लेखक परिचय

राखी रघुवंशी

राखी रघुवंशी

संपर्क- ए/40, आकृति गार्डन्स, नेहरू नगर, भोपाल

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-राखी रघुवंशी

हाल ही में केन्द्र सरकार ने मलिन बस्तियों के लोगों को गंदगी, बीमारी, असुरक्षा और अपराध के जीवन से बचाने के लिए अगले पांच सालों में शहरों को पूरी तरह से झुग्गी-झोपड़ियों से मुक्त कराने का लक्ष्य घोषित किया है। वर्ष 2009-10 के बजट में भी कहा गया है कि शहरों में विशेष आवासीय योजनाऐं शुरू करके मलिन बस्तियों को निर्मल बस्तियों में परिवर्तित किया जाएगा। देश में स्लम में रहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस समय देश भर में 6 करोड़ से भी ज्यादा लोग स्लम में रहते हैं। 2001 की जनगणना के दौरान 50 हजार और उससे भी उपर की जनसंख्या वाले 640 शहरों में रह रहे लोगों की भी पहली बार अलग से गणना की गई। इस गिनती से पता चला कि इन शहरों में 4 करोड़ 26 लाख लोग स्लम बस्तियो में रह रहे हैं। यह संख्या इन शहरों की कुल आबादी के 23 प्रतिशत से भी कुछ अधिक है।

केन्द्रीय आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि 2001 की जनगणना के बाद महानगरों व सभी छोटे-बड़े शहरों में स्लम बस्तियों का फैलाव बढ़ा है। इन बस्तियों में मूलभूत सुविधाओं और अन्य नगरीय इन्फ्रास्टक्चर का पूरी तरह से अभाव है, रहने को प्लास्टिक के तिरपाल से ढकी झुग्गियां हैं। यकीनन शहरों में मलिन बस्तियों की स्थिति भयावह होती जा रही है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009 में देश के शहरों में रहने वाले 30 करोड़ लोगों में से आठ करोड़ लोग गरीब हैं। इनमें से चार करोड़ से भी अधिक लोग 52 हजार मलिन बस्तियों में जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। इन मलिन बस्तियों को देश में कहीं तंग बस्ती, कहीं झोपड़-पटटी, तो कहीं झुग्गी बस्तियों के नाम से जाना जाता है। नाम भले ही अलग अलग हों, लेकिन इनकी पीड़ाऐं, इनकी समस्याऐं एवं स्थिति देश के सभी शहरों में एक जैसी है।

नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन की मलिन बस्तियों की स्थिति पर रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के नगरों महानगरों की मलिन बस्तियों में लोग कदम-कदम पर कठिनाईयों और बदतर हालत के बीच नरकीय जीवनयापन के लिए विवश हैं। ये जीवन की मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित हैं। उन्हें न तो रहने की पर्याप्त जगह मिल पाती है और न ही उन्हें पीने के लिए स्वच्छ पानी मिल पाता है। स्थिति इतनी विकट है कि तीन चौथाई मलिन बस्तियों में शौचालय और लगभग एक तिहाई में जल निकास व जल-मल निकास की सुविधाओं का पूर्णत: अभाव है। इन बस्तियों में प्रतिदिन निकलने वाले कूड़े करकट को हटाने और ठिकाने लगाने की व्यवस्था नहीं है। इन बस्तियों के आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। बस्तियों में रहने वाले परिवारों में बाल मृत्यू दर, स्वच्छ आवास एवं पर्यावरण में रहने वाले शहरी परिवारों के मुकाबले तीन गुनी है। स्लम में रहने वाले लोग गंदगी, बीमारी, भूख और अन्य हादसों में बड़ी संख्या में अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। विडम्वना यह है कि इनमें से लगभग आधे से ज्यादा सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हैं। इसी कारण बहुत सी सरकारी विकास योजनाओं का लाभ इन मलिन बस्तियों में रहने वालों को नहीं मिल रहा है। इतना ही नहीं बस्तियों की सुविधा के लिए कार्यरत बहुत सी एंजेसियों और योजनाओं के बीच समन्वय नहीं होने के कारण इन बस्तियों की दयनीय स्थिति में सुधार नहीं आ पाता। हालांकि केन्द्र सरकार बस्ती को शहर के हिस्से के तौर पर स्वीकार करते हुए वहां बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए मानक तैयार कर रही है। केन्द्र सरकार ने राज्यों के सहयोग से मास्टर प्लान में बदलाव की मुहिम छेड़ने का आग्रह किया है। राज्यों से कहा जा रहा है कि मलिन बस्ती मुक्ति का अभियान चलाकर शहरी नियोजन के मौजूदा मॉडल को बदलें।

शहरों में बढ़ती स्लम की संख्या को रोकने के लिए जरूरी है कि विस्थापन को रोका जाए, साथ ही मूल स्थान पर रोजगार मुहैया कराने के लिए नरेगा को और व्यापक व कारगर बनाना होगा। गांव के आसपास नए रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। हमारे देश में शहरों के मास्टर प्लानों में संशोधन करके गरीबों को शहरी विकास प्रक्रिया का अंग बनाकर गरीबों के कदमों को मलिन बस्तियों में जाने से रोका जा सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में टाउन प्लानिंग, अर्बन डवलपमेंट और म्युनिसिपल एरिया से जुड़े कानूनों में जरूरी संषोधन करने होंगे। साथ ही शहरी गरीबों के लिए नरेगा की तरह ही रोजगार योजना शुरू करके मलिन बस्तियों के लोगों को भी नए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे। यह अति आवष्यक है कि केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर बेहतर सोच, दृढ़ इच्छाशक्ति और सुनियोजित रणनीति अपनाकर शहरों को झुग्गी-झोपड़ियों से मुक्त कराएं।

मंत्रालय अधिकारियों का कहना है कि जवाहर लाल नेहरू नैशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन के तहत देश के 65 शहरों की स्लम बस्तियों में नगरीय सुविधाऐं मुहैया कराने और इन्फ्रास्टक्चर डिवलेप करने की योजना है। जो शहर इस योजना के तहत शामिल नहीं है, उन्हें इंटे्रग्रेटिड हाउसिंग एंड स्लम डिवलेपमेंट प्रोग्राम के तहत लाया गया है, इस मिशन का टारगेट 2012 रखा गया है। केन्द्र के जेएलएनयूआरएम में शामिल भोपाल, इंदौर सहित प्रदेश के चार शहरों में से एक भी इस योजना के पुरस्कार की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। चार वर्षों के दौरान इन शहरों में 730 करोड़ रूपए खर्च हो गए, लेकिन एक भी काम इनाम के योग्य नहीं पाया गया।

शहरी विकास के लिए बनने वाली नीतियों में शहरी गरीबों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की बात हमेशा की जाती है, लेकिन नीतियों के क्रियान्वयन के स्तर पर गरीबों के हित में अधिकांश प्रावधान दस्तावेजों तक ही सीमित हो जाते हैं। ये गरीब मेहनतकश लोग सरकारी आंकड़ों से भी गायब हैं। उदाहरण के लिए जनगणना 2001 के अनुसार राजधानी भोपाल में 1.26 लाख लोग गंदी बस्तियों में निवासरत हैं। राज्य सरकार के अध्ययन अनुसार भोपाल में 4.35 लाख झुग्गीवासियों की संख्या है, जबकि स्वयंसेवी संस्था आक्सॅफेम द्वारा वर्ष 2006 में कराये गये सर्वे के अनुसार भोपाल में लगभग 10.62 लाख लोग शहर की 543 गरीब बस्तियों में रहते हैं जो कि शहर की कुल आबादी का लगभग 60 प्रतिशत है।

राष्टीय गंदी बस्ती विकास कार्यक्रम के अंतर्गत भारत सरकार से 70 प्रतिशत ऋण और 30 प्रतिशत अनुदान प्राप्त होता है। इस कार्यक्रम के तहत बस्ती में मूलभूत सुविधाओं का विकास जैसे- जल आपूर्ति, सामुदायिक स्नानगृह, सीवर, सामुदायिक शौचालय, सड़के, आदि की व्यवस्था की जाती है। राज्य की पर्यावरण सुधार योजना के तहत मलिन बस्तियों के रहवासियों को पेयजल, नाली, सड़क, बिजली, और सार्वजनिक शौचालय की सुविधा देने की व्यवस्था है। यदि हम ऐसा कर पाए तो ही स्लम के लाखों लोगों को अच्छे जीवनयापन की खुशियां और शहरों को स्वस्थ विकास की नई दिशाएं मिल पाएगीं।

One Response to “शहरी गरीबी का उपेक्षित चेहरा”

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