राजनीति

ताशकंद से नई राह: सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सॉफ्ट पावर का भारतीय संगम

सनोज राणा

भारत और उज्बेकिस्तान के बीच 29-30 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताशकंद यात्रा महज एक नियमित राजनयिक औपचारिक बैठक नहीं है। बदलती वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों के बीच यह यात्रा भारत की मध्य एशिया नीति के एक नए और अधिक व्यावहारिक चरण का संकेत देती है। राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव और प्रधानमंत्री मोदी के बीच हुई वार्ता तथा जारी संयुक्त वक्तव्य से स्पष्ट है कि दोनों देश अपने संबंधों को परंपरागत राजनीतिक मित्रता से आगे ले जाकर व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर पहुंचना चाहते हैं। विशेष रूप से, वर्ष 2026 में दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के 15 वर्ष पूरे होना भी इस नई गति को ऐतिहासिक महत्व प्रदान करता है। इस नई साझेदारी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सुरक्षा, आर्थिक कूटनीति और सॉफ्ट पावर- तीनों आयाम एक-दूसरे के पूरक के रूप में दिखाई देते हैं।

आतंकवाद, कट्टरपंथ, मादक पदार्थों की तस्करी और साइबर खतरों जैसे साझा मुद्दों पर दोनों देशों ने ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने, कानून प्रवर्तन और आतंकवाद विरोधी सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई है। अप्रैल 2026 में नामांगन क्षेत्र में आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘दुस्तलिक’ का नवीनतम संस्करण यह दर्शाता है कि रक्षा संबंध अब केवल बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यापक रक्षा सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं। इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक सुरक्षा है। महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा, खनन और आपूर्ति श्रृंखला पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। विशेष रूप से, उज्बेकिस्तान से भारत को दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति के लिए एक ढांचा विकसित करने पर बनी सहमति भारत की असैन्य परमाणु ऊर्जा आवश्यकताओं और ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

व्यापार मोर्चे पर, द्विपक्षीय व्यापार 2025 में पहली बार 1 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। हालांकि, वास्तविक क्षमता को देखते हुए दोनों पक्षों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। वर्तमान में उज्बेकिस्तान के विदेशी व्यापार पर चीन (लगभग $17.2 अरब) और रूस ($13 अरब से अधिक) का वर्चस्व है। इस भारी-भरकम व्यापारिक ढांचे के बीच भारत का 1 अरब डॉलर का कारोबार यह साफ करता है कि राह आसान नहीं है। हालांकि, ताशकंद भी अपनी आर्थिक निर्भरता को सीमित रखने के जोखिमों को समझता है और भारत को एक संतुलित रणनीतिक विकल्प के रूप में देखता है।

भारत और मध्य एशिया के बीच सबसे बड़ी संरचनात्मक बाधा प्रत्यक्ष स्थलीय संपर्क का न होना है। यही कारण है कि ताशकंद वार्ता में मल्टी मॉडल परिवहन मार्गों, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर और फ्रेट कनेक्टिविटी पर जोर दिया गया। भारत को 2030 के अपने व्यापार लक्ष्य को हासिल करने के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) को एक सक्रिय और किफायती लॉजिस्टिक्स रूट में तब्दील करना होगा। इससे भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग और कृषि उत्पादों के लिए संपूर्ण यूरेशिया के द्वार खुलेंगे।

आर्थिक और रणनीतिक प्रयासों को जनसांख्यिकीय संबंधों (People-to-People ties) से मजबूत बल मिल रहा है। उज्बेकिस्तान आने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या जो 2020 में 4.8 हजार थी, वह 2025 में बढ़कर 80 हजार से अधिक हो गई है। हाल ही में उज्बेकिस्तान सरकार द्वारा भारतीय नागरिकों के लिए 30 दिनों की वीजा-मुक्त (Visa-Free) यात्रा की ऐतिहासिक घोषणा और प्रति सप्ताह संचालित 14 सीधी उड़ानों ने इस जुड़ाव को नई ऊंचाई दी है। इसके अलावा, उज्बेकिस्तान में लगभग 18,500 भारतीय (10,000 छात्र, 8,000 श्रमिक और 500 कारोबारी) रह रहे हैं, जो इस साझेदारी की मजबूत रीढ़ हैं। जुलाई 2025 में आयोजित प्रथम भारत-उज्बेकिस्तान कांसुलर वार्ता ने इस मानवीय संपर्क को और अधिक व्यवस्थित किया है।

सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के अलावा, भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों की वास्तविक शक्ति उनकी सभ्यतागत और सांस्कृतिक निकटता में निहित है। प्राचीन रेशम मार्ग, बौद्ध परंपरा, सूफी विचार, साहित्य, कला और व्यापार ने सदियों से दोनों क्षेत्रों को जोड़े रखा है। आज यही ऐतिहासिक स्मृति भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का प्रमुख आधार बन रही है। ताशकंद वार्ता में ‘सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम 2026-2030’ के साथ-साथ उज्बेकिस्तान के प्राचीन बौद्ध स्थलों—फयाजतेपा और करातेपा के संरक्षण व पुनरुद्धार हेतु ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ पर हस्ताक्षर किए गए। यह केवल पुरातात्विक संरक्षण नहीं, बल्कि इतिहास के माध्यम से वर्तमान कूटनीति को मजबूती देने का दूरदर्शी प्रयास है।

सांस्कृतिक व ज्ञान-आधारित कूटनीति भारत की सॉफ्ट पावर को ताशकंद में आयोजित दूसरे ‘भारतीय फिल्म महोत्सव’ से नई दिशा मिली। “सशक्त नारी-सेलिब्रेटिंग वूमनहुड” की थीम पर केंद्रित इस महोत्सव में दंगलडियर जिंदगी और कठाल जैसी फिल्मों के जरिए उज्बेक दर्शकों को समकालीन भारतीय सिनेमा, महिला सशक्तिकरण और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों से रूबरू कराया गया। क्षमता निर्माण के क्षेत्र में भारत का ‘आईटीईसी’ (ITEC) कार्यक्रम एक मजबूत स्तंभ साबित हुआ है, जिसके तहत 2700 से अधिक उज्बेक प्रतिनिधि भारत में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। वहीं 400 से अधिक उज्बेक छात्रों को ICCR छात्रवृत्ति मिली है। ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज में ‘ICCR संस्कृत चेयर’ की स्थापना और हिंदी अध्ययन हेतु 100 ‘लाल बहादुर शास्त्री छात्रवृत्तियों’ की घोषणा दोनों देशों के बीच ज्ञान और भाषाई कूटनीति को नए आयाम देती है। इसके साथ ही, भारत की वैश्विक पहचान-योग-भी उज्बेकिस्तान में लोकप्रिय हो रही है। भारतीय आयुष (AYUSH) मंत्रालय और उज्बेक योग फेडरेशन के बीच सहयोग से योग दोनों समाजों को जोड़ने का प्रत्यक्ष माध्यम बन चुका है।

डिजिटल कूटनीति और फिनटेक नवोन्मेष पारंपरिक स्तंभों से इतर, दोनों देशों के बीच डिजिटल कूटनीति का एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI), आईटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में रणनीतिक सहयोग बढ़ाया जा रहा है। इस यात्रा का सबसे क्रांतिकारी कदम भारत के UPI इकोसिस्टम को उज्बेकिस्तान के नेशनल क्यूआर सिस्टम ‘UZQR’ से जोड़ने हेतु हुआ वाणिज्यिक समझौता है। यह पहल सीमाओं के पार वित्तीय लेनदेन और पर्यटन को सुगम बनाएगी।

यह स्पष्ट है कि, भू-राजनीतिक यथार्थ यह है कि भारत चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च, रूस की भौगोलिक निकटता, यूरोप के वित्तीय संसाधनों या तुर्किये की सीधी पहुंच का सीधा मुकाबला नहीं कर सकता-और न ही उसे इसकी आवश्यकता है। भारत को निरंतर राजनीतिक जुड़ाव के साथ-साथ एक ऐसे व्यावहारिक आर्थिक और रणनीतिक एजेंडे पर केंद्रित होना चाहिए, जहां उसकी अपनी विशेष क्षमताएं हैं। इसके लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) को एक सक्रिय और किफायती लॉजिस्टिक्स मार्ग में बदलना होगा। अंततः भारत और उज्बेकिस्तान के संबंधों की सफलता इसी भू-आर्थिक यथार्थवाद, डिजिटल फिनटेक नवोन्मेष और सॉफ्ट पावर कूटनीति के कुशल समन्वय पर निर्भर करेगी।

सनोज राणा