नेताजी के विरूद्ध नेहरु की धमकी और अंग्रेजों से गुप्त संधि

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मनोज ज्वाला
आजाद हिन्द फौज के स्थापना दिवस पर लाल किला की प्राचिर से भारत
के १४वें प्रधानमंत्री के हाथों तिरंगा फहराये जाने और उनके मुख से
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को अखण्ड भारत का प्रथम प्रधानमंत्री घोषित किये
जाने से एक ओर जहां नेहरु की ऐतिहासिक छवि विकृत व निन्दनीय होती जा रही
है , वहीं उनकी राजनीतिक विरासत की संवाहक बनी कांग्रेस की हालत कठघरे
में खडे अपराधी की तरह प्रतीत हो रही है । भारत को ब्रिटिश क्राऊन के
सिकंजे से मुक्त कराने को ले कर अंग्रेजी सेना से दो-दो हाथ करने वाले
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के पराक्रम पर कांग्रेसी सरकार ने जो पर्दा डाल
रखा था सो अब जैसे-जैसे बेपर्द होता जा रहा है वैसे-वैसे कांग्रेस और
उसके नेता नेहरु राष्ट्र-भक्ति की कसौटी पर फिसड्डी सिद्ध होते जा रहे
हैं । यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि आजाद हिन्द फौज की आक्रामकता से घबरा कर
भारत छोडने को विवश हुए ब्रिटिश हुक्मरानों के साथ नेताजी के विरुद्ध एक
दुरभिसंधि के परिणाम-स्वरुप इनाम के तौर पर ही नेहरु भारत के
प्रधानमंत्री बन सके थे ।
उल्लेखनीय है कि १४ अगस्त १९४७ की आधी रात को ब्रिटेन की
महारानी के परनाती ने जब जवाहर लाल नेहरू के हाथों भारत की सत्ता
हस्तान्तरित की थी , तब नेहरू न तो कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष थे और
न ही देश की तत्कालीन अंतरीम सरकार के निर्वाचित प्रधान । द्वितीय
विश्वयुद्ध के तुरन्त बाद ही ब्रिटिश हुक्मरान भारत से ब्रिटेन को समेट
लेने की तैयारी में लग गए थे, क्योंकि एक ओर उस महायुद्ध में जीत के
बावजूद उनकी कमर टूट चुकी थी, तो दूसरी ओर सुभाष चन्द्र की आजाद हिन्द
फौज पूर्वोत्तर भारत की सीमा पर धाव बोलते हुए ब्रिटिश नौसेना के भारतीय
सैनिकों में विद्रोह करा कर उनकी निन्द हराम कर चुकी थी । फलतः वे अपने
किसी ऐसे विश्वास-पात्र भारतीय नेता के हाथों में सत्ता सौंप ब्रिटिश
लाव-लश्कर की सही-सलामत बाइज्जत घर-वापसी चाहने लगे थे , जो ब्रिटेन के
उस अंतिम हित-साधन में हर तरह से सहायक हो । इस बावत उनने नेहरू का चयन
कर उनकी ब्रिटिश भक्ति को अत्यन्त गोपणीय तरीके से जांचा-परखा और उनके
साथ एक दुरभिसंधि की ।
मालूम हो कि ब्रिटेन को सैन्य-शक्ति के सहारे भारत से खदेड
भगाने के लिए आजाद हिन्द फौज कायम कर अपनी सरकार बना लेने और विश्व के नौ
देशों से उसकी मान्यता हासिल कर लेने के पश्चात जर्मनी-जापान के सहयोग से
भारत के पूर्वोत्तर सीमा-क्षेत्र में घुस इम्फाल एवं कोहिमा पर कब्जा कर
लेने वाले सुभाष चन्द्र बोस ने जुलाई १९४५ में बंगाल पर आक्रमण करने की
पूरी तैयारी कर ली थी और इस बावत खुली चेतावनी भी दे रखी थी । आजाद हिन्द
फौज के समर्थन में ब्रिटिश नौसेना के भारतीय जवानों ने भी राष्ट्रीय
चेतना से ओत-प्रोत होकर बम्बई की सडंकों पर मार्च किया था । आजाद हिन्द
फौज के समर्थन में नौसेना के जवानों की बगावत से घबरायी ब्रिटिश
सरकार के भारत में पदस्थापित तत्कालीन वायसराय लार्ड बावेल इस निष्कर्ष
पर पहुंचा कि आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों में सद्भावना पैदा करने के
निमित्त कांग्रेस के किसी बडे नेता को सिंगापुर भेजा जाये ।
कांग्रेस के लोग बोस की उस आक्रामक चेतावनी और वायसराय की
उपरोक्त चिन्ता व इच्छा के बाद ब्रिटिश सरकार को समर्थन जताने के बावत
बंगाल में लगातार सभायें करने लगे थे। उधर उस राष्ट्रीय सेना के
विरूद्ध कांग्रेस को सत्ता हस्तान्तरित कर भारत छोड जाने का मन बन चुके
ब्रिटिश हुक्मरानों द्वारा अपने विश्वासी-हितैषी व्यक्ति की तलाश के
निमित्त विभिन्न प्रकार के परीक्षण किये जाने लगे , तो दूसरे तरफ
कांग्रेसियों में भी तत्सम्बन्धी पात्रता सिद्ध करने की स्पर्द्धा मच गई
। उस दौरान दार्जलिंग में एक जनसभा को संबोधित करते हुए नेहरू ने तो धमकी
बह्रे शब्दों में भी कह दिया था कि “सुभाष अगर बंगाल में घुसेगा तो मैं
अपने दोनो हाथों में तलवार लेकर उससे युद्ध करुंगा ”।
अंततः कांग्रेस ने ब्रिटिश भक्ति में सबसे मुखर नेहरू को
ही सिंगापुर भेजने का निर्णय लिया । प्रचारित यह किया गया कि उन्हें
कांग्रेस भेज रही है सिंगापुर , किन्तु पर्दे के पीछे उनकी वह यात्रा
आयोजित कर रही थी- ब्रिटिश सरकार , जिसने उस बावत हेलिकोप्टर भी उपलब्ध
कराया हुआ था । इतिहासकार जगदीशचन्द्र मित्तल ने अपनी पुस्तक में लिखा है
कि उस यात्रा का घोषित उद्देश्य था- आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों में
ब्रिटिश सरकार के प्रति सद्भावना पैदा करना , किन्तु वास्तविक
उद्देश्य था- ब्रिटिश क्राऊन के खासम-खास अर्थात जार्ज षष्ठम के
रिश्तेदार भाई माऊण्ट बैटन से नेहरू की मुलाकात और सत्ता-हस्तांतरण
के लिए ब्रिटिश हितों के अनुकूल नेता में ब्रिटिश-निष्ठा की निर्णायक
जांच । नेहरू के सिंगापुर पहुंचने से दो दिन पहले ही ब्रिटिश सेना के
दक्षिण-पूर्व एशियाई कमान का कमाण्डर इन चीफ- माऊण्ट बैटन वहां पहुंच गया
था । स्थानीय प्रशासन द्वारा नेहरू के स्वागत हेतु की गयी सामान्य
तैयारियों पर नाराजगी जताते हुए बैटन ने वहां के प्रशासकों को यह बोध
कराया कि “ नेहरु भारत का भावी प्रधानमंत्री है और इस कारण उसका स्वागत
एक राष्ट्राध्यक्ष के रूप में किया जाना चाहिए ” । ‘फ्रीडम ऐट मिड नाईट’
में उसके लेखक द्वय लापियर एण्ड कालिन्स ने लिखा है- “प्रशासन ने उस
रहस्यमय अतिथि के लिए कोई मोटर-कार की व्यवस्था नहीं की थी , तो माऊण्ट
बैटन ने उनके स्वागत सत्कार में अपनी ‘लिमोजिन’ मोटरकार लगा दी थी । उनका
भाषण सुनने के लिए भीड जुटाने हेतु आस-पास के गांवों-देहातों में
बसें भी भेज दी थी । इतना ही नहीं, वह स्वयं चल कर हवाई-अड्डा पहुंच
गया था उन्हें लेने और अपनी कार में साथ बैठा कर ले लाया था अपने सरकारी
बंगले पर । वहां प्रशासन द्वारा प्रायोजित भीड को सम्बोधित करने के
लिए उन्हें एक आलिशान भवन-परिसर में ले जाया गया , जहां माऊण्ट बैटन की
पत्नी एडविना पहले से ही मौजूद थी । उस परिसर में नेहरू के घुसते ही
वहां एक हादसा हो गया । हुआ यह कि भीड भरे उस प्रशाल में नेहरू के
घुसते ही एड्विना उनकी ओर लपकती हुई गिर कर लुढक पडी । उस अफरा-तफरी के
बीच नेहरू ने तत्क्षण उसे ऐसे उठा लिया कि वह उनकी बांहों में सिमट गई और
उनके दिलो-दिमाग को सदा के लिए अपनी मुट्ठियों में जकड ली ।” थोडी देर
में स्थिति सामान्य हुई , तब उन्होंने अपना भाषण किया- ब्रिटिश साम्राज्य
की भक्ति में कसीदे गढे और सुभाषचन्द्र बोस के विरूद्ध जहर उगले ।
भाषण के बाद वो उस दम्पत्ति पर लट्टू हो गए । वे एडविना से देर रात तक
अंतरंग बात-चीत करते रहे और फिर तीनों सहभोज का आनन्द लेते हुए नेताजी
के विरूद्ध एक दुरभि-संधि को अंजाम देते रहे ।
नेहरू के उक्त पूर्व प्रचारित यात्रा का मुख्य घोषित कार्यक्रम
‘आजाद हिन्द फौज’ के शहीद सिपाहियों के स्मारक-स्थल पर पुष्पांजलि
अर्पित करना था । किन्तु , दूसरे दिन स्मारक-स्थल के निकट से गुजरते हुए
नेहरू ने भारत की आजादी के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड रही फौज
के शहीद सिपाहियों के सम्मान में पुष्पांजलि अर्पित करने से साफ इंकार
कर दिया और कार से उतरे तक नहीं । तो इस तरह से ‘ब्रिटेन के
प्रति वफादारी’ और ‘स्त्री देह के प्रति आकर्षण’ की उस ‘निर्णायक
परीक्षा’ में नेहरू पूरे-पूरे अंकों से सफल हो गए , क्योंकि उनमें वे
दोनों ही तत्व आशा से अधिक मात्रा में पाये गए थे ।
उसके बाद तो सत्ता-हस्तान्तरण-विषयक ब्रिटिश फिल्म की
पूरी पटकथा लिखी जा चुकी थी , जिसके अनुसार उसी माऊण्ट बैटन को भारत की
सत्ता के हस्तान्तरण हेतु वायसराय बना कर सपत्नीक दिल्ली भेज दिया गया,
जिसने भारत-विभाजन के साथ-साथ नेहरू से वह सब कुछ करा लिया जो ब्रिटेन के
दूरगामी हितों की दृष्टि से आवश्यक था, किन्तु भारत के लिए भीषण
त्रासदपूर्ण था । उल्लेखनीय है कि सुभाष चन्द्र बोस और उनकी फौज के
विरुद्ध सिंगापुर में हुई उस गुप्त संधि के दौरान नेहरु की ब्रिटेन-परस्त
अंग्रेज-भक्ति असंदिग्द्ध सिद्ध हो चुकी थी । और , इसी कारण नेहरु के
हाथों ही अंग्रेजों ने सत्ता-हस्तान्तरित किया अन्यथा सुभाष या सरदार के
हाथों सत्ता सौंपी जाती , तो भारत की नियती कुछ और ही होती ।
• मनोज ज्वाला;

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