लेखक परिचय

दिनेश शाक्‍य

दिनेश शाक्‍य

इटावा, उत्तर प्रदेश के रहनेवाले दिनेश १९८९ से समाचार पत्रों में फीचर लिख रहे हैं। १९८९ में पत्रिका हलचल से जुडे फिर साप्ताहिक चौथी दुनिया के बाद दिल्ली प्रेस प्रकाशन से जुडे, १९९६ से समाचार ए़जेसी वार्ता में २००३ मार्च तक इटावा में रिपोर्टर के रूप में काम किया। सबसे अधिक लोकप्रियता उन्‍हें तब मिली जब चम्बल नदी में १०० से अधिक घडियालों के मरने के बाद उन्हें खोज ही नहीं निकाला बल्कि उस सच को उजागर कर दिया जिसे उत्तर प्रदेश का वन विभाग इंकार कर रहा था। संप्रति वे सहारा समय न्यूज़ चैनल में २००३ से फील्ड रिपोर्टर के रूप में काम कर रहे हैं।

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DSCF8221उत्तर प्रदेश का बंटबारा नहीं बल्कि बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश का विलय कर एक नये प्रदेश का उदय कर देना चाहिये। यह बात किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने मायावती के प्रस्ताव पर तल्ख शब्दों में कही।

उत्तर प्रदेश के बंटबारे की बात पर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैट नाखुश नजर आ रहे हैं। टिकैत ने साफ शब्दों में कहा कि बंटबारे के बजाये उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड का विलय कर एक नये प्रदेश का उदय कर देना चाहिये।

देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश के तीन हिस्से के बंटबारे की उत्तर प्रदेश की मुखिया मायावती के प्रस्ताव की भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय अघ्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत ने खिल्ली उडाई है। जहां उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती एक ओर उत्तर प्रदेष के बंटबारे के लिये उत्साहित नजर आ रही है वहीं दूसरी ओर किसान राजनीत के मौजूदा दौर में खासा योगदान करने वाले भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत मायावती के इस प्रस्ताव के खिलाफ है।

बस्ती में एक कार्यक्रम के हिस्सा लेकर लौटे टिकैट ने इटावा में पत्रकारों से बात करते हुये उत्तर प्रदेश के बंटबारे से जुडे सवाल पर कहा कि आखिर मायावती प्रदेश की मुखिया है हम उनके मसवरे को चुनौती तो नहीं दे सकते है, बाकी अपने सुझाव दे सके है। टिकैत ने साफ तो शब्दों में कहा कि बंटबारा तो बंटबारा होता है घर का बंटबारा देख लो चाहे जमीन का बंटबारा हो। हम तो ना बंटबारे के पक्ष में है और कभी भी रहे भी नहीं है।

उन्होंने साफ तौर पर कहा कि राजी खुशी कोई काम होता जिसमें खून खराबा ना होता हो और अगर सब सहमत हो और सब की रजामंदी हो तो हमें कोई आपत्ति नहीं, लेकिन हम उत्तर प्रदेश के बंटबारे के कतई पक्ष में नहीं है, टिकैत ने कहा कि जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ उस समय से पहले भी देश रियासतों में बंटा हुआ था और रियासतों बंटे होने के कारण ही गुलाम भी रखा है।

टिकैत ने कहा कि आजादी से पहले देश रियासतों में बंटा था, उसका हाल देख लो क्यो हो गया। आज हालात इतने खराब हो गये है आज देश के बंटबारे के लिये कोई लाल पट्टी बांघ रहा है तो कोई हरी बांघे हुआ घूम रहा है।

ऐसा लगता है जिस तरह से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश के बंटबारे का ताना बाना बुन कर गेंद को राजनैतिक तौर पर उछाल दिया उससे एक बात साफ हे गई है कि मायावती राजनैतिक नफे-नुकसान के चलते उत्तर प्रदेश का बंटबारा करने की बात करने के साथ केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेज कर एक नई राजनैतिक बहस का मुद्दा बना दिया है।

कुशासन, भ्रष्‍टाचार, मंहगाई और बेरोजगारी जैसे जन जीवन को प्रभावित करने वालें मसलों से जनता का ध्यान हटाने के लिए केन्द्र की कांग्रेस और प्रदेश की बसपा सरकारों ने सांठगांठ कर राज्यों के बंटवारे का शिगूफा छेड़ दिया है। राष्‍ट्रीय एकता-अखण्डता और आर्थिक विकास की बजाय छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस तरह की मांग विघटनकारी ताकतों को बल प्रदान करेगी। उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग तो जनता ने कभी की ही नहीं, स्वयं मुख्यमंत्री ही इसे तीन राज्यों में बॉटने की बात कर रही हैं। यदि वे इस प्रदेश का शासन चलाने में अपने को असमर्थ पाती हैं तो उन्हें तत्काल इस्तीफा देकर हट जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के विभाजन की बयानबाजी के बहाने वस्तुत: कुछ तत्व अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं, वे इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि छोटे-छोटे राज्यों के बनने से समस्याओं का समाधान नहीं होता है, बल्कि समस्याएं बढ़ती ही हैं। हरियाणा-पंजाब के झगड़े अभी तक नहीं निबटे हैं जबकि आंध्र प्रदेश-कर्नाटक और तमिलनाडू के बीच जल विवाद से उनके संबंध कटुतापूर्ण हैं, उनकी आर्थिक प्रगति अवरूद्ध हुई है। छोटे राज्यों को हर कदम पर केन्द्र की मदद की जरूरत होती है और इससे राज्य के मामलो में केन्द्रीय हस्तक्षेप की सम्भावनाएं बढ़ती हैं। उत्तार प्रदेश से विभाजित कर बने उत्ताराखण्ड की वर्ष 2005-06 से वर्श 2007-08 के दौरान औसत विकास दर देश की औसत विकास दर से काफी पीछे रही है। यही हाल छत्तीसगढ़ और झारखण्ड राज्यों का भी है।

प्रदेश की बसपा मुख्यमंत्री ने कभी अपनी बात पर ईमानदारी नहीं दिखाई है। बुन्देलखण्ड के लिए वे केन्द्र को चिट्ठियां लिखकर बस राहत पैकेज ही मॉगती रही हैं। पूर्वांचल पर उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया। प्रदेश के विकास के नाम पर वे बस पार्कों स्मारकों के निर्माण, अपनी प्रतिमाओं की स्थापना तथा किसानों को उजाड़कर पूंजीपतियों को राहत देने में रूचि लेती रही हैं। उनके शासनकाल में लूट, वसूली और भ्रष्‍टाचार को खुली छूट मिली है। अफसरशाही के साथ साठगांठ कर बसपा के मंत्री और विधायक भी अपनी मुख्यमंत्री की राह पर चल रहे हैं और मिलावटखारों तथा जमाखोरों को संरक्षण दे रहे हैं। मंहगाई से आम जनता को राहत देने में उनकी रूचि नहीं हैं। नौजवानों को रोजगार देने की कोई योजना नहीं है।

-दिनेश शाक्य

2 Responses to “बंटबारा नहीं उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड का हो विलय”

  1. sandeep srivastava

    किशान नेता का कहना सही है.मुझे खुद भी लगता है की हमारी सहायता कोई दूसरा नहीं कर सकता है,हमें अपने संसाधनों का अच्छे से उपयोग करना चाहिये .हमारे पास बहुत कुछ है,भरपूर जनसंख्या है ,पर सबको काम नहीं है,जिसको नोकरी है वो कार मे घुमे,जो नेता है वो प्लेन मे घुमे,जनता पैदल घुमे,सब को उपर जाना है.जबकी हर एक का काम दुसरे के बगेर काम नाहे चलेगा ,हमारे पास लाइट नही है.हम दूसरो से क्यों ले.पट्रोल नहीं है .गाडी क्यों चलाये .हमारे पास अनाज है हम भूके क्यों रहे.कहने का मतलब है हम बाहर से कुछ भी ना ले.जो हमारे पास बचे तो वस्तू के बदले वस्तू ले.न नेता की जरुरत न साहब की जरुरत.किसान अनाज उपजाए.व्यापारी अनाज को सब तक पहुचए मजदुर मजदुर मेहनते करे.बच्चे ज्ञान ले ,मास्टर ज्ञान बाटे.डाक्टर बीमार को दवा दे,सब बिन पगार के.न पैसे कमाए गे,न पैसे बहायेंगे.न पद रहेगा ना दुरूपयोग होगा.पहलवान बोद्य्बिल्डर मेहनती आदमी बनेगा न के गुंडा बनेगा.न नक्सल रहेगा ,ना पुलिस के जरुरत रहेगा.सब अपने स्किल के मुताबिक काम करेंगे ना कोई उचा न कोई नीचे रहेगा.सब ठीक होगा जब पैसे का महत्व नही रहेगा.तब सिर्फ राम राज्ये रहेगा. इत्ते . नमस्कार

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  2. बी एन गोयल

    B N Goyal

    पहली बार टिकैत ने खुल कर दो टूक बात कही है. वास्तव में मायावती के अजेंडा का पता नहीं चलता. देश या राज्य के कल्याण से किसी भिनेता को कोई लेना देना नहीं है.अपनी राजनीति से किसी को फुर्सत नहीं. लूटो,खसोटो और मौज करो, यही सब का एक मात्र लक्ष्य है. सबसे अच्छी बात यही है की गनीमत है आज के नेताओं में से कोई भी १९४७ में नहीं था नहीं तो देश उसी समय किसी के भी हाथ बिक जाता. कोई एक आदमी/नेता पर हाथ रख कर यह नहीं कह सकता की उसे देश से प्रेम है.अपवाद अपनी जगह हैं.

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