लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आ रहे हैं और हमारे देश की पूरी मशीनरी उनकी खिदमत के लिए तैयार की जा रही है। ओबामा की खूबी है उनका बड़बोलापन। उनके बड़बोलेपन से एक खास किस्म का विभ्रम पैदा होता है। टीवी भाषणकला में वे परम दक्ष हैं।

हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मामले में एकदम फिसड्डी हैं। वे नीति और दफ्तर के आदमी हैं, फाइलों का काम बढ़िया कर लेते हैं। पुराने प्रोफेसर हैं अच्छा सोच लेते हैं, समझाने और नीति बनाने में कुशल हैं, लेकिन वक्तृता में एकदम फिसड्डी हैं। सोनिया गांधी सोचने और बोलने दोनों में फिसड्डी हैं।

काश, ओबामा के आगमन के समय अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री होते। फिर हम देखते बोलने में कौन बाजी मारता है। वक्तृत्वकला में वाजपेयी के सामने ओबामा दुधमुँहे बच्चे हैं।

ओबामा से सार्वजनिक तौर पर बातों में कोई नहीं जीत सकता, वे अपनी बातों से भ्रमित और चकित करते हैं। वे अपना जादुई प्रभाव छोड़ते हैं। वे बोलकर ठगते हैं। वे नीति निपुण नहीं हैं। मनमोहन सिंह नीति निपुण हैं। हमें गर्व है हमारे पास मनमोहन सिंह हैं, लेकिन दुख है कि वे ओबामा की भाषणकला के कायल हैं।

मनमोहन सिंह और पूरी कांग्रेस पर खासकर राहुल गांधी पर ओबामा का जादू सवार है। वे नहीं जानते कि ओबामा को वकृत्व कला विकसित करने में उनके वकालत के पेशे ने मदद की है। वकालत की कला झूठ की कला है। सच को झूठ में और झूठ को अति वास्तविकता में बदलना इस पेशे की खूबी है। ओबामा को इस पेशे ने माहिर बनाया है, इस काम में उनकी मीडिया उस्तादों ने मदद की है।

इसे ओबामा का जादू ही कहा जाएगा कि वे सारी दुनिया को सादगी और खर्चे कम करने का वे उपदेश देते रहे हैं और अब जब भारत आ रहे हैं तो उनके ऊपर भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा पैसा खर्च किया जा रहा है। भारत आने वाले पहले के किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति पर इतना पैसा खर्च नहीं किया गया।

अमेरिका इन दिनों जिस बदहाल अवस्था में है वैसी अवस्था उसकी कभी रही। लाखों बेकार युवक सड़कों पर आवारागर्दी कर रहे हैं। हजारों लोग मकानों की बैंक किश्तें न चुकाए जाने के कारण बेघर हो चुके हैं। अमेरिका की आबादी में सामान्य जीवन बसर करने लायक आम आदमी के पास सुविधाएं नहीं हैं। इसके बाबजूद ओबामा अपनी यात्रा पर बेशुमार दौलत खर्च कर रहे हैं। उनकी इस खर्चीली मानसिकता का अमेरिका की उपभोक्तावादी संस्कृति से गहरा संबंध है।

कल की खबर है कि ओबामा जितने दिन भारत में रहेगे उनके ऊपर अमेरिकी प्रशासन 900 करोड़ रूपये प्रतिदिन खर्चा आएगा। इसके अलावा भारत सरकार का कितना खर्चा होगा इसे आसानी से जोड़ा जा सकता है। मौटे तौर पर ओबामा की यात्रा पर प्रतिदिन 1500-2000 करोड़ रूपये प्रतिदिन का खर्चा आएगा। क्या इतने बड़े खर्चे को आर्थिकमंदी के दौर में जायज ठहराया जा सकता है ? जब हम ओबामा की यात्रा पर इतने बड़े पैमाने पर अतार्किक ढ़ंग से खर्चा कर रहे हैं तो समझौते किस तरह के तर्क से भरे होंगे?

ओबामा की यात्रा और अमेरिकी नव्य उदारतावाद ने भारत के अंदर अमीर देश होने की हसरत पैदा की है और इस हसरत का ही दुष्परिणाम है कि कांग्रेस का नेतृत्व यह मोटी बात अभी समझने के लिए तैयार नहीं है कि अमेरिकी नव्य उदारतावाद और उससे जुड़ी सुरक्षा नीतियां अमेरिका को इराक-अफगानिस्तान युद्ध के मुँह में ले जा चुकी हैं। समूची अमेरिकी अर्थव्यवस्था टूट गयी है। भारत को नव्य उदार सुरक्षा नीतियों के कारण ही कश्मीर में आतंकी मार झेलनी पड़ रही है। बेशुमार पैसा खर्च करना पड़ रहा है।

नव्य उदार सुरक्षा पहलकदमी के गर्भ से ही अलकायदा, आईएसआई, हिजबुल मुजाहिदीन आदि जैसे आतंकी तंत्रों का जन्म हुआ था और इसके निर्माण में अमेरिका का सीधा पैसा लगा और दिमाग लगा है।

ओबामा को चुनाव जीतकर आए दो साल होने को आए किसी भी किस्म की राहत आम जनता के जीवन में नहीं आयी है। बेकारी, गरीबी, निरूद्योगीकरण की भयावह प्रक्रिया थमी नहीं है। 3 ट्रिलियन ड़ालर से ज्यादा के कारपोरेट घरानों को आर्थिक पैकेज दिए जाने के बावजूद अमेरिका में जनता का हाहाकार थमा नहीं है।

उल्लेखनीय है कारपोरेट घरानों ने अमेरिकी में विगत 10 सालों में जितनी मोटी कमाई की है उतनी विगत 50 सालों में नहीं की थी। दूसरी ओर जिस तरह की गरीबी, बेकारी और आर्थिक विपन्नता अमेरिका ने विगत तीन सालों में देखी है, वैसी पहले कभी नहीं देखी थी।

मनमोहन सिंह को पटाने के चक्कर में कई मर्तबा ओबामा विश्वमंचों पर कह चुके हैं कि मनमोहन सिंह इस युग के सबसे सुलझे अर्थशास्त्री हैं। वे उनकी तारीफों के कई बार पुल बांध चुके हैं और उन तारीफों के पुल के पीछे छिपी मंशा को कांग्रेस और उसके नेतृत्व को भांपने की कोशिश करनी चाहिए।

हमें भारत की संप्रभुता के साथ प्रशंसा और सुरक्षा के मुहावरे और जादुई संसार में सौदा करने की मनमोहन सिंह को अनुमति नहीं देनी चाहिए। ओबामा चाहते हैं जिस तरह सोवियत रूस टूटा और वैसे ही भारत भी टूटे और उनकी नजर कश्मीर पर है। वे अफगानिस्तान में रहकर जो कर रहे हैं उससे इस इलाके में आतंकी और पृथकतावादी ताकतों को बल मिला है। ओबामा के सारे प्रयास भारतीय उपमहाद्वीप को अस्थिर करने वाले हैं, वे अमेरिका के सैन्यहितों का इस इलाके में स्थायी बंदोबस्त करने आ रहे हैं। वे चाहते हैं इस काम में भारत उनकी मदद करे।

आने वाले दिनों में ओबामा के भाषणों को देरिदियन ढ़ंग से विखंडित करके देखा जाना चाहिए। वे चाहते हैं कि भारत, अफगानिस्तान में उनका जूनियर पार्टनर बनकर काम करे, वे उस्ताद बने रहेंगे और भारत पट्ठे की तरह काम करे।

वे जानते हैं कि अफगानिस्तान की जनता में अमेरिका और उनके नाटो समूह के देशों की कोई साख नहीं है, वे यह भी जानते हैं कि नाटो की विशाल सेना के रहते हुए आज तक अफगानिस्तान के काबुल शहर के बाहर नाटो की सेनाएं निकल नहीं पायी हैं। नाटो की सेनाएं काबुल एयरपोर्ट से लेकर सैन्यशिविरों के आने-जाने वाले मार्ग तक ही सुरक्षित हैं, बाकी काबुल में तो उन पर अलकायदा के लोग कभी भी हमला कर जाते हैं औऱ नाटो की सेनाएं उनका बाल बांका नहीं कर पाती हैं।

अफगानिस्तान में नाटो की सेनाओं का आलम यह है कि वे अलकायदा को घूस दिए बिना अपने रसद से लदे ट्रकों को सुरक्षित सैन्य कैंपों तक नहीं ले जा सकते। प्रति ट्रक उन्हें 1500 ड़ालर से ज्यादा की अलकायदा के सैनिकों को घूस देनी पड़ती है। यह अमेरिकी सीनेट की आधिकारिक रिपोर्ट में वर्णित सत्य है।

अनेकों मर्तबा अलकायदा के सैनिक नाटो की सेनाओं की रसद लूट चुके हैं। ऐसी अवस्था में अमेरिका का जूनियर बनने का सपना भारत के लिए विपत्ति ला सकता है। अफगानिस्तान के अधिकांश इलाकों में स्थानीय दादाओं का कब्जा बरकरार है।

ओबामा यह भी जानते हैं कि भारत की अफगानिस्तान की जनता में साख है और भारत पर अफगानिस्तान की जनता भरोसा करती है। ओबामा की मंशा है अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के लिए भारत की इसी छवि को भुनाया जाए और वे मूल रूप से इसी काम से आ रहे हैं।

अमेरिका इस इलाके में दोहरा गेम खेल रहा है। एक तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ खोखला हल्ला कर रहा है, दूसरी ओर आतंकियों को शह और पाक को हथियारबंद कर रहा है। वह आतंकियों को परास्त करने के नाम पर पाक को अमेरिका खोखला कर चुका है।

अमेरिका का आतंकविरोधी विश्व अभियान राष्ट्रों को नष्ट करने वाला, खोखला करने वाला, संप्रभुता छीनने वाला अभियान है। इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान उसके आतंकविरोधी अभियान में छिपी बर्बरता, साम्राज्यवादी लूट और वर्चस्व का आदर्श उदाहरण हैं। भारत को कभी भी अमेरिका के सैन्य और रणनीतिक सहयोगी की टोली में शामिल नहीं होना चाहिए। इस टोली का सदस्य बनने के बाद से ब्रिटेन की आर्थिक बर्बादी हमारे सामने है।

ओबामा साहब समानता और विशाल लोकतांत्रिक देश के नाम पर हमें कितना ही भ्रमित करने की कोशिश करें हमें अमेरिका की सैन्य-रणनीतिक टोली का हिस्सा नहीं बनना है। उनके पूर्ववर्ती राष्ट्राध्यक्ष, अफगानिस्तान को सोवियत सेनाओं से मुक्ति दिलाने के नाम पर अफगानिस्तान को बर्बाद कर चुके हैं। सोवियत संघ को सही विकास के मार्ग पर लाने के नाम पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष कंगाली के रास्ते पर फेंक चुके हैं।

अमेरिका के सैन्य-रणनीतिक खेल में शामिल होने के बाद सोवियत संघ जैसा शक्तिशाली देश टूट चुका है। मनमोहन सिंह सरकार ने यदि ओबामा की सैन्य-रणनीतिक टोली का सदस्य बनने के लिए समझौते किए तो भारत की जनता और राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ उनकी यह सबसे बड़ी गद्दारी होगी और इसके लिए भारत की जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।

हम मनमोहन सिंह और उनके सहयोगी नीति निर्माताओं को इस मौके पर बताना चाहते हैं अमेरिका की टोली में शामिल होकर कुछ लोग अमीर बन सकते हैं देश अमीर नहीं सकता। अमेरिका की टोली लुटेरों की टोली है। गुलामों की टोली है। नव्य उदारतावाद की तबाही से संभवतः हमारे शासक यह बात आसानी से समझ सकते हैं।

5 Responses to “ओबामा यात्रा पर विशेष-गुलामों की टोली के लालच”

  1. सुरेश चिपलूनकर

    सुरेश चिपलूनकर

    तौसीफ़ भाई,
    आज़ादी के बाद नेहरु ने भारत को गुटनिरपेक्षता का झुनझुना पकड़ा दिया था और अपरोक्ष रुप से रूस की गोद में बैठ गये थे… ३०-४० साल यह सिलसिला चला। भारत “खुद के दम” पर कुछ बन सके यह तो एक “परिवार” के ५० साला शासन में कभी न हो सका।

    आज की वास्तविकता यह है कि फ़िर हम दो-ध्रुवीय विश्व में हैं, इस बार रूस को “रिप्लेस” किया है चीन ने… अब यह हमारे ऊपर है कि हम चीन पर अधिक भरोसा करें या अमेरिका पर…

    जैसा कि मैंने पहले कहा कि “खुद के दम पर” एक मजबूत देश बनने की पहलवानी तो हमने कभी सीखी ही नहीं (या कहें कि किसी नेता ने सिखाई नहीं), तो हमें इन दोनों में से किसी एक का पिछलग्गू बनना ही पड़ेगा…हर देश अपना-अपना फ़ायदा देखता है, अपनी जनता का हित देखता है, सिर्फ़ भारत ऐसा देश है जिसे “विश्व बन्धुत्व” का भाषण पेलने में महारत हासिल है…।

    एक छोटा सा उदाहरण – यदि हमने समय रहते बर्मा से मधुर सम्बन्ध बना लिये होते, तो आज वह चीन की बजाय हमें तेल बेचता, लेकिन हमने यह नहीं किया…
    यहाँ तक कि भारत का विशाल मध्यमवर्ग एक विराट उपभोक्ता समूह है, हमने इसका भी “हथियार” के रुप में कभी ठीक से प्रयोग नहीं किया…

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  2. Anil Sehgal

    ओबामा यात्रा पर विशेष-गुलामों की टोली के लालच – by – जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

    भारत अमीर देश हो – यह हसरत उत्पन्न करने में अमेरिका का बढ़ा हाथ है.

    अमेरिका की कूट नीति के कारण बाक़ी देशों में यह हसर हो चुका है; भारत को ओबामा यात्रा के दोरान यह याद रखना होगा:

    कि अमेरिका के खेल के कारण

    * सोवियत संघ शक्तिशाली देश खंडित हुआ.

    * सोवियत सेनाओं से मुक्ति दिलाने के नाम पर अफगानिस्तान बर्बाद

    * ब्रिटेन की आर्थिक बर्बादी अमेरिका का हाथ

    * पाक खोखला हो रहा है – आतंकवाद पनप रहा है वहां

    * भारत की अफगानिस्तान में साख को अमेरिका अपने हित में प्रयोग करने की फ़िराक में है.

    * सोवियत रूस की तरह भारत को अमेरिका टूटा देखना चाहता है. पहली नजर कश्मीर पर.

    राष्ट्रवादियो यात्रा के दोरान सजग रहो. मनमोहन सोनिया को मूर्छित मत होने दो. संजीवनी तयार रखो.

    – अनिल सहगल –

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  3. vishal mishra

    श्री जगदीश्वर जी बहुत अच्छे सटीक नसीहतपूर्ण आलेख के लिए साधुवाद। भारत आज तो क्या कभी वह नहीं रहा जिसे आसानी से बेवकूफ बनाया जा सके। जिसमें हो सर्वदमन का बल वह भारत भाग्य विधाता है।

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  4. Tausif Hindustani

    न जाने कब हिंदुस्तान की राजनितिक पार्टियाँ समझेगी की अमेरिका का उद्देश्य सदैव अपने हित में ही रहा है , कभी वो सोविएत यूनियन के विरुद्ध तालिबानों को उसामा बिन लादेन को खड़ा करते हैं फिर काम निकलने के उनको आतंकवादी बना देते हैं , यही हाल सद्दाम हुसैन का इराक में हुआ

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