लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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nepalडाॅ. वेदप्रताप वैदिक

भारत-नेपाल सीमांत पर एक 19 वर्षीय नौजवान की हत्या हो गई। यह हत्या नेपाली पुलिस ने की। यों तो मधेसी आंदोलन में पहले भी लगभग 40 लोग मारे गए लेकिन वे नेपाली नागरिक थे। यह युवक दरभंगा का रहनेवाला भारतीय नागरिक था। जाहिर है कि ऐसी घटना किन्हीं भी दो देशों के बीच तनाव का कारण बन जाती है। हमारे प्रधानमंत्री ने नेपाल के प्रधानमंत्री को इसीलिए फोन भी किया। इस तरह की घटनाएं कभी-कभी दो देशों में युद्ध भी करवा देती हैं। भारत और नेपाल के बीच ऐसी नौबत की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन इन दोनों पड़ौसी देशों के बीच फिलहाल जो माहौल बना हुआ है, वह युद्ध-जैसा ही नज़्ज़ारा पेश कर रहा है।

कुछ हफ्तों से चली आ रही नेपाल की घेराबंदी ने इस ज़मीन से घिरे देश का टेंटुआ कस दिया है। रक्सौल-बीरगंज सीमा पर 15 कि.मी. लंबी ट्रकों की कतार लगी हुई है। नेपाल का आयात-निर्यात तो ठप्प है ही, लोगों की रोजमर्रा की जरुरतें भी पूरी नहीं हो रही हैं। इस सीमा-क्षेत्र से नेपाल का आधे से भी ज्यादा व्यापार होता है। नेपाल सरकार का आरोप है कि यह सीमाबंदी भारत ने की है। भारत के इशारे पर ही नेपाल के मधेसियों ने रास्ता रोक रखा है। वे धरने पर बैठे हैं। प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि भारत का कहना है कि उसके ट्रकों को नेपाल के मधेसी अंदर नहीं घुसने दे रहे हैं तो इसमें भारत क्या करे? यह नेपाल का आंतरिक मामला है। इस मामले पर बात करने के लिए विदेश मंत्री कमल थापा दिल्ली आए थे लेकिन कोई बात बनी नहीं।

इस नाकेबंदी का राजनीतिक असर बहुत गंभीर और बुरा हो रहा है। इसके पहले भी भारत ने राजाशाही नेपाल पर दबाव डालने के लिए कुछ ऐसे ही तरीके अपनाए थे लेकिन उस समय भारत ने नेपाली आम जनता के समर्थन में ऐसा किया था। इस समय वह जो कर रहा है, वह केवल तराईवासी मधेसियों और जन-जातियों के पक्ष में खड़ा हुआ लगता है। ये पहले से पीडि़त वर्ग भी नाकेबंदी के कारण और अधिक पीडि़त हो रहा है। नेपाल के अन्य नागरिक पूछते हैं कि चलो, रक्सौल-बीरगंज की नाकेबंदी के कारण नेपाल में पेट्रोल-डीजल नहीं आ रहा है लेकिन जिन दूसरे नाकों से पेट्रोल आता है, उन पर भारत ने कम पेट्रोल सप्लाय करना क्यों शुरु कर दिया है? भारत-विरोध की लहर आज नेपाल में जितनी तेजी से उठी है, शायद पहले कभी नहीं उठी। इस लहर को ऊंचा उठाने का काम चीन भी कर रहा है। वह पड़ौसी-धर्म निभा रहा है। उसने नेपाल को 12 लाख लीटर तेल मुफ्त भिजवाने की घोषणा की है। मोदी सरकार ने भूकंप के दौरान नेपाल की जो अपूर्व-सहायता की थी, उस पुण्य को इस नाकेबंदी ने मिट्टी में मिला दिया है।

मेरी समझ में भारत सरकार की नेपाल-नीति में भाईचारा कम और दादागीरी ज्यादा है। असली समस्या यही है कि नेपाल के संविधान में मधेसियों और जन-जातियों की मांगों को उचित स्थान क्यों नहीं मिला? उन्हें उचित स्थान देना या न देना, नेपालियों का अपना आंतरिक मामला है। उसमें हम हस्तक्षेप करनेवाले कौन होते हैं? हां, पड़ौसी-राष्ट्र होने के नाते, नेपाल के हितैषी होने के नाते और विविधतामय भारत के अनुभव के नाते हम नेपाल को मांगी या बिन मांगी सलाह भी दे सकते हैं। लेकिन हमने किया क्या? नेपाली संविधान पर दस्तखत होने के दो-तीन दिन पहले हमने अपने विदेश सचिव को काठमांडो भेजा ताकि वह नेपाली राष्ट्रपति को दबाए कि वे उस पर पुनर्विचार करवाएं और दस्तखत न करें। मोदी सरकार इससे ज्यादा अविवेकपूर्ण कार्य क्या कर सकती थी? भेजा भी तो किसको? एक अफसर को! और वह भी संविधान सभा की नाक काटने के लिए । भाजपा और मोदी सरकार के पास ऐसे लोग ही नहीं हैं, जिन्हें वह बात करने के लिए विदेशी राष्ट्रपतियों या प्रधानमंत्रियों के पास भेज सके और उसे घमंड इतना है कि वह दूसरे अनुभवी लोगों से कोई सहयोग भी नहीं लेना चाहती। उसकी इस प्रवृत्ति ने उसकी नेपाल नीति ही नहीं, संपूर्ण पड़ौसी-नीति को अधर में लटका दिया है। इस कारण उसकी छवि तो विकृत हो ही रही है। इसकी चिंता चाहे उसे न हो लेकिन हमें इसकी चिंता है कि भारत के हितों की हानि हो रही है।

नेपाल में बड़ी मुश्किल से एक नए संविधान पर सहमति हुई है। उसके आधार पर नई सरकार भी बनी है। हमारे लिए संतोष का विषय है कि नेपाल में पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और बर्मा की तरह तख्ता पलट नहीं होते। वहां लोकतंत्र बना रहे, और मजबूत हो। साथ ही साथ मधेसी जैसी वंचित वर्गों को समुचित न्याय मिले- यह कामना करना भारत का लक्ष्य होना चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति प्रेम, प्रोत्साहन, सहयोग और सलाह के जरिए हो सकती है, दादागीरी के जरिए नहीं।

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