसे कलाकार का अकेलापन था, जिसने पूरी जिंदगी मंच को दी, लेकिन अंत में जीवन ही उसके सामने सबसे बड़ा मंच बनकर खड़ा हो गया।
यही नाना की खूबी थी।
वे पर्दे पर जितने कठोर दिखाई देते थे, उनके भीतर उतनी ही गहरी संवेदना थी। उनकी आंखें भी अभिनय करती थीं और उनकी चुप्पी भी संवाद बन जाती थी। उनकी आवाज में जैसे कोई टूटी हुई घंटी बजती थी—कठोर, लेकिन बहुत दूर तक सुनाई देने वाली।
“लहजा सख्त था तो क्या, दिल में नमी भी थी,
वह आदमी था इसलिए आंखों में कमी भी थी।”
नाना पाटेकर उस दौर के अभिनेता थे, जब अभिनय को केवल चेहरा और संवाद नहीं माना जाता था। रंगमंच की साधना, चरित्र की समझ और जीवन की धूल को अपने भीतर समेटना भी अभिनय का हिस्सा था। मराठी रंगमंच और सिनेमा से आए नाना ने इस परंपरा को हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान दी।
उनका अभिनय हमें बताता था कि महान अभिनेता वह नहीं, जो हर दृश्य में दिखाई दे। महान अभिनेता वह है, जो दृश्य खत्म होने के बाद भी दर्शक के भीतर बना रहे।
नाना पाटेकर ऐसे ही अभिनेता थे।लेकिन उनके व्यक्तित्व का शायद सबसे महत्वपूर्ण पक्ष फिल्मों के बाहर दिखाई देता है—किसान, सूखा, गांव, पानी और उस किसान का संघर्ष, जिसकी जिंदगी मौसम और बाजार दोनों के भरोसे रहती है।
इन शब्दों को उन्होंने केवल भाषणों में नहीं सुना। महाराष्ट्र में किसानों की बदहाली और ग्रामीण संकट ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने नाम फाउंडेशन की स्थापना की और किसानों तथा सूखा प्रभावित गांवों के लिए काम किया। जल संरक्षण, गांवों के पुनर्जीवन और ग्रामीण परिवारों की सहायता के प्रयासों ने उनके सार्वजनिक जीवन को एक अलग अर्थ दिया।
यहीं नाना पाटेकर का दूसरा चेहरा सामने आता है।पर्दे पर आम आदमी की बेचैनी को आवाज देने वाला अभिनेता जीवन में भी आम आदमी के पास खड़ा दिखाई देता है।
यही वजह है कि नाना को केवल अभिनेता कहना उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना होगा। वे अभिनेता थे, लेकिन अभिनय उनके जीवन का पूरा परिचय नहीं था। उनके भीतर का मनुष्य उनके भीतर के अभिनेता से बड़ा था।
आज किसान की पीड़ा आंकड़ों में बदल जाती है। सूखा सरकारी रिपोर्ट का हिस्सा बन जाता है। आत्महत्या एक संख्या बन जाती है। गांव किसी परियोजना की इकाई बन जाता है। ऐसे समय में नाना पाटेकर की चिंता हमें याद दिलाती है कि आंकड़ों के पीछे भी कोई चेहरा होता है, कोई परिवार होता है, किसी मां की आंख होती है और किसी बच्चे का भविष्य होता है।
उनकी संवेदना इसलिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि वह कैमरे के सामने पैदा नहीं हुई थी। वह जीवन से आई थी।
नाना की लोकप्रियता का एक और पहलू अद्भुत था। जिस अभिनेता को क्रांतिवीर और परिंदा में देखकर दर्शक गंभीर हो जाते थे, वही वेलकम में उदय शेट्टी बनकर उन्हें हंसा सकता था। यही तो बड़ा अभिनेता करता है—वह अपने चेहरे को एक ही भाव का कैदी नहीं बनने देता।
गुस्से से हास्य तक, हिंसा से करुणा तक, कठोरता से टूटन तक—नाना पाटेकर ने अभिनय की पूरी जमीन पर कदम रखा।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद यह थी कि वे बनावटी नहीं लगे।
उन्होंने अपने अभिनय को चमकदार बनाने की कोशिश नहीं की। वे बस अभिनेता रहे। और शायद इसीलिए इतने बड़े हो गए।
आज सिनेमा में तकनीक है, भव्यता है, प्रचार है, करोड़ों का बाजार है। कैमरे पहले से अधिक सक्षम हैं और दृश्य पहले से अधिक चमकदार। लेकिन अभिनय की वह सादगी, जिसमें एक आदमी केवल अपनी आंखों और आवाज से पूरा दृश्य अपने कब्जे में कर ले, धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है।
नाना पाटेकर उसी दुर्लभ परंपरा के कलाकार थे।
उनके जाने पर मन में एक और पंक्ति उतरती है—
“परदा गिरा तो लगा कहानी खत्म हुई,
फिर याद आया—कुछ किरदार खत्म नहीं होते।”
नाना पाटेकर भी उन किरदारों में हैं, जो खत्म नहीं होंगे।
वे नटसम्राट के गणपत बेलवलकर में रहेंगे। वे क्रांतिवीर के प्रतिरोध में रहेंगे। परिंदा की बेचैनी में रहेंगे। अब तक छप्पन की कठोर आंखों में रहेंगे। वेलकम की हंसी में भी रहेंगे।
और शायद सबसे ज्यादा उन गांवों की स्मृतियों में रहेंगे, जहां किसी किसान के लिए पानी की एक बूंद बचाने की कोशिश की गई।
किसी कलाकार को श्रद्धांजलि देने का सबसे आसान तरीका है उसके बारे में बड़े-बड़े शब्द लिख देना लेकिन नाना पाटेकर जैसे कलाकार के लिए बड़े शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं।
उनकी असली श्रद्धांजलि उनकी फिल्मों को फिर से देखना भर नहीं है। उनकी असली श्रद्धांजलि उनके सवालों को फिर से सुनना है।
मनुष्य इतना अकेला क्यों है?किसान इतना असुरक्षित क्यों है?
व्यवस्था से आदमी का भरोसा क्यों टूटता है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या कला केवल मनोरंजन है या वह समाज के अंधेरे में एक छोटी-सी रोशनी भी जला सकती है?
नाना पाटेकर का जीवन इस अंतिम सवाल का उत्तर देता है।
हां, कला रोशनी जला सकती है।
एक संवाद से।
एक किरदार से।
एक आवाज से।
और एक संवेदनशील मनुष्य की छोटी-सी कोशिश से।
नाना पाटेकर की आवाज अब प्रत्यक्ष सुनाई नहीं देगी। लेकिन जिन्होंने उन्हें सुना है, देखा है और उनके अभिनय को महसूस किया है, उनके लिए वह आवाज अचानक मौन नहीं होगी।
वह किसी पुराने दृश्य से फिर उठेगी।
किसी संवाद में।
किसी किसान की चिंता में।
किसी बूढ़े कलाकार की आंख में।
किसी ऐसे आदमी के गुस्से में, जो व्यवस्था से पूछ रहा है—आखिर मेरी जिंदगी की कीमत क्या है?
तब शायद हमें महसूस होगा कि नाना पाटेकर गए नहीं हैं। उन्होंने केवल मंच बदला है।
पर्दे का मंच अब स्मृतियों का मंच हो गया है।
“जिसे आदमी की पीड़ा दिखाई देती है,
वह आदमी पूरी तरह कभी मरता नहीं।”
नाना पाटेकर को विनम्र श्रद्धांजलि।
उनकी कला को सलाम।
उनकी संवेदना को नमन।
और उस आवाज को प्रणाम, जिसने पर्दे से उतरकर जिंदगी से संवाद किया।