पवन शुक्ला अधिवक्ता
एक ऐसा अध्याय है,जिसे आम तौर पर तारीखों,कानूनों और राजनीतिक बहसों के चश्मे से देखा जाता है।लेकिन अगर हम किताबों की भाषा को छोड़कर अपनी रोज़मर्रा की बोलचाल और सामाजिक समझ के हिसाब से बात करें, तो आपातकाल का सीधा सा मतलब था—एक ऐसा दौर जब देश की आम जनता की ‘आज़ादी की आवाज़’ पर कुछ समय के लिए सरकारी ताला लग गया था।
इतिहास के पुराने आंकड़ों और रटी-रटाई बहसों से अलग हटकर, इसे एक सामाजिक नज़रिए से समझते हैं कि आखिर यह क्या था,इसका हमारी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ा और आज के दौर में यह हमारे लिए क्या सबक छोड़ गया है।
आपातकाल का सीधा मतलब
जब घर का मुखिया सारे हक अपने हाथ में ले ले
इसे समझने के लिए एक साधारण परिवार का उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए किसी परिवार में अचानक कोई बड़ी मुसीबत आ जाए,जैसे कोई भारी आर्थिक संकट या बाहर के लोगों से गंभीर झगड़ा। ऐसे में घर का मुखिया लोकतांत्रिक तरीका (यानी सबकी राय लेना) छोड़कर अचानक सारे फैसले खुद लेने लगता है। वह बच्चों के खेलने, बाहर जाने और बोलने तक पर पाबंदी लगा देता है।
ठीक ऐसा ही देश के स्तर पर हुआ था। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 352 सरकार को यह ताकत देता है कि जब देश पर कोई बड़ा संकट (जैसे युद्ध या आंतरिक अशांति) आए, तो सरकार सारी शक्तियां अपने हाथ में ले सकती है। 25 जून 1975 की आधी रात को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल के दस्तावेज़ पर दस्तखत किए,तो देश की तस्वीर रातों-रात बदल गई। आम नागरिकों को संविधान से मिले बुनियादी अधिकार,जैसे खुलकर अपनी बात कहना, सरकार का विरोध करना या बिना वजह जेल जाने से बचना, सब एक झटके में स्थगित हो गए।
सामाजिक ताने-बाने पर असर
डर और चुप्पी का माहौल
सामाजिक बोलचाल में कहें तो उस दौर ने लोगों के भीतर एक ‘अदृश्य डर’ पैदा कर दिया था। चाय की दुकानों, नुक्कड़ों या चौपालों पर जहाँ लोग खुलकर राजनीति पर चर्चा करते थे, वहाँ अचानक सन्नाटा पसर गया। लोगों को डर सताने लगा कि अगर उन्होंने सरकार या किसी नीति के खिलाफ ज़रा सा भी कुछ बोला, तो कोई उनकी मुखबिरी कर देगा और पुलिस उन्हें उठा ले जाएगी।
उस दौर में ‘सेंसरशिप’ लागू की गई थी। इसका सीधा मतलब यह था कि अखबारों में क्या छपेगा, यह पहले सरकारी अधिकारी तय करते थे। आज के सोशल मीडिया के दौर में जहाँ हम कुछ भी पोस्ट कर देते हैं, उस ज़माने में अखबारों के पन्ने खाली छोड़ दिए जाते थे क्योंकि सरकार उनकी खबरों को काट देती थी। समाज के लिए यह एक ऐसा झटका था, जिसने लोगों को यह अहसास कराया कि आज़ादी सिर्फ एक शब्द नहीं है, बल्कि वह खुली हवा है जिसके बिना इंसान का दम घुटने लगता है।
’अनुशासन’ बनाम ‘अधिकार’ की बहस
कुछ लोग आज भी इस बात की तारीफ करते हैं कि उस समय ‘सख्ती’ की वजह से सब कुछ कायदे से चल रहा था।
लेकिन यहाँ एक गहरा सामाजिक सवाल खड़ा होता है क्या डंडे के दम पर लाया गया अनुशासन कभी भी आज़ादी का विकल्प हो सकता है?
सच्चाई यह है कि डर से पैदा हुआ अनुशासन समाज को अंदर से खोखला कर देता है। जब लोगों के पास अपनी शिकायतें दर्ज कराने का हक ही नहीं बचा, तो प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस की मनमानी चरम पर पहुँच गई। जबरन नसबंदी जैसे कार्यक्रमों ने समाज के गरीब और पिछड़े तबके के भीतर एक गहरा खौफ पैदा कर दिया। लोग अपने ही घरों से भागने लगे। इससे यह साबित हुआ कि बिना जन-सहमति और बिना अधिकारों के, कोई भी व्यवस्था ज्यादा दिनों तक सुंदर या सफल नहीं रह सकती।
आम जनता की ताकत
अक्सर किताबों में आपातकाल के खत्म होने का श्रेय नेताओं के आंदोलनों को दिया जाता है। लेकिन सामाजिक नज़रिए से देखें तो असली हीरो भारत की आम जनता थी। 1977 में जब आपातकाल हटा और चुनाव हुए,तो देश के सबसे गरीब, अनपढ़ और साधारण समझे जाने वाले नागरिकों ने अपने वोट की ताकत से इतिहास बदल दिया।
उस चुनाव ने दुनिया को एक बहुत बड़ा संदेश दिया—भारत का आम आदमी भले ही शांत रहता हो,भले ही वह गरीबी या साक्षरता की कमी से जूझ रहा हो, लेकिन जब उसकी
‘आज़ादी’ और ‘आत्मसम्मान’
पर आंच आती है, तो वह बड़े से बड़े शक्तिशाली शासक को भी सत्ता से बेदखल करने की ताकत रखता है। यह भारतीय समाज की वह खामोश समझदारी थी, जिसने हमारे लोकतंत्र को हमेशा के लिए अमर बना दिया।
आज के संदर्भ में इसका सबक
सजगता ही असली आज़ादी है
आज जब हम एक डिजिटल और आधुनिक समाज में जी रहे हैं, तो हमें आपातकाल के उस काले दौर से क्या सीखना चाहिए? सबसे बड़ा सबक यह है कि लोकतंत्र कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक बार हासिल कर लिया तो वह हमेशा सुरक्षित रहेगी। लोकतंत्र एक पौधे की तरह है, जिसे हर नागरिक को अपनी जागरूकता और ज़िम्मेदारी के पानी से रोज़ सींचना पड़ता है।
आज के दौर में जब भी समाज में असहमति की आवाज़ों को दबाने की कोशिश होती है, या जब लोग बिना सोचे-समझे किसी भी पाबंदी को स्वीकार कर लेते हैं, तो आपातकाल की यादें हमें सचेत करती हैं। हमें यह समझना होगा कि सरकारें बदलती रहेंगी, नेता आते-जाते रहेंगे, लेकिन समाज का यह ताना-बाना, आपस में खुलकर बात करने की आज़ादी और एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना ही इस देश की असली आत्मा है।
आपातकाल का इतिहास हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि यह याद दिलाने के लिए है कि हमारी आज़ादी कितनी कीमती है। सामाजिक बोलचाल में कहें, तो यह एक ऐसा कड़वा सबक था जिसने भारत के नागरिकों को हमेशा के लिए ‘सचेत और सयाना’ बना दिया।