पर्यावरण रक्षा सर्वोपरि फर्ज प्रकृति नहीं तो सब है बेकार

enviromentहमारे पास सब कुछ है लेकिन पर्यावरणीय सौन्दर्य नहीं है तो सारे संसाधन,

भौतिक संपदा और जीवन व्यवहार सब निरर्थक है। प्रकृति के खुले आँगन में

रहते हुए जिन तत्वों और नैसर्गिक ऊर्जाओं के निरन्तर पुनर्भरण की

प्रक्रिया अहर्निश चलती रहती है वही वस्तुतः जीवन है। इसके अलावा जो कुछ

है सब जड़ है।

प्रकृति के रंगों और रसों से परिपक्व जीवन ही शाश्वत आनंदमय है, इसके

बिना जो कुछ है वह दिखावा और बोझ के सिवा कुछ नहीं है। जिस प्रकृति से

हमें जीवन प्राप्त होता है, नूतन ऊर्जाओं का संचार होता है, सामथ्र्य

प्राप्त होता है और मनुष्य योनि में ही दैवत्व और दिव्यत्व का अहसास होता

है उसी प्रकृति को रौंदने में हमने हाल के दशकों में जो कुछ किया है उसका

परिणाम हमें भुगतना पड़ रहा है।

आज दो मिनट के लिए लाईट चली जाए तो हम हाहाकार कर उठते हैं, जरूरत के

मुताबिक बरसात न हो, धरती माता पर्याप्त अन्न उपजाने की स्थिति में न हो,

ग्लोबल वार्मिंग और दूसरे खतरों का साया मण्डराने लगे तब हम हैरान हो

उठते हैं और चिंता करने लगते हैं। जबकि प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ हमने

किया है उसी का यह परिणाम है जिससे सबक लेना चाहिए।

प्रकृति के भरपूर आनंद को हम भुला बैठे हैं और हमारा पूरा जीवन इतना

पराश्रित हो गया है कि बिना संसाधनों और परायी ऊर्जाओं के हमारी जिन्दगी

बेकार लगने लगी है। सारे के सारे उपकरणों का इस्तेमाल भी हम तभी कर पाते

हैं जब बाहर से कोई बिजली मिले। यहां तक कि नैसर्गिंक ताजगी के अभाव में

हमारा स्वास्थ्य भी अब प्रकृति की बजाय डॉक्टरों के हाथ में आ गया है

जहां हमें रोजाना कुछ न कुछ गोलियां नाश्ते के रूप में लेने की विवशता

है।

अपने आसुरी स्वार्थों, हद दर्जे के शोषण और प्रकृति को दो-दो हाथों लूटने

में हमने कोई कमी बाकी नहीं रखी है। इसी का कारण है कि प्रकृति पहले जहाँ

हमें उपहार देकर प्रसन्न रखने की कोशिश करती थी, आज वह हम पर कुपित होती

जा रही है और आने वाले समय में कितनी कुपित होगी, इसकी हम कल्पना भी नहीं

कर सकते हैं।

हमने प्रकृति की पूजा छोड़ दी, आदर-सम्मान और संरक्षण का सदियों से चला आ

रहा भाव छोड़ दिया और ऎसे में हम प्रकृति से कोई उम्मीद रखने लायक बचे ही

नहीं हैं। पंच तत्वों से संबंधित सभी प्रकार के कारकों के संरक्षण और

संवद्र्धन में हमें जो शक्ति लगानी चाहिए थी वह हमने अपने स्वार्थ में

झोंक दी है।

धर्म के नाम पर हम जाने कितने मन्दिरों और मठों, अनुष्ठानों, यज्ञों और

कर्मकाण्ड के नाम पर अनाप-शनाप पैसा बहा रहे हैं। देवी-देवताओं को रिझाने

के लिए वह सब कुछ कर रहे हैं जो हमें अपराध बोध से मुक्ति दिलाने और

पापों को पुण्य में बदलने के सारे भ्रमों को आकार देता है। लेकिन पंच

तत्वों व प्रकृति के प्रति हम घोर उदासीन हैं और ऎसे में देवता या

देवियों को प्रसन्न करने की बातें बेमानी ही हैं।

आज मन्दिरों के निर्माण, प्रतिष्ठा और शिलापूजन के नाम पर खूब धंधे चल

रहे हैं, पण्डितों की एब बहुत बड़ी जमात पंच तत्वों को सिर्फ मंत्रों में

उच्चारित कर अपने कत्र्तव्य की इतिश्री मान रही है और जगह-जगह भगवान के

नाम पर अरबों रुपया बहाया जा रहा है।

जो लोग ईश्वर को पाना चाहते हैं उन्हें एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए

कि ईश्वर को प्रकृति की रमणीयता पसंद है, शिलाएं, पत्थर, लोह-लक्कड़,

आरसीसी, धर्मशालाएं और भव्य मन्दिर नहीं।

जिस मन्दिर के परिसर में पंच तत्वों का भरपूर समावेश न हो, वहां ईश्वर का

अस्तित्व कभी नहीं हो सकता। वहाँ स्थापित मूर्तियों को भले ही प्राण

प्रतिष्ठित कहा जाए, मगर उनमें दैवत्व नहीं होता। दैवत्व उसी मन्दिर में

होता है जो प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच अवस्थित हो। तभी तो हम अपने यहां

लाखों देव मन्दिरों के होने के बावजूद ईश्वर का अनुभव करने उत्तराखण्ड की

यात्रा करते हैं।

जहाँ पेड़-पौधे और हरियाली, जलाशय, खुला स्थान आदि नहीं होता है वहां

कितना ही बड़ा, मशहूर और भव्य मन्दिर क्यों न हो, भगवान वहाँ विराजमान

नहीं रहते हैं। ऎसे मन्दिरों पर किसी को सुकून नहीं मिल सकता। धर्म के

नाम पर धंधा चलाने वालों के लिए ये मन्दिर टकसाल जरूर साबित हो सकते हैं

लेकिन इनका कोई औचित्य नहीं।

इसी प्रकार वाणिज्यिक या आवासीय कॉलोनियां हों अथवा परिसर, उन सभी में भी

पर्याप्त खुला स्थान, पेड़-पौधे और हरियाली, जलाशय आदि का होना नितान्त

आवश्यक है अन्यथा ये बस्तियां अभिशप्त ही होती हैं और इनका वास्तुपुरुष

कभी प्रसन्न नहीं रहता है।

अपने आस-पास के पर्यावरण को सुरक्षित रखें, ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे

लगाएं और पर्यावरण के प्रति समर्पित भागीदारी निभाएं तभी आने वाली

पीढ़ियां याद रख पाएंगी अन्यथा श्वानों और सूकरों की तरह खुद का पेट और

घर भर पाने के सिवा हमारे भाग्य में कुछ भी अच्छा नहीं है।

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