मोदी के खिलाफ लड़ाई के नए हथियार

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

अन्ना हजारे जब दिल्ली आए थे तो उन्होंने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर दी थी। अन्ना हजारे का कहना था कि ग्राम विकास के क्षेत्र में जो काम गुजरात में नरेंद्र मोदी ने कर दिखाया है वह लाजबाव है। देश के दूसर राज्यों को भी मोदी के इस मॉडल का अनुसरण करना चाहिए। अन्ना हजारे क्योंकि दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए आए थे इसलिए जब उन्होंने नरेंद्र मोदी के ग्रामीण विकास क्षेत्र में किए गए कार्य की प्रशंसा की तो वे अप्रत्यक्ष रूप से यह भी कह रहे थे कि गुजरात में विकास भी हुआ और उसमें भ्रष्टाचार भी नहीं पनप पाया। यह अपने आप में अद्वितीय स्थिति कही जा सकती है। क्योंकि कुछ राज्यों में राजनीति से जुड़े लोग या फिर नौकरशाही इसलिए विकास के कार्य करती है ताकि उसमें पैसे खाने के भरपुर अवसर उपलब्ध हो जाए। भ’ष्टाचार के बिना विकास की जो मिशाल गुजरात में नरेंद्र मोदी ने उपस्थित की उसकी अन्ना हजारे ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

 

उसी वक्त लगने लगा था कि तथाकथित सिविल सोसायटी के लोग नरेंद्र मोदी के कार्यों की यह प्रशंसा सहन नहीं कर पायेंगे। क्योंकि सिविल सोसायटी के नाम पर एकत्रित हुए 10-15 लोगों का यह समूह भ’ष्टाचार को खत्म करने में उतनी रूचि नहीं रखता जितनी रूचि नरेंद्र मोदी को उखाड़ फेंकने में रखता हैं। इस काम में तीस्ता सीतलवाड़ तो इतनी दूर तक गई कि उन्होंने कचहरी में झूठे हल्फनामें तक पेश कर दिए। स्वामी अग्निवेश छतीसगढ़ में लाल सलाम के नारे लगाते-2 अन्ना हजारे द्वारा नरेंद्र मोदी को लेकर किए गए इस मूल्यांकन से लाल होते गए और भागे हुए जंतर-मंतर पर आए। नृत्य करते करते मलिका साराभाई ने अचानक रूदाली की भूमिका ग्रहण कर ली। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि गुजरात में क्या हुआ है, यह अन्ना हजारे को दिखाई ही नहीं दे रहा। अब जो दिव्य दृष्टि आज नाचते नाचते पा ली है, वह अन्ना हजारे के पास कहां से आ सकती है। वे तो अपने गांव रालेगां सिद्धी में खेती का काम करते हैं और गांव के किसानों का जीवन सुधारने के लिए मिट्टी से मिट्टी हो रहे हैं। कृषि कार्य करते हुए, गांव मे रहते हुए और भ्रष्टाचार से लड़ते हुए उनकी ऊर्जा चुक जाती है। फिर उन्हें गुजरात के समझने के लिए सिविल सोसायटी जैसी दिव्य दृष्टि कहां से प्राप्त हो सकती है।

साराभाई की समस्या यह है कि अपने से हो रहे जिस तथाकथित अन्याय को गुजरात का मुसलमान भी नहीं देख रहा साराभाई उसको भी देखने का दावा कर रही है। उसके इस दावे पर देश तो हैरान है ही गुजरात का मुसलमान भी हैरान है। वह कह रहा है कि हमारे साथ कोई मतभेद नहीं हो रहा लेकिन यह तथाकथित सिविल सोसयटी उन्हें बार बार बता रही है कि नहीं नहीं तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है। सिविल सोसयटी के इस षड्यंत्र को हिन्दू मुसलमान को लडाने की भूमिका माना जाए या फिर विदेशी महाप्रभुओं से पैसा प्राप्त करने की एक घटिया चाल।

 

गांव का एक साधारण किसान जिस दृष्टि से गुजरात में हो रहे ग’ामीण विकास के कार्य को देखता और अनुभव करता है, उसी दृष्टि से अन्ना हजारे ने गुजरात में हो रहे विकास को समझा और टिप्पणी कर दी। अब सिविल सोसायटी चाहती थी कि अन्ना हजारे इस मामले में तुरंत अपनी टिप्पणी कों वापस लें। कुछ लोग तो क्रोध से इतने लाल पीले हो रहे थे कि सिविल सोसायटी सिविल न रहते हुए अनसिविल होती दिखाई दे रही थी। अप्रत्यक्ष रूप से यह सोसायटी यह संदेश दे रही थी कि अन्ना हजारे इस मामले में क्षमा की भूमिका में उतर आएं। परंतु उनके दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

 

उस वक्त भी ऐसी अशंका होने लगी थी कि यह सोसायटी नरेंद’ मोदी को एकबार फिर घेरने का प्रयास करेगी। और ऐसा हुआ भी। पिछले दिनों गुजरात पुलिस विभाग के एक कर्मचारी संजीव भट्ट अपना हल्फनामा लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गए। अपने हल्फनामें में उन्होंने कहा कि गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी ने पुलिस के कुछ बड़े कर्मचारियों की एक बैठक अपने घर में बुलाई थी जिसमें मोदी ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मुसलमानों को इस बार सबक सिखाने की हिमायत की। भट्ट का यह भी कहना है कि गुजरात में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाई गई विशेष जांच टीम में उसका कोई विश्वास नहीं है। अब असली प्रश्न यह है कि भट्ट को यह ज्ञान प्राप्ति नौ-साल के बाद क्यों हुई वे इतने सालों तक सोए रहे और अन्ना हजारे द्वारा नरेंद्र मोदी की प्रशंसा किए जाने के तुरंत बाद हीं जागृत अवस्था में क्यों आ गए। यह अलग बात है कि उस समय के पुलिस महानिदेशक के. चक’वर्ती ने संजीव भट्ट के इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि वे उस बैठक में मौजुद नहीं थे। भट्ट का यह कहना है कि उनके बयान पर विश्वास कर लिया जाए और उनके डीजीपी पर विश्वास न किया जाय लेकिन उनपर विश्वास क्यों किया जाए इसका शायद एक कारण उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से बताय भी है। उनके ड्राइवर ने डीजीपी के बयान को गलत बताते हुए यह कहा है कि मेरे साहब संजीव भट्ट उस बैठक में गए थे और वह खुद उन्हें लेकर गया था। हो सकता है कल कोई खोमचे वाला भी यह कहे कि भट्ट उसे मिटिंग में थे, वह इसकी गवाही दे सकता है। भट्ट ने मु’यमंत्री के घर में जाने से पहले उसके खोमचे से चाट खाई थी और बताया था कि वे मु’यमंत्री के घर में इस प्रकार की बैठक में जा रहे हैं। भट्ट के घर में काम करने वाला नौकर भी कल यह कहते हुए हाजिर हो सकता है कि बैठक में मोदी में क्या कहा यह वह भी जानता है क्योंकि साहब ने जब घर आकर रोटी खाई थी तब मैं उन्हें रोटी खिला रहा था और वे मुझे बैठक में क्या हुआ यह सब तफसील से बता रहे थे। आखिर यह लड़ाई न्याय के लिए लड़ी जा रही है इसलिए अपने पक्ष में भट्ट गवाह तो इक्कठे करेंगे हीं। वैसे तो रिकॉर्ड के लिए कांग्रेस यह भी कहेगी कि उसका मोदी के खिलाफ इस अभियान में कोई हाथ नहीं है। परंतु कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह, जो कभी किसी रजवाड़े के मालिक रहे हैं, अंदर की बात ज्यादा देर छिपा नहीं सके। संजीव भट्ट के हल्फनामें के तुरंत बाद उन्होंने कहा कि गुजरात में दंगा पिड़ितों को तब तक न्याय नहीं मिल सकता जब तक नरेंद्र मोदी मु’यमंत्री पद पर रहेंगे।

 

मोदी गुजरात के मु’यमंत्री ना तो कांग्रेस की दया से बने हैं और न ही दिग्विजय सिंह के रहमोकरम से। उन्हें मु’यमंत्री गुजरात की जनता ने बनाया है। संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि जिसको कांग्रेस न चाहे वह किसी राज्य का मु’यमंत्री नहीं बन सकता। कांग्रेस का दुर्भाग्य है और दिग्गी बाबू का कष्ट की गुजरात के लोगों ने कांग्रेस को नकार दिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अच्छा तरीका तो यही होता है कि पराजित दल अपनी नीतियों को लेकर उन्हीं जनता के बीच में जाए और जनता को अपना पक्ष समझाकर उसे अपने पक्ष में करे। परंतु यह रास्ता बड़ा लंबा और तप-त्याग वाला है जिनके लिए राजनीति पैसा कमाने का एक अड्डा मात्र बन गया है, वे इतनी लंबी साधना नहीं कर सकते। अलवत्ता वे ड्राइवर और खोमचे वालों के हल्फनामों से गुजरात को फतह करके गुजरात की जनता को सबक सिखाना चाहते हैं। स्वामी अग्निवेश हजारों निर्दोशों की हत्याएं कर रहे माओवादियों का लाल सलाम प्रसन्नता से स्वीकार कर सकते हैं परंतु गुजरात की जनता द्वारा लोकतंत्र के पक्ष में दिया गया निर्णय उन्हें स्वीकार नहीं है। दरअसल, अग्निवेश से लेकर दिग्विजय सिंह तक और तीस्ता सितलवाड़ से लेकर अरूणधति राय तक सभी का एक हीं कष्ट है कि गुजरात का मुसलमान अपने साथ हो रहे तथाकथित अन्याय के खिलाफ रणभूमि में क्यों नहीं निकल आता? इनके दुर्भाग्य से चाहे अन्ना हजारे हों चाहे दारुल उलूम के कुलपति वास्तवानी उन्हें गुजरात में हो रहा परिवर्तन साफ दिखाई पड़ रहा है। अन्ना हजारे वहां हो रहे ग्रामीण विकास से प्रभावित हैं तो वास्तवानी राज्य में मुसलमानों को विकास के मिल रहे समान अवसरों से आहलादित हैं। यह अलग बात है कि इन लोगों को अपने इस कृत्य के लिए इसी सिविल सोसायटी और कांग्रेस के मिले-जुले गुस्से का सामना करना पड़ता है। वास्तवानी को तो इस अपराध के लिए दारुल उलूम से निकाला जा सकता है। हालात ऐसे हैं कि अन्ना हजारे को बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता। इसलिए नौ साल बाद भट्टों को तलाशा जा रहा है। इस बात की चिंता कोई नहीं कर रहा कि भट्टों की इस तलाश में लोकतंत्र को कितना नुकसान होगा और गुजरात की जनता कितनी आहत होंगी। लेकिन नरेंद्र मोदी को शायद पहले से हीं इसकी आशंका थी जिसका जिक’ उन्होंने अन्ना हजारे को लिखी अपने चिट्ठी में किया था। उन्होंने लिखा था जिसका भाव यही निकलता था कि आपने क्योंकि सत्य बात कह दी है, इसलिए यह लोग उसका बदला लेने के लिए किसी सीमा तक भी जा सकते हैं।

4 COMMENTS

  1. (१) गुप्त बैठकें अब भी चल रही होगी। दिग्गी के परामर्श दाता बहुत व्यस्त है। अगला तीर खोज रहें हैं।
    बुद्धिमान पाठक सोचके कुछ बता भी सकते हैं। यह सारे तरिके माईकियावेलि और चाणक्य नें लिख के रखे हैं।
    (२) अण्णा जी, आपने अपना बयान क्यों वापस लिया?
    आपका यह बयान वापस लेना भी भ्रष्ट-आचार ( आचार जो सही नहीं)ही है। इसे आपने किसी के दबाव में आकर ही लिया है।
    ऐसा आचार आपके आंदोलन को दुर्बल ही नहीं, भ्रष्ट भी कर सकता है।
    यह आपका प्रभाव (Good Will )तो घटा ही चुका है।
    क्या गाजर की सीटी बजेगी? या नहीं बजी, तो खा जानी पडेगी?

  2. ये लोग क्या क्या हथकंडे अपना सकते हैं इसका बिलकुल ताज़ा उदाहरण हम लोगों को कर्नाटक में देखने को मिल रहा है.मैं सभी देश-प्रेमी बंधुओं से आग्रह करता हूँ की अगले लोक-सभा चुनाव में कांग्रेस को जबरदस्त तरीके से धुल चटाए.

  3. अन्ना हजारे को बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता। इसलिए नौ साल बाद भट्टों को तलाशा जा रहा है। इस बात की चिंता कोई नहीं कर रहा कि भट्टों की इस तलाश में लोकतंत्र को कितना नुकसान होगा और गुजरात की जनता कितनी आहत होंगी।
    बहूत खूब लिखा है अग्निहोत्री जी आपने छोटा मुंह बड़ी बात कृपया तीस्ता सीतलवाद का सदैव पूरा नाम लिखे तो अच्छा होगा “तीस्ता जावेद सीतलवाद” ये वे लोग हैं जिन्हें भारत की शान्ति और प्रगती से कोई वास्ता नहीं है भारत का भला चाहने वालों के ये असली शत्रु हैं.

  4. वो नेता नेता नहीं है जो जनहित देशहित में किये गए कार्यो को केवल इसलिए ठुकरा दे की ये कार्य विपक्ष द्वारा किये गए है निजी स्वार्थो के लिए जनहित की अवहेलना भ्रस्टाचारका मुख्य कारण है

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