लेखक परिचय

संजय कुमार

संजय कुमार

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।समाचार संपादक, आकाशवाणी, पटना पत्रकारिता : शुरूआत वर्ष 1989 से। राष्ट्रीय व स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में, विविध विषयों पर ढेरों आलेख, रिपोर्ट-समाचार, फीचर आदि प्रकाशित। आकाशवाणी: वार्ता /रेडियो नाटकों में भागीदारी। पत्रिकाओं में कई कहानी/ कविताएं प्रकाशित। चर्चित साहित्यिक पत्रिका वर्तमान साहित्य द्वारा आयोजित कमलेश्‍वर कहानी प्रतियोगिता में कहानी ''आकाश पर मत थूको'' चयनित व प्रकाशित। कई पुस्‍तकें प्रकाशित। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा ''नवोदित साहित्य सम्मानसहित विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा कई सम्मानों से सम्मानित। सम्प्रति: आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना में समाचार संपादक के पद पर कार्यरत।

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-संजय कुमार

”जनगणना 2011” में जातिगत जनगणना की चर्चा से ही भूचाल सा आ गया है। मीडिया में एक तरह का अघोषित युद्ध लेखकों ने छेड़ रखा है। कोई विरोध में खड़ा है तो कोई समर्थन में। हाल आरक्षण वाला है। तर्क पर तर्क दिये जा रहे हैं। सच्चाई को दरकिनार कर हर कोई अपनी बात मनवाने में लगा है कि वह जो कह रहा है वहीं सच है बाकि सब गलत? लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जातिगत जनगणना का विरोध आखिर क्यों? तर्क दिया जा रहा है कि इससे मानव-मानव में दूरी बढ़ेगी? जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा? सच यह है कि आज के भारतीय वर्ण व्यवस्था वाले समाज में हर कोई इसके घेरे में हैं। मजेदार बात यह है कि इस वर्ण व्यवस्था में कई जगहों पर लोगों को आवेदन फॉम आदि दस्तावेजों पर अपनी जाति भरनी पड़ती है। वैसे कोई भी इसका विरोध नहीं करता है। मसला जनगणना का है और बौखलाहट शायद इसके कथित परिणाम से?

आजादी के इतने साल बाद भी सवर्ण सामाजिक व्यवस्था में किसी ने दलितो को अपनाने व बराबरी का दर्जा नहीं किया? आज भी उनके मंदिर में घुसने पर अघोषित रोक है, हक की बात करने पर दलित की जीभ काट ली जाती है, सरेआम मारा-पिटा जाता है, उनके लिए अलग से कुंआ…..और न जाने क्या-क्या? दलितों के साथ होते अन्याय की चर्चा आये दिन मीडिया में होती रहती है। कहने के लिए उन्हें आरक्षण मिला है, जिस पर समाज का एक तबका नाक-भौं सिकोड़ता रहता है। वर्षो से समाज के अंदर जो बराबरी-गैरबराबरी का मामला है-बरकरार है। सवाल उठता है कि क्या सवर्ण समाज ने दलितों को बराबरी का दर्जा दिया है? आश्‍चर्य है कि आज हम जाति का विरोध कर रहे है। विराध करने वालों ने कभी जाति आधारित समाज के खात्मे की बात की है? किया भी तो हलके ढंग से। जातिगतसूचक सरनेम को हटा नहीं पाये। बात केवल दलितों के लिए नहीं है यही बात ओबीसी के साथ भी है। खतरा सवर्ण समाज को दिखने लगा है। समाज की बागडोर अपने पास रखने वाले सवर्ण समाज की जब जातिगत व्यवस्था को तोड़ने में कोई भूमिका नहीं रही तो आखिर जातिगत जनगणना से उनके पेट में गुदगुदी क्यों। चलिये 1914 में एक डोम की लिखी कविता पर नजर डालते हैं जो आज भी देश के कई क्षेत्रों में इसकी प्रासंगिकता साफ नजर आती है।

”अछूत की शिकायत”

हीरा डोम

हमनी के राति दिन दु:खवा भोगत बानी

हमनी के सहेब से मिली सुनाइबि।

हमनी के दु:ख भगवानओ ने देख ताजे,

हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।

पादरी सहेब के कचहरी में जाइबजां,

बेधरम होके रंगरज बनी जाइबि।

हाय राम! धरम न छोड़ते बनत बाते

बेधरम होके कैसे मुहंवा देखाइबि।

खंभवा के फारि पहलाद के बचवले जां,

ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले।

धोती जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,

परगट होके तहां कपड़ा बढ़बले।

मरले रवनवां के पलले भभिखना के,

कानी अंगुरी पै धैके पथरा उठवले।

कहवां सुतल बाटे सुनत न बाटे अब,

डोम जानि हमनी के छुए से डेरइले ।

हमनी के राति दिन मेहनत करीलेजां,

दुइगो रुपयवा दरमहा में पाइबि।

ठाकुर के सुखसेत घर में सुतल बानीं,

हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि।

हाकिमे कै लसकरि उतरल बानीं,

जेत उहओं बेगरिया में पकरल जाइबि।

मुंह बान्हि ऐसन नोकरिया करत बानीं,

ई कुलि खबरि सरकार के सुनाइबि।

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,

ठाकुरे के लेखे नहि लउरी चलाइबि।

सहुआ के लेखे नहि डांडी हम मारबजां,

अहिरा के लेखे नहि गइया चोराइबि।

भंटउ के लेखेन कवित्ता हम जोरबजां,

पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि।

अपने पसिनवां के पइसा कमाइबजां,

घर भर मिली जुली बांटि चोंटि खाइबि।

हड़वा मसुइया कै देहियां है हमनी कै,

ओकरै के देहियां बभनओं कै बानी।

ओकरा के घरै-घरै पुजवा होखत बाजे,

सगरै इलकवा भइलैं जजमानी।

हमनी के इनरा के निगिचे न जाइलेजां,

पांके में से भरि भरि पियतानी पानी।

(‘सरस्वती’ के सितम्बर,1914 में प्रकाशित)

हीरा डोम ने उस समय के दलित संवेदना को जिस ढंग से कविता में रखा उसका स्वरूप आज भी बरकरार है। दलित के दु:ख दर्द और उसके पीड़ा के प्रति समाज ही नहीं भगवान द्वारा आंख मूंद लेने पर उन्हें कोसते हुए, उस पीड़ा से निकलने के लिए धर्मान्तरण की तरफ मुखतिब होता है लेकिन अंतिम क्षण में उसे खारिज कर देता है। और इसके पीछे दलित का आत्म सम्मान (कैसे मुहंवा देखाइबि) सामने आ जाता है। हीरा डोम कहते हैं-

हमनी के दु:ख भगवानओं ने देख ताजे,

हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।

पादरी सहेब के कचहरी में जाइबजां,

बेधरम होके रंगरज बनी जाइबि।

हाय राम ! धरम न छोड़ते बनत बाते

बेधरम होके कैसे मुहंवा देखाइबि।

ऐसा नहीं कि हीरा डोम भगवान से डर कर धर्मान्तरण को खारिज करते हैं बल्कि अगले ही क्षण उनकीकविता डोम को छूने से डरे भगवान के सामने खड़ा हो जाता है।

खंभवा के फारि पहलाद के बचवले जां,

ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले।

धोती जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,

परगट होके तहां कपड़ा बढ़बले।

मरले रवनवां के पलले विभीषण के,

कानी अंगुरी पै धैके पथरा उठवले।

कहवां सुतल बाटे सुनत न बाटे अब,

डोम जानि हमनी के छुए से डेरइले ।

खंभा फांड कर प्रह्लादद को, ग्राह के मुंह से गजराज को, द्रोपदी को बचाने के लिए कपड़ा देने, रावण को मारने व विभीषण को पालने, कानी उंगली पर पहाड़ उठाने वाले भगवान से हीरा डोम साफ शब्दों में कहते हैं कहां सोये हैं, सुनते नहीं या डोम को छूने से डरे हैं? डोम से डरे भगवान अपने आप कई सवाल छोड़ जाता है। भगवान और समाज डोम के स्पर्श से भले ही कतराते हो। लेकिन कहा जाता है कि इसी सामाजिक व्यवस्था में डोम के बिना मरने वालों को मोक्ष नहीं मिलता है। श्मसान घाट पर डोम राजा के हाथों दी गयी अग्नि से चिता को आग के हवाले किया जाता है। कैसी विडंबना है कि जीते जी डोम के स्पर्श से कतराने वालों को जीवन के अंतिम क्षण में डोम की याद आती है। दूसरी ओर हीरा डोम की भगवान से शिकायत आज भी प्रासंगिक है। आये दिन खबर आती है कि समाज के ठेकेदारों ने गाहे-बगाहे मंदिर में ताला जड़ कर दलितों को पूजा पाठ व भगवान के दर्षन से रोका। तभी तो हीरा डोम कहते है कि भगवान प्रह्लाद को, ग्राह को, द्रौपदी आदि को बचाने आते लेकिन डोम को छूने से डरते हैं ?

कविता में हीरा डोम ने श्रम को भी मुद्दा बनाया है। दलितों के काम को गंदा व घिनौना माना जाता रहा है। इसके जवाब में हीरा डोम अन्य जातियों के श्रम पर सवाल उठाते हैं। और कहते हैं-

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,

ठाकुरे के लेखे नहि लउरी चलाइबि।

सहुआ के लेखे नहि डांडी हम मारबजां,

अहिरा के लेखे नहि गइया चोराइबि।

भंटउ के लेखेन कवित्ता हम जोरबजां,

पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि।

अपने पसिनवां के पइसा कमाइबजां,

घर भर मिली जुली बांटि चोंटि खाइबि।

मतलब, ब्राह्मणों की तरह हम भीख नहीं मांगेंगे, ठाकुरों की तरह लाठी नहीं चलायेगे, बनियों की तरह डंडी नहीं मारेंगे, अहीरों की तरह गाय नहीं चरायेगे……….। हाँ हम अपने पसीने से पैसा कमायेगे और मिल बांट कर खाएंगे। यह बात आज के तथाकथित स्वर्ण समाज के गाल पर तमाचा भी है। जब-जब आरक्षण का सवाल उठा तब-तब स्वर्णों ने आंदोलन चला कर विरोध किया। आंदोलन के दौरान झाडू लगाने, जूता में पॉलिस लगाने आदि श्रम को अपनाते हुए विरोध करते हैं। मानो यह काम बहुत ही घिनौना है और जैसे कि यह सिर्फ दलितों का ही काम हो! ऐसा करके तथाकथित स्वर्ण समाज आज भी सदियों पुरानी दृष्टिकोण रखता है। ऐसे में हीरा डोम की शिकायत उनके वैचारिक सोच पर भारी पड़ जाता है।

अंत में हीरा डोम एक बड़ा ही मानवीय सवाल उठाते हैं जो आज भी यथावत है। देखिये इसकी बानगी-

हड़वा मसुइया कै देहियां है हमनी कै,

ओकरै के देहियां बभनओं कै बानी।

ओकरा के घरै घरै पुजवा होखत बाजे,

सगरै इलकवा भइलैं जजमानी।

हमनी के इनरा के निगिचे न जाइलेजां,

पांके में से भरि भरि पियतानी पानी।

कवि इसमें आदमी-आदमी के बीच के विभेद को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं एक ही हाड़ मांस को देह हमारा भी है और ब्राह्मण का भी, फिर भी ब्राह्मण पूजा जाता है। पूरे इलाके में ब्राह्मण की जजमानी है और हम दलितों को कुआं के पास भी नहीं जाने दिया जाता है, किंचड़ से पानी निकाल कर पानी पीते हैं। सच भी है आज भी दलितों को उन कुओं से पानी नहीं भरने दिया जाता है जहां स्वर्ण जाति के लोग पानी भरते हैं। गलती से कोई दलित कुआं के पास चला भी गया तो उसका हाथ-पैर तोड़ दिया जाता है।

करीब एक सौ साल पूर्व लिखी हीरा डोम की यह कविता आज भी जीवंत व प्रासंगिक है। हीरा डोम ने कविता के माध्यम से अपनी जाति की संवेदनशीलता को सामने लाया साथ ही अपने आत्म-सम्मान को स्थापित भी किया, जो अपने आप में बड़ी बात है। महादलित विमर्श की जब-जब चर्चा होती है तब-तब बिहार के हीरा डोम की वह शिकायत सामने आती है। जो उन्होंने 1914 में की थी। डोम जाति की पीड़ा को हीरा डोम ने शब्दों में वर्षों पूर्व पिरोया था। देश आजाद हुआ, हालात बदले, लेकिन हीरा डोम के लिखे एक-एक शब्द आज भी प्रासंगिक है। भगवान, समाज, व्यवस्था व सरकार से की गई भोजपुरी में उनकी शिकायत को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘अछूत की शिकायत’ नाम से कविता के रूप में ”सरस्वती” के सितम्बर,1914 के अंक में प्रकाशित किया था। दलित विमर्श में हस्तक्षेप करती हीरा डोम की कविता ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होने वाली संभवत: पहली और एकमात्र भोजपुरी कविता थी। और वह भी एक दलित की। भोजपुरी में लिखी गयी कविता ने वर्षों से भारतीय समाज में उपेक्षित और अछूत रहे डोम जाति के उस दर्द को सामने लाया है जिसे देख हर कोई अपनी आंखें मूंद लेता है। जिसमें इंसान तो शामिल हैं ही भगवान भी पीछे नहीं हैं।

13 Responses to “कब दूर होगी अछूत की शिकायत”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    (१) पहले गुरूता ग्रंथि का, और लघुता ग्रंथिका त्याग (कठिन पर) आवश्यक है। हमने अपनेही दलित बंधुओंपर अन्याय किया है, यह विनम्रतासे, और कुछ अपराधिक भावसे स्वीकार करता हूं।मुझे अपने दलित बंधुओंके चरण छूकर क्षमा मांगनेमें कोई आपत्ति नहीं।
    (२)इसके, कारणों की चर्चा हमें सुलझाव नही दे पाएगी, पर आपसमें मनमुटाव बढानेकी क्षमता रखती है, अगर गलत शब्दोंका प्रयोग, अनजाने हो जाए तो, द्वेष बढ सकता है, बुद्धिमान इसे टाले।
    (३) मेरे बचपनमें गांवके कारंजसे पानी भरवानेके लिए संघ
    स्वयंसेवकोने अपने “दलित”(क्षमा, और कैसे संबोधित करूं? विवश हूं) बंधुओंको खींचकर ही(क्यों कि, वे डर रहे थे) कारंज को छुआया था। साथमें स्वच्छता भी सीखाई थी।वे भी धुले कपडे पहनकर घूमते थे।भेद कम हुआ था।”R S S Vision in Action” में आपको कई सत्य उदाहरण मिल जाएंगे।R S S ढोल पीटता नहीं है।
    (४)किसी प्रकारका सामाजिक बदलाव छुटपुट प्रयत्नोसे ही होता नहीं है। परंपराएं नदीके प्रवाह की भांति होती है।धीरे धीरे बदलती है, जैसे एक मौसम दूसरे मौसममें बदलता है। ऐसे बदलाव सनातन धर्मने कईबार किए हैं।
    (४) यह परिस्थिति बहुत कुछ बदल जाती, पर इसपर (दोनो ओरसे ) राजनीति हुयी, तो और जटिल हो गयी, ऐसी मेरी प्रामाणिक, मान्यता है।
    (५)और समता लाने के सारे प्रयत्न “समरसता” लाए बिना असंभव है। समरसता वह कुंजी है, जिससे यह ताला खुल सकता है।समरसता: =>एक गुलाब जामुन का रस जैसे दूसरे जामुनमें चला जाता है, तो पताही नहीं चलता कि रस कौनसे जामुनका है। यही समरसता है<=, ठेंगडीजी समरसता पर बल देते हैं। "रमेश पतंगे" मैं मनु और संघ" पुस्तकमें यही समझाते हैं।मैं सभीको पुस्तक पढनेका अनुरोध करता हूं।पर लेखोंसे "दोषानुभव" ही कराया जा सकता है, जो आवश्यक भी है, पर पर्याप्त नहीं।समरसता दोषानुभव बिना भी सुलझाव ला सकती है।
    शब्द कोषका एक शब्द है।
    शब्द कोषका एक शब्द?
    जो शक्ति कोष है।——-
    शब्द सिंधु का एक बिंदू है।
    शब्द सिंधुका एक बिंदू?
    जो शक्ति सिंधु है।
    कौन शब्द है? कौन बिंदु है? कौन बिंदु है? कौन बिंदु है?
    वह——- शब्द—- हिंदू—- है।
    जो हमें समान रूपसे जोडता है। सूरिनाममें(वहां हिंदी चलती है, रेडीयो प्रोग्राम भी) यह पंक्तियां सुनानेपर सारोंका बंधुभाव जाग उठा। यह हमारा बंधुभाव जगाए,भेद मिटाएं, यही कामना।

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  2. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    When Caste Was Not A Bad Word

    http://www.esamskriti.com/essay-chap…ad-word-1.aspx

    Were caste equations always as bad as they are today? Not quite. There were always castes but they were not backward.

    • The interest in caste peaked around 1891 when the census came out with what were termed as Index of Castes. The word ‘caste’ is of Spanish origin and fails to capture the meaning of the Indian term, “jati,” which more properly translated as “community.”

    • Jati in traditional India promoted and preserved diversity and multiculturalism by allotting every jati a particular space and role in society so that no jati would be appropriated or dominated by another.

    • America, which has long glorified the ideal of a “melting pot” of one assimilated culture, is now coming to see the value of the “salad bowl” model, in which different cultures co-exist in harmony. The epitome of this model was the Indian jati system, revealing that our ancient practices are relevant to the modern world.

    • Moreover, the jati system was integral to the survival of the Indian nation: in Swami Vivekananda’s words: “Caste is an imperfect institution no doubt. But if it had not been for caste, you would have had no Sanskrit books to study. This caste made walls, around which all sorts of invasions rolled and surged but found it impossible to breakthrough.”

    Reply
  3. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    • If one looks deep enough, corresponding images of other aspects of Indian life and society emerge from similar British records of the late eighteenth and the early nineteenth century. Those indicate not only a complex structure of science and technology (according to tests carried out by the British, the best steel in the world during this period was produced by relatively portable steel furnaces in India, and inoculation against small-pox was a widely-extended Indian practice) but also the sophisticated organizational structure of Indian society.

    • According to Mr. Alexander Read, later the originator of the Madras land revenue system, the only thing which seemed to distinguish the nobility from their servants in Hyderabad around 1780 was that the clothes of the former were more clean.

    From ‘Life And Thoughts Of Swami Vivekananda’:
    http://www.esamskriti.com/essay-chap…kananda-1.aspx

    • Solution to caste problems:
    The other caste must remember that if they remain backward, it is only because they sat down lazily and let the Brahmanas win the race. Instead of wasting their energies in quarrels, let them absorb the culture of the Brahmanas by taking to Sanskrit education because Sanskrit and prestige go together in India.

    • Benefits of caste system
    It is owing to caste that 300 million people can find a peace of bread to eat. It is an imperfect institution no doubt. But if it had not been for caste, you would have had no Sanskrit books to study. This caste made walls, around which all sorts of invasions rolled and surged but found it impossible to breakthrough.

    Reply
  4. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    • A detailed survey was carried out in 1822-25 in the Madras Presidency (i.e. the present Tamil Nadu, the major part of the present Andhra Pradesh, and some districts of the present Karnataka, Kerala and Orissa). The survey indicated that 11,575 schools and 1,094 colleges were still then in existence in the Presidency and that the number of students in them were 1,57,195 and 5,431 respectively. The more surprising information, which this survey provided, is with regard to the broader caste composition of the students in the schools.

    • According to it, those belonging to the sudras and castes below formed 70 per cent to 80 per cent of the total students in the Tamil speaking areas, 62 per cent in the Oriya areas, 54 per cent in the Malayalam speaking areas, and 35 per cent to 40 per cent in the Telugu speaking areas.

    by dharmpal

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  5. tulika

    लेख अछा है समाज के निचले पायदान पर सालो से हर रहे लोगो का भी विकसा होना ही चाहिए और जातिगत समाज की जगह जातिविहीन समाज होना चाहिए

    Reply
  6. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    dinesh kumar ji jaha tak mujhe pata he aj bharat ke kisi mandir me koe bhi kisi hindu ko jane se nahi rok sakata he.dusare jisako puja karani ati he vo hi to puja karega na,rahi bat meri “purohit” hone ki to matr “purohit” hone se me mandir me puja karane ka adhikari nahi ban jata hu,muje puri ki puri vedic padhati ka gyan hona chahiye.or us hisab se jivan jine ki mansikata bhi.
    ek samay tha jab shashtr sab nahi pad sakate the,usake liye bhi “sadhan chatustay” chahiye hota tha,par aj “market” me milata he sab “shastra” kitana pada??kitani sanskrit sikhi???kyo nahi “brahman” sasnkar apanate he???kyo nahi “upanayan sanskar” kar sayam puravk rahate he??sarkar arkshan de sakati he “sanskar” nahi,vo to khud apanana padega,puja padhati,sayam,seva,niramishata,vinamrta khud shikanai padegi.swami vivekanand ji saf saf likhate he ki jab tak sanskrit nahi sikhenge tab tak brahman ke barabr nahi banege.sanskrit sikho,ved padho,upanishad pado,manu smriti pado,fir koe brahamn galat bolata he to use batao ki tumare bap-dadao ne kya likh rakha he shashtr me,jo manushy matr ki samanta ka hi goshana karate he na ki asamanata ka.
    100-200 sal purane udharn dene se,dhos patti dene se,damkiya dene se koe samrsata nahi ati he,prem v vinmrta se hi ati he,mujhe nahi pata brahmano ne kabhi koe atyachar kiya hoga par sabse jyada unhone hi vanchito ko gale lagaya tha,agar vishavs nahi hota to me puri ki puri namo ki list de du???

    Reply
  7. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    (१) कविता हृदय तलको छूने वाली है।कोई संदेह नहीं। भोजपुरीमें और भी प्रभावी लगती है। जो प्राकृतिक प्रतिभाका परिचय भी देती है।
    (२)और यह तो छिपा नहीं कि, उसे द्विवेदी जी ने १९१४ में छापा था। तो द्विवेदी जी किस वर्णके थे?
    (३) लेकिन आज परिस्थिति बदली हुयी है।और, “छुआछूत का अंत” यह “बटन दबाओ” और लो, उजाला हो गया, ऐसी प्रक्रिया नहीं है।
    मेरे दादा, पिता, मैं, और मेरे बच्चे, इन चार पिढीयोंमे भी बहुत बहुत अंतर आया है। धीरे धीरे यह समाप्त हो जाएगी। आप बस, रेल, विमान में बैठते है, तो बगल वालेको अनजानते भी छूते हैं।अस्पृष्यता तो घटही रही है।
    (४)लेकिन तमस को(शत्रुता) ना जगाए— तमस की प्रतिक्रिया तामसिक ही होती है। आपका द्वेष जगानेका, सूक्ष्म कारणभी मैं नहीं बनना चाहता। द्वेष जगाकर, प्रेमकी अपेक्षा करना, यह पश्चिम की दिशामें बढते हुए, पूरबमें पहुंच जाएंगे, ऐसी अपेक्षा करने बराबर है।

    (५) विश्व हिंदु परिषद की ओरसे,–तमिलनाडुमें निम्न प्रकल्प हुआ था। कोइ छेड छाड बिना, उसके आंकडे प्रस्तुत हैं। वास्तवमें, सैद्धांतिक रूपसे मैं भी किसी जातिगत वृत्तांत को मानता नहीं हूं।किंतु विवशता से लिखा है।
    Till July 1998, sixteen courses of 15 days’ duration have been conducted and 1200 Poojaris have undergone the training. As a matter of principle, we are not interested in the castes of the applicants. But for statistical purposes, we collect the particulars. Poojaris from all castes have been trained.
    Break Up Figure is as Follows
    Scheduled Castes — 145
    Scheduled Tribes –54
    Most Backward — 73
    Backward –670
    Forward –258 —>TOTAL — 1200
    Out of the above, 214 Poojaris have been initiated into Siva Deeksha and 203 Poojaris have been adorned with Yagnopaveetha Dharanam irrespective of their castes.
    मैं केवल “हिंदू” हूं, जो भारतीय होने बराबर मानता हूं।

    Reply
  8. DINESH Kumar

    Purohit ji jaha tak bat ramjanma Bhumi ki Shila Rakhne ki to har Mandir Dalit hi banata hai lekin pooja ka hak Usko nahi diya jata wo Aap jaise Purohito ke liye sarvadhikar surakshit Rehta hai.

    Reply
  9. DINESH Kumar

    Bhai Ek bar us jagah par Khud ko Rakhkar Sochiye to pata chalega.
    Kyonki Dard Usko hi Maloom Padta hai jise hota hai.

    Reply
  10. DINESH KUMAR

    जब किसी अछूत की इस तरह की शिकायत आती है तो ऐसे लोगों के कानों में जूं क्यों नहीं रेंगता । जो लोग जातिगत जनगणना का विरोध करते हैं। वे कहां चले जाते हैं। उस समय कोई सर्वे नहीं होता जब मंदिर में pravesh करने के लिए दलितों-अछूतों के साथ पशुगत व्यवहार होता? बस हमें संगठित होकर ऐसे मामलों में हस्क्षेप करना होगा।

    Reply
  11. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    kavita bahut achchi he v marmshaprshi he,par apake comment bilkul galat he.apako pata he aj “ek dom hona” kitana fayademand soda he???me batata hu apako 50% se dasavi class pass karo or chaprasi ki nokaro teyar,50% se 12 vi pass karo babu ban gaye,50% se garduate ho jao apane apne field me noakari mil jayegi badi asani se,koe sangrsh nahi karana padega.
    achchha ek “baman” hona kitane gate ka he ye bhi suniye”80% se dasvi pass karo koe puchhat nahi,80% se 12 vi koe achchhe college me gusane nahi dega,80%se gardtute ban jao va chaprasi ki nokari ke liye dakke khao.
    ankhe kholayi bandho aj 1914 ka bharat nahi he,2010 chal raha he.arkshan arkshan kar ayogyta ka badava diya ja raha he,vanchito ko upar uathane ke sathan par yog vktiyo ko jabrdasti niche feka ja raha he.
    achha chalo me sab samrsata ke bhav ko bhul kar ek savrn ban kar kuchh saval puchata hu apase:
    1.apako lagata he ki jativadi jangadana se “savrn” ko nuksan hoga???galat bahut fayda hi hoga pata he,unaka dhurvikaran hoga,ek vote bank banega.
    2.svarn yah man kar chalate he ki unaki sankhya bahut kam he,lekin hakikat me he bahut jyada man lijiye yah jan gadna hoti he or koe party kanshiram ki tarj par savrn party bananti he to kon jitega???kisase pas jyada power hogi???pata he apko??
    3.jin vanchit bandhuo ko hamesha dabaya gya unko kya fayda hoga es jangadna se???kisi bhi halat me arkshan to 50% se jyada badega nahi,fir kya fayda????
    4.har chij ki ati kharab hi hoti he,apaka lekha savrn smaj ke prati bahut purvagrih se gristh he,par ap ye bhul rahe he ki bina arkshan ke vanchit bandhu kuchh nahi he,aap vanchito me yogyata badhane ke sthan par unko “savrno” ke prati bhadka rahe he,jo bilkul galat he.
    5.”arkshan koe haq nahi he,ye hindu samaj me vyapt “chuachhut” ko dur karane ka madhyam tha or aj chhuachhut lagbhag mit chuka he.
    chalo ye sare savl to mene jati vadi mansikta se kiye ab kuchh savl samrsata ke:
    1.jis jati ko logo ne matr shadi vihah tak kar diya tha usko kyo vaps kendr me lana chahate he??
    2.kya esakipartikriya nahi hogi??samaj me dhurvikaran nahi badega??samaaj ke vibhinn vargo me sangrsh nahi hoga??
    3jis bhagvan ko ap kos rahe ho us bhagavan ko apake hari maharaj bhi nahi chhodana chahate he.
    4.ram janm bhumi andolan me pratham shila rakhane vale dom bandhu hi the,pata he kya apako??
    5.1967 me vishv hindu ke manch par sabhi shnkracharyo v sabhi snato ne ek savr me goshana ki thi”na hindu patito bhavet…………………”2006-07 me sangh me samajik samrsta varsh manaya tha or abhut purv samrthan mila samany hindu se.us samrsata ko kyo todana chahate ho??
    asha he ap samjhenge samrsata ke bhav ko,or jativadi bhav dono ko.samay bahut badal gaya he 20101 ko 1914 se tulana karana murkhata he .

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    • Govind chandravansi

      आज भो सवर्ण जातो के लोगोँ कि मानसिकता दलितो के प्रति अच्छो नहो है।

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