आलोचना

बिगड़े बोल, गायब होते सवाल

कुमार कृष्णन

राजनीति में शब्दों की अपनी मर्यादा होती है। लोकतंत्र में असहमति जितनी जरूरी है, असहमति व्यक्त करने की भाषा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सत्ता से सवाल पूछना, विरोधियों की नीतियों की आलोचना करना और जनप्रतिनिधियों के कामकाज पर तीखा हमला करना लोकतांत्रिक अधिकार है। मगर जब तर्क की जगह व्यक्तिगत कटाक्ष, चरित्र पर टिप्पणी और अपमानजनक उपमाएं लेने लगें, तो विवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं रहता। वह सार्वजनिक जीवन की भाषा और लोकतांत्रिक संस्कृति का आईना बन जाता है।

बिहार के गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र में सामने आया ताजा राजनीतिक विवाद इसी व्यापक संकट की ओर इशारा करता है। पूर्व जदयू विधायक गोपाल मंडल ने नागपंचमी और विषहरी पूजा के मौके पर गोपालपुर के वर्तमान जदयू विधायक और ऊर्जा मंत्री शैलेश कुमार उर्फ बूलो मंडल तथा जदयू सांसद अजय मंडल पर तीखा हमला करते हुए दोनों की तुलना कथित तौर पर ‘गोरा नाग’ और ‘काला नाग’ से की और कहा कि दोनों डसने का काम करते हैं। अपने बेबाक और विवादित बयानों के लिए चर्चित रहे गोपाल मंडल की यह टिप्पणी स्थानीय राजनीति में स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनी है।

नागपंचमी और विषहरी पूजा के संदर्भ में सांप की उपमा शायद राजनीतिक व्यंग्य को अधिक तीखा और सुर्खियों योग्य बनाने का तरीका हो। मगर सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध को व्यक्त करने के लिए ऐसी भाषा जरूरी है? यदि वर्तमान विधायक या सांसद के कामकाज से पूर्व विधायक को असहमति है, तो उनके पास सवालों की पूरी जमीन मौजूद है। क्षेत्र में बिजली की स्थिति क्या है? विकास योजनाओं की प्रगति कितनी है? रोजगार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सिंचाई की समस्याओं पर क्या काम हुआ? गंगा के कटाव और बाढ़ से प्रभावित लोगों के लिए क्या स्थायी उपाय हुए? सांसद ने क्षेत्र की समस्याओं को संसद में कितनी गंभीरता से उठाया? इन सवालों के जवाब राजनीति को सार्थक बनाते।

लेकिन ‘गोरा नाग’ और ‘काला नाग’ की उपमा इन सवालों को पीछे धकेल देती है।

यही वह बिंदु है जहां गोपाल मंडल का बयान बिहार की सीमा से बाहर निकलकर देश में तेजी से फैलती एक समान राजनीतिक-सामाजिक प्रवृत्ति से जुड़ जाता है। हाल में भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत तथा योगगुरु बाबा रामदेव के बीच ‘गटर जेनरेशन’ को लेकर हुई जुबानी जंग को ही लें। कंगना ने नई पीढ़ी, खासकर युवाओं के एक वर्ग के संदर्भ में ‘गटर जेनरेशन’ जैसी टिप्पणी की। इस पर रामदेव ने आपत्ति जताई। जवाब में कंगना ने उनके बयान को निजी जीवन की सीमा पार करने वाला बताते हुए उनकी ‘जवानी’ और ‘शयनकक्ष’ से जुड़े संकेतों पर पलटवार किया तथा पतंजलि से संबंधित न्यायिक विवादों का भी उल्लेख किया।

यहां भी मूल मुद्दा पीछे छूट गया। युवाओं के व्यवहार, छात्र आंदोलनों या नई पीढ़ी की राजनीतिक चेतना पर बहस हो सकती थी। सवाल उठाया जा सकता था कि आज का युवा आंदोलन किस तरह बदल रहा है, सामाजिक माध्यमों ने राजनीतिक भागीदारी को कैसे प्रभावित किया है और युवाओं की बेचैनी के पीछे बेरोजगारी, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और भविष्य की असुरक्षा कितनी बड़ी वजह है। मगर बहस धीरे-धीरे निजी जिंदगी और चरित्र तक पहुंच गई।

गोपाल मंडल के बयान और कंगना-रामदेव विवाद के बीच यही साझा सूत्र है—मुद्दा कुछ और था, लेकिन भाषा ने उसे कुछ और बना दिया।

राजनीति और सार्वजनिक जीवन में यह बदलाव अचानक नहीं आया है। सामाजिक माध्यमों ने राजनीतिक संवाद की गति तो बढ़ाई ही है, उसकी प्रकृति भी बदल दी है। गंभीर तर्क को पढ़ने और समझने में समय लगता है, लेकिन एक तीखा वाक्य कुछ ही क्षण में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए सार्वजनिक व्यक्तित्वों के सामने एक प्रलोभन पैदा हुआ है—ऐसा कुछ कहा जाए जो बहस को जन्म दे, विवाद खड़ा करे और सुर्खियां बटोरे।

‘वायरल’ होना कई बार राजनीतिक सफलता का नया पैमाना बन गया है।

इसका परिणाम यह है कि सार्वजनिक विमर्श में उत्तेजना बढ़ रही है और विचार घट रहे हैं। नेता और सार्वजनिक व्यक्तित्व जानते हैं कि किसी योजना की विफलता पर पांच मिनट का तथ्यात्मक भाषण शायद सीमित चर्चा पैदा करेगा, लेकिन किसी प्रतिद्वंद्वी को अपमानजनक उपमा देने वाला एक वाक्य रातोंरात सुर्खियां बना सकता है। मीडिया और सामाजिक माध्यमों की तत्काल प्रतिक्रिया इस प्रवृत्ति को और बढ़ाती है।

लेकिन लोकतंत्र को वायरल वाक्यों से नहीं चलाया जा सकता।

गोपालपुर के लोगों के लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उनके विधायक और सांसद ने क्षेत्र के लिए क्या किया, न कि यह कि किसे किस तरह का नाग कहा गया। इसी तरह देश के युवाओं के लिए यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर सरकारों की नीति क्या है, न कि कोई उन्हें किस अपमानजनक विशेषण से संबोधित करता है।

कंगना रनौत एक अभिनेत्री होने के साथ निर्वाचित सांसद भी हैं। इसलिए उनकी सार्वजनिक भाषा की जिम्मेदारी सामान्य सामाजिक माध्यम उपयोगकर्ता से अधिक है। उन्हें युवा पीढ़ी के किसी हिस्से के व्यवहार से असहमति हो सकती है। छात्र आंदोलनों की शैली पर सवाल उठाया जा सकता है। लेकिन पूरी पीढ़ी को अपमानजनक विशेषण से संबोधित करने से उनकी बात मजबूत नहीं होती। इसके उलट, बहस का स्तर नीचे आता है।

बाबा रामदेव भी सार्वजनिक जीवन में प्रभावशाली व्यक्ति हैं। योग, स्वास्थ्य, स्वदेशी और जीवनशैली को लेकर उनकी व्यापक सार्वजनिक उपस्थिति है। इसलिए उनसे भी अपेक्षा होती है कि किसी राजनीतिक या सामाजिक व्यक्तित्व की आलोचना करते समय बहस को व्यक्ति की निजी जिंदगी की ओर न ले जाएं। किसी के विचार को गलत साबित करने के लिए उसके निजी जीवन की चर्चा आवश्यक नहीं होती।

इसी कसौटी पर गोपाल मंडल का बयान भी देखा जाना चाहिए। वे वर्तमान विधायक या सांसद के कामकाज पर कठोर सवाल उठाएं, यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। मगर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को ‘नाग’ कहने से जनता को यह पता नहीं चलता कि आरोप क्या है और उसका प्रमाण क्या है।

लोकतंत्र में व्यंग्य की अपनी जगह है। बिहार की राजनीतिक परंपरा में व्यंग्य और ठिठोली कोई नई चीज नहीं। कई बड़े नेताओं ने हास्य और व्यंग्य के माध्यम से सत्ता की आलोचना की है। फर्क इतना है कि स्वस्थ व्यंग्य व्यवस्था और सत्ता की विसंगतियों पर प्रहार करता है, जबकि व्यक्तिगत कटाक्ष व्यक्ति को ही निशाना बनाता है। पहला लोकतंत्र को मजबूत करता है, दूसरा संवाद को कमजोर।

आज सबसे बड़ा संकट यही है कि दोनों के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।

राजनीतिक आलोचना में तथ्य होने चाहिए। अगर किसी विधायक की नीतियां गलत हैं तो उनकी आलोचना होनी चाहिए। अगर सांसद क्षेत्र के सवाल संसद में नहीं उठा रहे तो जनता को बताया जाना चाहिए। अगर किसी मंत्री के विभाग का प्रदर्शन खराब है तो उसके आंकड़े सामने रखे जाने चाहिए। और अगर किसी सरकार की नीति जनता के खिलाफ है तो उसके सामाजिक और आर्थिक परिणामों पर चर्चा होनी चाहिए।

इससे राजनीति में जवाबदेही पैदा होती है।

इसके उलट व्यक्तिगत अपमान केवल समर्थकों को उत्तेजित करता है। फिर सामने वाला भी उसी भाषा में जवाब देता है। आरोप का जवाब आरोप से, तंज का जवाब तंज से और निजी टिप्पणी का जवाब निजी टिप्पणी से दिया जाता है। अंततः मूल प्रश्न कहीं दिखाई नहीं देता।

यही आज के सार्वजनिक विमर्श की त्रासदी है।

बिहार के सामने सवालों की कमी नहीं है। युवाओं का पलायन, रोजगार, कृषि संकट, बाढ़ और कटाव, शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगिक विकास और स्थानीय अर्थव्यवस्था ऐसे मुद्दे हैं जिन पर गंभीर राजनीतिक बहस की जरूरत है। भागलपुर और गोपालपुर जैसे इलाकों में गंगा का कटाव और बाढ़ केवल चुनावी भाषण का विषय नहीं, हजारों परिवारों की रोजमर्रा की त्रासदी है। किसानों की जमीन, फसल और घर कटते हैं तो उनके सामने किसी राजनीतिक उपमा का कोई अर्थ नहीं होता।

जनता को यह जानना है कि उसके प्रतिनिधि इन समस्याओं के लिए क्या कर रहे हैं।

इसीलिए राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को यह तय करना होगा कि वे जनता का ध्यान समस्याओं की ओर ले जाना चाहते हैं या अपने विरोधियों की भाषा को सुर्खियों में रखना चाहते हैं। यदि राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना और जनसेवा है तो भाषा भी उसी उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।

यह जिम्मेदारी केवल नेताओं की नहीं, मीडिया की भी है। विवादित बयान को खबर बनाना जरूरी हो सकता है, लेकिन उसके साथ यह बताना भी जरूरी है कि बयान के पीछे तथ्य क्या हैं। किसी नेता ने किसी को ‘नाग’ कहा, यह सूचना है; लेकिन असली खबर यह है कि उसने ऐसा क्यों कहा और उसके आरोप में कितनी सच्चाई है। इसी तरह किसी ने नई पीढ़ी को ‘गटर’ कहा, यह सुर्खी बन सकती है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि युवा किन समस्याओं से जूझ रहे हैं।

लोकतंत्र की गुणवत्ता इस बात से तय नहीं होती कि उसके नेता कितने तीखे शब्द बोल सकते हैं। यह इस बात से तय होती है कि वे कितने कठिन सवालों का जवाब दे सकते हैं।

राजनीति में कटुता हो सकती है, लेकिन कटुता के भीतर तर्क होना चाहिए। विरोध हो सकता है, लेकिन विरोध के भीतर तथ्य होने चाहिए। व्यंग्य हो सकता है, लेकिन उसकी सीमा सार्वजनिक गरिमा से तय होनी चाहिए।

गोपाल मंडल का ‘गोरा नाग–काला नाग’ वाला बयान हो या कंगना और रामदेव की ‘गटर’ वाली जुबानी जंग—दोनों घटनाएं एक ही खतरे की ओर संकेत करती हैं। जब सार्वजनिक बहस में शब्द हथियार बन जाते हैं तो मुद्दे गायब हो जाते हैं। और जब मुद्दे गायब होते हैं तो लोकतंत्र का सबसे जरूरी तत्व—जवाबदेही—भी कमजोर पड़ती है।

जनता को यह तय करना होगा कि वह नेताओं के शब्दों से प्रभावित होगी या उनके काम का हिसाब मांगेगी। 

क्योंकि बिहार और देश को ‘नाग’ और ‘गटर’ की राजनीति से ज्यादा उन सवालों की जरूरत है जो आम आदमी की जिंदगी बदलते हैं।

बिगड़े बोल कुछ क्षणों के लिए सुर्खियां बना सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली भाषा वही है जिसमें तर्क हो, तथ्य हों और जनता के सवालों के जवाब हों। राजनीति को यदि सचमुच जनता के करीब रहना है तो उसे बिगड़े बोल नहीं, बड़े सवाल चुनने होंगे।