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    Homeसाहित्‍यकवितापीड़ा का पिंजरा

    पीड़ा का पिंजरा

     

    पीड़ा के पिंजड़े की क़ैदी हूँ,

    पिंजड़े को तोडकर निकलना

    चाहती हूँ…

    पर सारी कोशिशें नाकाम हो रही हैं।

    जब भी ऐसा करने की कोशिश करती हूँ,

    पीड़ा बाँध लेती है, जकड़ लेती है।

    किस जुर्म की सज़ा मे क़ैद हूँ,

    नहीं पता……

    कितने दिन के लिये क़ैद हूँ,

    ये भी नहीं पता…

    कुछ महीने या साल,

    आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड,

    नहीं पता!

    बीनू भटनागर
    बीनू भटनागर
    मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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