संदर्भ: अमेरिका-इजरायल का ईरान पर हमला
प्रमोद भार्गव
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध आरंभ हो गया है। लेकिन अब यह युद्ध मात्र तीन देशों के बीच न रहकर वैश्विक युद्ध की श्रेणी में बदलता दिख रहा है। क्योंकि ईरान ने कई अरब देशों पर ड्रोन हमले करके बड़ी तबाही मचा दी है। इधर अमेरिकी स्टेल्थ जेट्स ने ईरानी परमाणु ठिकानों फोरदो, इस्फाहन और नातांज पर भारी बमबारी की है। इस हमले की पुष्टि करते हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के ईरानी प्रतिनिधि रेजा नजाफी ने दावा किया है कि ‘अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्यवाही में ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया है। जबकि यहाँ शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा पर काम हो रहा है। बमबारी के बाद इन ठिकानों से परमाणु रिसाव का खतरा बढ़ गया है। यह रिसाव पूरी दुनिया के लिए संकट बन सकता है।’ हालांकि आईएईए के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने इस तरह के किसी हमले की जानकारी से मना किया है। जबकि अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि ईरान परमाणु बम बना रहा है। इसलिए इस कार्यक्रम पर नियंत्रण जरूरी है।
नतांज ईरान का सबसे पुराना परमाणु संयंत्र है। यहाँ दो यूरेनियम संवर्धन संयंत्र स्थापित हैं। यहीं पर जून 2025 में अमेरिका ने हमला किया था। अमेरिका ने इस हमले को जायज ठहराते हुए कहा था कि ईरान इस संयंत्र में परमाणु बम बनाने के लायक यूरेनियम संवर्धन कर रहा था। अब इजरायल के साथ परमाणु ठिकानों पर हमले करके वैश्विक संकट बढ़ा दिया है। यह संकट इसलिए भी बड़ा आकार लेता जा रहा है, क्योंकि ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, जॉर्डन, बहरीन, ओमान, कुवैत, कतर पर भी हमले बोल दिए हैं। ये सब वे मुस्लिम देश हैं, जिनमें अमेरिका के या तो हवाई सैन्य अड्डे हैं, या वे अमेरिका के हमदर्द बने हुए हैं। ईरान ने दुबई पर हमले इसलिए किए हैं, क्योंकि वहाँ अमेरिकी कंपनियाँ कार्यरत हैं।
इस युद्ध में ट्रंप दादागिरी की भूमिका में हैं। उनके अहंकार का ज्ञान तभी हो गया था, जब उन्होंने वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उनके घर से बिना कोई युद्ध किए उठा लिया था। इजरायल और ईरान लंबे समय से एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं। अतएव ईरान की ओर से जब भी खतरे की आशंका होती है, इजरायल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ईरान पर हमला बोल देता है। इसलिए यह कहना स्वाभाविक है कि इजरायल-अमेरिका ने यह हमला एक व्यापक और लंबे समय तक चलने वाले रणनीतिक अभियान के अंतर्गत किया है। ट्रंप बोल भी चुके हैं कि यह लड़ाई एक माह से अधिक खिंच सकती है। इस बीच ईरान पर बड़ी कार्यवाही भी संभव है। यानी यह आशंका बनी हुई है कि अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों को तो नेस्तनाबूद कर ही सकता है, तेहरान पर परमाणु हमला भी कर दे तो कोई हैरानी नहीं होगी?
दरअसल ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए यह संयुक्त हमला किया गया है। अमेरिका और इजरायल को आशंका है कि ईरान ने यूरेनियम संवर्धन प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह ऐसी प्रक्रिया है, जो परमाणु हथियार बनाने की प्रक्रिया को बेहतर बनाती है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत यूरेनियम-235 के निर्माण की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जाता है। अतएव इजरायल के लिए ईरान का परमाणु हथियार संपन्न देश हो जाना चिंता की स्थिति उत्पन्न करने वाली बात है। दरअसल, परमाणु हथियार संपन्न देश होना एक ऐसी सैन्य रणनीति है, जिसके चलते दूसरे देश परमाणु संपन्न देश पर हमला करने से कतराते हैं। इसका बुनियादी कारण है कि यदि कोई देश शत्रु देश पर परमाणु हमला करता है तो जवाबी कार्यवाही में उसे भी परमाणु हमले का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा होता है तो दोनों देशों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। रूस ने यूक्रेन पर आसानी से इसलिए हमला बोल दिया था, क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार नहीं हैं। रूस और अमेरिका के बहकावे में आकर उसने अपने परमाणु हथियार, परमाणु निरस्त्रीकरण संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद समुद्र में नष्ट कर दिए थे। इसका खामियाजा उसे खत्म नहीं होने वाले युद्ध के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
ईरान परमाणु संपन्न देश न बन जाए, इसलिए उस पर अमेरिका ने लंबे समय से परमाणु संबंधी प्रतिबंध लगाए हुए थे। परंतु बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका और ईरान के बीच एक परमाणु समझौता हुआ और ईरान से परमाणु प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए थे। तब भी इजरायल ने इस समझौते का खुला विरोध किया था। नेतन्याहू ने यहाँ तक कहा था कि यह संधि एक ऐतिहासिक भूल है। किंतु उस समय इस संधि को ओबामा की बड़ी उपलब्धि बताकर वैश्विक श्रेय लूटा गया था।
ईरान और इजरायल के बीच तनाव लंबे समय से चला आ रहा है। लेकिन इन देशों ने लंबे समय तक छद्म युद्ध लड़ा है। परंतु जब 1 अप्रैल 2024 को इजरायल ने सीरिया पर हमला किया था तब ईरान ने इजरायल पर सीधा हमला बोला था। क्योंकि इस लड़ाई में ईरान समर्थित इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद रजा जाहेदी समेत 8 अधिकारी मारे गए थे। ईरान ने इस हमले के जवाब में अप्रत्याशित रुख अपनाते हुए लगभग 320 ड्रोन और क्रूज मिसाइलों से हमला किया था। ईरान इजराइल से करीब 1800 किमी की दूरी पर स्थित होने के बावजूद हमला करने में सफल रहा। ईरान ने 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद इजरायल से लंबी दुश्मनी के चलते पहली बार यह सैन्य हमला किया था। इस लड़ाई में इजरायल को अमेरिका ने खुली सामरिक मदद की थी। इस संदर्भ में ईरान ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा था कि उसने यदि अब इजरायल की मदद की तो नतीजा भुगतने को तैयार रहे। ईरान ने यह पलटवार इसलिए भी किया था, जिससे मध्य-पूर्व की राजनीति में उसके वर्चस्व की महिमा को स्वीकार लिया जाए। यदि वह जवाबी हमला नहीं बोलता तो इजरायल और अमेरिका के खिलाफ खामेनेई की जो धारणा है, वह ध्वस्त हो जाती। दरअसल ईरान इजरायल के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करता है। उसका मानना है कि इजरायल ने मुस्लिमों की जमीन पर कब्जा कर रखा है।
बराक ओबामा के कार्यकाल में ईरान से हुए परमाणु समझौते के तहत शर्त थी कि ईरान 300 किलोग्राम से ज्यादा यूरेनियम अपने पास नहीं रख सकेगा। ईरान अपनी परमाणु सेंट्रीफ्यूज प्रयोगशालाओं में दो तिहाई यूरेनियम का 3.67 फीसदी भाग ही रख सकेगा। यह शर्त इसलिए लगाई गई थी, जिससे ईरान परमाणु बम नहीं बना पाए। दरअसल यूरेनियम की प्राकृतिक अवस्था में 20 से 27 प्रतिशत ऐसे बदलाव करने होते हैं, जो यूरेनियम को खतरनाक परमाणु हथियार में तब्दील कर देते हैं। ईरान यूरेनियम में परिवर्तन की तकनीक बहुत पहले हासिल कर चुका है। इसी शंका के चलते 300 किलोग्राम से अधिक यूरेनियम नहीं रखने की बाध्यकारी शर्त मानने के लिए मजबूर कर दिया था। लेकिन 2025 में आई रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा माना गया कि ईरान के पास बड़ी मात्रा में संवर्धित यूरेनियम है, जिससे कई घातक परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। इजरायल अपने अस्तित्व के लिए किसी भी हाल में नहीं चाहता कि ईरान परमाणु संपन्न देश बन जाए। इजरायल की इस मंशा का समर्थन शक्तिशाली देश अमेरिका और उसके तानाशाह की भूमिका में आए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी करते हैं। दोनों देशों की इसी संयुक्त मंशा का परिणाम यह एक ऐसा युद्ध है, जो अब परमाणु नियंत्रण के बहाने धर्म, तेल, गैस और क्षेत्रीय रणनीति की ऐसी कुटिल चालों में उलझता दिखाई दे रहा है, जो विश्व को महाविनाश की ओर ले जा सकता है?
प्रमोद भार्गव