-अशोक “प्रवृद्ध”
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाली चैत्र अर्थात वासन्तीय नवरात्र की वैदिक और प्राचीन अवधारणा प्रकृति के पुनर्जन्म, शक्ति के संचय और आत्मशुद्धि से गहराई से जुड़ी है। इसे प्राचीन ग्रंथों में वासन्तिक नवरात्र कहा गया है, क्योंकि यह वसंत ऋतु के संधिकाल में मनाया जाता है। इसके साथ ऋतु परिवर्तन और संधिकाल का विज्ञान छिपा है। वैदिक विज्ञान के अनुसार चैत्र मास प्रकृति के दो प्रमुख ऋतुओं, शिशिर और वसंत का संधिकाल है। इस समय वातावरण में बदलाव के कारण शरीर और मन की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है, जिसके लिए व्रत और संयम के माध्यम से शारीरिक और मानसिक शुद्धि की जाती है। प्राचीन अवधारणा के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात नवरात्र के प्रथम दिन को ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी दिन से भारतीय नववर्ष विक्रम संवत की शुरुआत होती है, जो इसे नई शुरुआत का प्रतीक बनाता है। यह सृष्टि का आरंभ अर्थात नव संवत्सर का दिन है। यद्यपि नवरात्र का विस्तृत वर्णन देवी भागवत पुराण में मिलता है, तथापि इसकी जड़ें वेदों में शक्ति या अदिति अर्थात देवताओं की माता की उपासना में निहित हैं। वैदिक अवधारणा में इसे इदम् अर्थात निर्विकार परमतत्व से ईशम अर्थात कर्तारूप ऊर्जा की ओर जाने की प्रक्रिया माना गया है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र नवरात्र की नवमी (रामनवमी) को हुआ था, जिस कारण इसे राम नवरात्र के रूप में भी प्राचीन काल से मान्यता प्राप्त है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार ये नौ रातें नवधा भक्ति, आध्यात्मिक शुद्धि और आत्म-साक्षात्कार का समय हैं, जहां साधक बाहरी दुनिया से कटकर अपने मूल स्रोत की ओर लौटता है। वासन्तीय नवरात्र में कलश स्थापना अर्थात घटस्थापना को ब्रह्मांड के प्रतीक और शक्ति के आवाहन के रूप में देखा जाता है। ऋग्वेद के अनुसार कलश पूर्णकुंभ यानी प्रचुरता और जीवन के स्रोत का प्रतीक है। वैदिक दर्शन के अनुसार कलश के विभिन्न भाग देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुख भगवान विष्णु का, कंठ महादेव शिव का, मूल ब्रह्मा का, मध्य भाग समस्त देवी और मातृशक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्राचीन अवधारणा में कलश को वरुण देव और सभी तीर्थों का निवास माना जाता है। घर की उत्तर या उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण दिशा में पूजा स्थल चुनना चाहिए। जौ, गेहूं आदि सप्तधान्य मिश्रित शुद्ध मिट्टी की एक वेदी बनाना चाहिए। तांबे या मिट्टी के कलश पर रोली से स्वास्तिक बनाना चाहिए। और उसके मुख पर मौली (कलावा) बांध कलश में शुद्ध जल और गंगाजल भरना चाहिए। इसमें सिक्का, सुपारी, अक्षत, दूर्वा, हल्दी की गांठ, लौंग और इलायची डाल कलश के मुख पर आम या अशोक के 5 पत्ते रखें। एक नारियल को लाल कपड़े या चुनरी में लपेटकर, कलावा बांधकर पत्तों के ऊपर इस तरह रखना चाहिए कि उसका मुख ऊपर या आपकी ओर हो। कलश के पास अखंड ज्योति या घी का दीपक जलाना चाहिए। पूजन के समय जल भरते समय, तीर्थ आवाहन, वरुण देव आवाहन (मुख्य मंत्र), भूमि स्पर्श मंत्र, शक्ति आवाहन मंत्र, संपूर्ण नवरात्र हेतु नवार्ण आदि मंत्रों का उच्चारण अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
वासन्तीय नवरात्र की पौराणिक अवधारणा मुख्य रूप से शक्ति के प्राकट्य, असुरों के संहार और सृष्टि के संरक्षण के इर्द-गिर्द घूमती है। पुराणों में इसका वर्णन विशेष रूप से देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य में मिलता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चैत्र नवरात्र वह समय है, जब देवी दुर्गा ने देवताओं के तेज से प्रकट होकर महिषासुर नामक असुर के विरुद्ध युद्ध का बिगुल फूँका था। माना जाता है कि इसी संधिकाल में शक्ति का पूर्ण प्राकट्य हुआ था। प्रलय के बाद सृष्टि का पुनरुद्धार हुआ था। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार जब प्रलय काल के बाद ब्रह्मा को सृष्टि का विस्तार करना था, तब उन्होंने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को देवी की आराधना की। देवी की कृपा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना का कार्य पूर्ण किया, इसीलिए यह दिन पौराणिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र है। प्राचीन पौराणिक कालक्रम के अनुसार सत्ययुग में चैत्र नवरात्र ही सबसे प्रमुख थे। त्रेतायुग में भगवान राम ने रावण वध के लिए अकाल बोधन (शारदीय नवरात्र) किया, तब से अश्विन नवरात्र अधिक प्रचलित हुए, अन्यथा मूलतः वसंत के नवरात्र ही महा नवरात्र माने जाते थे। इससे संबंधित एक प्रचलित कथा राजा सुरथ और समाधि वैश्य से जुडी हुई है। देवी महात्म्य के अनुसार राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने अपना राज्य और शांति खोने के बाद महर्षि मेधा के आश्रम में चैत्र मास में ही मृण्मयी मूर्ति अर्थात मिट्टी की प्रतिमा बनाकर देवी की आराधना की थी, जिससे उन्हें अपना खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त हुआ। पौराणिक पूजा पद्धति पूरी तरह दुर्गा सप्तशती पर आधारित है, जिसमें भगवती के तीन मुख्य स्वरूपों- महाकाली (तमस), महालक्ष्मी (रजस) और महासरस्वती (सत्व), की आराधना कर चेतना को जागृत किया जाता है। देवी भागवत पुराण आदि पौराणिक ग्रंथों के अनुसार नवरात्र की नौ देवियाँ अर्थात नवदुर्गा भगवती के क्रमिक विकास और उनकी दिव्य शक्तियों का प्रतीक हैं। इनकी कथाएं जीवन के नौ सोपानों को दर्शाती हैं। शैलपुत्री नाम हिमालय (शैल) की पुत्री के रूप में जन्म होने के कारण हुआ। यह दृढ़ता और स्थिरता का प्रतीक हैं। पूर्व जन्म में ये सती थीं। ब्रह्मचारिणी स्वरूप में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की। ब्रह्म का अर्थ तप और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली है। चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है। जब असुरों का आतंक बढ़ा, तो इनके घंटे की भयानक ध्वनि से दानव मूर्छित हो गए। यह वीरता का स्वरूप हैं। कुष्माण्डा के रूप में इन्होंने अपनी मंद मुस्कान से अण्ड (ब्रह्मांड) उत्पन्न किया। ये सृष्टि की आदिशक्ति हैं। स्कंदमाता स्वरूप में भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं। यह वात्सल्य और ममता की मूर्ति हैं, जो भक्त को मोक्ष प्रदान करती हैं। कात्यायनी के रूप में महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके यहां पुत्री रूप में जन्मीं। इन्होंने ही महिषासुर का वध किया था। कालरात्रि स्वरूप देवी का अत्यंत विकराल रूप है। असुरों के विनाश के लिए इन्होंने यह रूप धरा। यह अंधकार और भय का नाश करने वाली हैं। महागौरी के स्वरूप में कठोर तप के बाद जब इनका शरीर काला पड़ गया, तब शिव ने गंगाजल से इन्हें धोया, जिससे ये अत्यंत गौर (श्वेत) हो गईं। ये शांति और पवित्रता की देवी हैं। सिद्धिदात्री स्वरूप में ये अणिमा, महिमा आदि सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली हैं। स्वयं भगवान शिव ने इनसे ही सिद्धियां प्राप्त की थीं। इन नौ स्वरूपों की पूजा का अर्थ है- अपने भीतर के तमस (अंधकार) को मारकर सात्विकता (प्रकाश) की ओर बढ़ना।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से वासन्तीय नवरात्र केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है। ज्योतिष शास्त्र में इसे ऊर्जा के परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली समय माना जाता है। इस समय सूर्य का राशि परिवर्तन होता है। वासन्तीय नवरात्र के आस-पास सूर्य अपनी नीच राशि (मीन) से निकलकर अपनी उच्च राशि (मेष) में प्रवेश करते हैं। ज्योतिष में सूर्य को आत्मा और ऊर्जा का कारक माना गया है। सूर्य का यह संक्रमण मनुष्य के आत्मविश्वास और जीवनी शक्ति को बढ़ाता है। चैत्र नवरात्र की प्रतिपदा से ही नव संवत्सर का आरंभ होता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस दिन के गृह-नक्षत्रों की स्थिति पूरे वर्ष के भविष्य का निर्धारण करती है। इस समय चंद्रमा और सूर्य का मिलन एक नई मानसिक और भौतिक शुरुआत को जन्म देता है। ज्योतिष और आयुर्वेद के अनुसार इस समय ऋतु संधि अर्थात दो ऋतुओं का मिलन होती है। ब्रह्मांड में ग्रहों की स्थिति बदलने से शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ता है। नवरात्र के नौ दिनों के व्रत और नियम इन ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव को कम कर शरीर को शुद्ध करते हैं। ज्योतिष में प्रत्येक देवी का संबंध एक विशिष्ट ग्रह से माना गया है, जिनकी पूजा से कुंडली के दोष शांत होते हैं। शैलपुत्री का संबंध चंद्र ग्रह, ब्रह्मचारिणी का मंगल ग्रह, चंद्रघंटा का शुक्र ग्रह, कुष्माण्डा का सूर्य ग्रह, स्कंदमाता का बुध ग्रह, कात्यायनी का बृहस्पति ग्रह, कालरात्रि का शनि ग्रह, महागौरी का राहु और सिद्धिदात्री का केतु से घर संबंध है। इन नौ दिनों में अक्सर सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और पुष्य नक्षत्र जैसे शुभ संयोग बनते हैं। ज्योतिषीय मान्यता है कि इन योगों में की गई साधना या शुरू किया गया कार्य बिना किसी बाधा के सफल होता है।