रामस्वरूप रावतसरे
मशहूर पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। उन्होंने 70 साल की उम्र में रायपुर के एम्स अस्पताल में तड़के 3.15 बजे अपनी आखिरी सांस ली। तीजन बाई पिछले काफी समय से गंभीर रूप से बीमार चल रही थीं और अस्पताल में उनका इलाज किया जा रहा था। उन्होंने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक कला और पंडवानी गायन को पूरी दुनिया में एक नई और खास पहचान दिलाई थी। उनके जाने से कला जगत में एक बहुत बड़ा शून्य पैदा हो गया है जिसकी भरपाई नामुमकिन है।
छत्तीसगढ़ के भिलाई के पास गनियारी गांव में वह पारधी जनजाति की थी। पिता चुनुकलाल परधा और माता सुखवती के आँगन में 8 अगस्त 1956 को जन्मी तीजन बाई की प्रतिभा को लोकगायक उमेद सिंह देशमुख ने निखारा हालाँकि वे बचपन में अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कहानियाँ सुनती हुई बढ़ी हुईं।
यहीं से उनके मन में पंडवानी सीखने की इच्छा जागी। उन्होंने महज 13 साल की उम्र में पहली बार एक मंच पर प्रस्तुति दी थी जिसके लिए उन्हें सिर्फ 10 रुपए मिले थे। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। तीजन बाई ने कापालिक स्टाइल में पंडवानी गाकर गांव-गांव में अपनी पहचान बनाई थी।
तीजन बाई कला की दुनिया में सिर्फ अपनी बेहतरीन गायकी के लिए नहीं, बल्कि अपनी गजब की हिम्मत के लिए भी जानी जाती हैं। वे पहली ऐसी महिला कलाकार थीं, जिन्होंने पंडवानी गाने के लिए सदियों पुराने दकियानूसी नियमों को तोड़ दिया। उस दौर में महिलाओं को केवल बैठकर ‘वेदामति’ शैली में गाने की इजाजत थी। लेकिन तीजन बाई ने इस पाबंदी को किनारे रखकर खड़े होकर और पूरे जोश के साथ मंच पर परफॉर्म करना शुरू किया। उनकी कड़क, दमदार और भारी आवाज ने पुरुषों के दबदबे वाले लोक संगीत में अपनी अलग पहचान बनाई।
तीजन बाई ने अपनी मेहनत से इतिहास रच दिया। तीजन बाई की पर्सनल लाइफ बेहद मुश्किलों और संघर्षों भरी रही। उनकी पहली शादी बहुत कम उम्र में, लगभग 12 साल की उम्र में कर दी गई थी। जब उन्होंने पंडवानी गाना शुरू किया तो उन्हें अपने ही परिवार और समाज के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। इस वजह से उनकी पहली शादी टूट गई। समाज के बहिष्कार और भयंकर गरीबी के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। बाद में उन्होंने तुकाराम उर्फ टुक्का राम से दूसरी शादी की। तमाम पारिवारिक दुखों के बावजूद उन्होंने अपनी कला को जिंदा रखा।
लोक कला की मल्लिका तीजन बाई ने पांच दशकों से भी ज्यादा समय तक मंच पर रहकर देश-विदेश में हजारों लाइव परफॉर्मेंस दीं। उन्होंने बड़े सिंगर्स की तरह स्टूडियो के बंद कमरों में बैठकर हजारों गाने रिकॉर्ड तो नहीं किए लेकिन जब वो हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर उतरती थीं तो ‘महाभारत’ की कहानियों में जैसे जान फूंक देती थीं। उनका ये जीवंत अंदाज लोगों को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर देता था। तीजन बाई की इसी अनोखी और बेमिसाल कला ने उन्हें भारतीय लोक संगीत की दुनिया में हमेशा-हमेशा के लिए अमर बना दिया। आज भी लोग उनके इस खास अंदाज के दीवाने हैं।
छत्तीसगढ़ की मशहूर लोक गायिका तीजन बाई ने अपनी अनोखी कला से पूरी दुनिया में एक खास पहचान बनाई थी। कला के क्षेत्र में उनके इसी शानदार योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के बड़े नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया। सबसे पहले साल 1988 में उन्हें ‘पद्मश्री’ दिया गया। इसके बाद उनकी कला का जादू ऐसा चला कि साल 2003 में उन्हें ‘पद्म भूषण’ से नवाजा गया। तीजन बाई की लोकप्रियता यहीं नहीं रुकी, साल 2019 में सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया। देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन करने वाली तीजनबाई को बिलासपुर विश्वविद्यालय ने डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया था। भले ही तीजन बाई आज शारीरिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन पंडवानी गायन में गूंजने वाली उनकी दमदार आवाज हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी।
रामस्वरूप रावतसरे