विश्ववार्ता

खुद की लगाई आग में जलता पाकिस्तान

सुरेश हिंदुस्तानी

आर्थिक बदहाली के साए में बुरी तरह से घिर चुके पाकिस्तान के समक्ष अब एक और नई परेशानी विकराल रूप धारण कर चुकी है। पाकिस्तान के लिए यह संकट उसकी खुद की ही देन कहा जा सकता है। क्योंकि सरकार और सेना जिस प्रकार के कार्य को अंजाम दे रहे हैं, वे मात्र दिखावे के अलावा और कुछ नहीं है। पाकिस्तान में जहाँ एक ओर क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने इमरान खान की रिहाई के लिए सरकार विरोधी आंदोलन आग का रूप ले रहा है, वहीं पाकिस्तान के पडोसी देश अफगानिस्तान के साथ तनातनी वाला माहौल आग में घी डालने का कार्य कर रहा है। इससे कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें पाकिस्तान सरकार के विरोध में आती जा रही हैं। इस सबके पीछे एक बड़ा कारण यह भी समझ में आ रहा है कि आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के समक्ष एक ऐसा खतरा पैदा हो गया है, जिससे वह ब्लेक लिस्ट में आ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पाकिस्तान का भविष्य अंधकार युक्त हो सकता है।

वर्तमान में पाकिस्तान जिस रास्ते पर चल पड़ा है, वह उसे मजबूती की ओर नहीं, बल्कि स्वयं के बनाए संकटों की ओर ले जा रहा है। पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति को देखकर एक पुरानी कहावत याद आती है दूसरों के लिए खोदा गया गड्ढा कभी-कभी स्वयं के लिए भी खतरनाक हो जाता है। दशकों से आतंकवाद, कट्टरपंथ और पड़ोसी देशों के प्रति टकराव को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाने वाला पाकिस्तान आज उन्हीं नीतियों के दुष्परिणामों से जूझ रहा है। भारत के साथ तनाव तो उसकी पुरानी कहानी है, लेकिन अब अफगानिस्तान भी उसके लिए गंभीर चुनौती बन गया है। भीतर से राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक दबाव अलग संकट पैदा कर रहे हैं। सबसे ताजा और चिंताजनक घटनाक्रम पाकिस्तान अफगानिस्तान सीमा पर दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान ने हाल के दिनों में अफगानिस्तान के भीतर हवाई हमले किए हैं और उसका दावा है कि वहां से पाकिस्तान विरोधी आतंकवादी गतिविधियां संचालित हो रही थीं। दूसरी ओर तालिबान सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है। अक्टूबर की शुरुआत में पाकिस्तानी हवाई हमलों में अफगानिस्तान में नागरिकों के मारे जाने की खबरों के बाद तनाव और बढ़ा है। जिस तालिबान को पाकिस्तान ने लंबे समय तक अपने रणनीतिक हितों के लिए समर्थन दिया, आज उसी के साथ उसके संबंध इतने खराब हो चुके हैं कि दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव की स्थिति पैदा हो रही है। कभी पाकिस्तान को उम्मीद थी कि अफगानिस्तान में उसकी पसंद की सत्ता उसके रणनीतिक हितों की रक्षा करेगी। लेकिन आतंकवाद और कट्टरपंथ की राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि जिसे आज अपने हित में इस्तेमाल किया जाता है, वह कल नियंत्रण से बाहर हो सकता है।

अफगानिस्तान के साथ टकराव केवल सीमा विवाद नहीं है। यह पाकिस्तान की उस नीति की विफलता का संकेत है जिसमें आतंकवाद को रणनीतिक संपत्ति समझने की भूल की गई। पाकिस्तान स्वयं अब तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी और अन्य आतंकी संगठनों की हिंसा से परेशान है। दूसरी ओर भारत के साथ भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। अक्टूबर की शुरुआत में पंजाब सीमा पर हुई घटना के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे के शीर्ष राजनयिकों को तलब किया। यह स्थिति बताती है कि पाकिस्तान के सामने केवल एक सीमा की चुनौती नहीं है। पश्चिम में अफगानिस्तान, पूर्व में भारत और भीतर आतंकवाद तथा राजनीतिक अस्थिरता, चारों दिशाओं से संकट दिखाई दे रहा है। ऐसे में प्रश्न यह है कि पाकिस्तान अपनी ऊर्जा आखिर किस दिशा में लगाएगा।

पाकिस्तान में इमरान खान के समर्थकों ने अक्टूबर की शुरुआत में उनकी रिहाई की मांग को लेकर इस्लामाबाद की ओर मार्च शुरू किया। सरकार ने राजधानी में सुरक्षा बढ़ाई और रास्तों को बंद किया। राजनीतिक संकट का यह खेल पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता को ही बढ़ावा दे रहा है। हालांकि पाकिस्तान की राजनीति लंबे समय से सत्ता के लिए राजनीतिक संघर्ष और सैन्य प्रभाव के बीच झूलती रही है। जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई से राहत चाहिए, लेकिन राजनीतिक विमर्श लगातार सत्ता हासिल करने और सत्ता बचाने की लड़ाई में उलझा रहता है।

आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का सहारा लेना पड़ा है। इसका अर्थ साफ है कि पाकिस्तान तत्काल आर्थिक संकट से कुछ राहत पा सकता है, लेकिन उसकी मूल समस्याएं अभी समाप्त नहीं हुई हैं। कर्ज, कमजोर कर व्यवस्था, ऊर्जा क्षेत्र की समस्याएं और सीमित आर्थिक अवसर उसके सामने बड़ी चुनौतियां हैं।

ऐसे समय में पड़ोसी देशों के साथ लगातार तनाव पाकिस्तान के लिए कितना महंगा साबित होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। कोई भी देश तभी मजबूत बनता है जब उसकी सीमाएं सुरक्षित होने के साथ उसकी अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो। केवल सैन्य शक्ति पर निर्भर रहकर आर्थिक कमजोरी को स्थायी रूप से दूर नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान में जिन नीतियों को कभी उसकी ताकत समझा गया, वे अब उसकी कमजोरी बनती जा रही हैं। आतंकवाद के सहारे भारत को दबाने की नीति ने उसे आतंकवाद से मुक्त नहीं किया। अफगानिस्तान में प्रभाव कायम रखने की रणनीति ने अंततः उसी के साथ संघर्ष की स्थिति पैदा कर दी। सैन्य वर्चस्व ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत नहीं होने दिया और राजनीतिक अस्थिरता ने आर्थिक विकास को बाधित किया।

अब पाकिस्तान के सामने चुनाव है। क्या वह पुरानी आग को और हवा देगा या उसे बुझाने का साहस करेगा? भारत के लिए पाकिस्तान की स्थिति निश्चित रूप से चिंता का विषय है। अस्थिर और परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी पूरे क्षेत्र के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए भारत को अपनी सुरक्षा के प्रति पूरी तरह सतर्क रहते हुए आतंकवाद और घुसपैठ के खिलाफ कठोर नीति जारी रखनी होगी। पाकिस्तान को भी यह समझना होगा कि भारत से स्थायी टकराव उसके आर्थिक संकट का समाधान नहीं है और अफगानिस्तान के साथ सैन्य संघर्ष आतंकवाद की समस्या को खत्म नहीं कर सकता। इसके लिए नीति में बुनियादी बदलाव चाहिए। उसे आतंकवाद को किसी भी रूप में रणनीतिक हथियार मानने की मानसिकता छोड़नी होगी। पड़ोसियों के साथ संबंधों को टकराव के बजाय व्यापार और संवाद की दिशा में ले जाना होगा। सेना और राजनीतिक संस्थाओं के बीच संतुलन कायम करना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाना होगा कि पाकिस्तान का भविष्य बंदूक से नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक स्थिरता से बनेगा। आज पाकिस्तान के सामने असली चुनौती भारत को हराना नहीं है। असली चुनौती अपने भीतर पैदा किए गए संकटों से बाहर निकलना है। क्योंकि इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है दूसरों को जलाने के लिए लगाई गई आग को यदि समय रहते बुझाया न जाए, तो उसकी लपटें अंततः अपने ही घर की दीवारों को जला देती हैं। पाकिस्तान आज उसी आग के बीच खड़ा है और अब सवाल यह नहीं कि आग किसने लगाई, सवाल यह है कि उसे बुझाने का साहस कौन करेगा।