लेख विधि-कानून

दवा में डकैती

संदर्भ- सर्वोच्च न्यायालय की महंगी दवाओं पर तीखी प्रतिक्रिया
प्रमोद भार्गव

सर्वोच्च न्यायालय ने कैंसर की दवाओं की एमआरपी और सरकारी खरीद मूल्य के बीच बड़े अंतर को अजूबा करार दिया है। यह अंतर 10 गुना से भी ज्यादा है। 2700 रुपए की खुदरा बिक्री वाली कैंसर की दवा पर एमआरपी 27,000 रुपए अंकित होने पर इसे न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और संदीप मेहता की पीठ ने पहले तो ‘दिन-दहाड़े‘ डकैती कहा और फिर 29 सितंबर 2026 को की गई सुनवाई में इस भारी अंतर को दो टूक शब्दों में ‘कत्लेआम‘ यानी ‘सामूहिक-संहार‘ तक कहने में संकोच नहीं किया। दवा कारोबारी, निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पतालों में दवाओं की खरीद करने वाले जिम्मेदारों के लिए इससे तीखी टिप्पणी, दूसरी कोई हो नहीं सकती? अदालत ने यह सवाल भी खड़ा किया कि ‘इतना पैसा कहां जा रहा है और फायदा किसे हो रहा है?‘ यह टिप्पणी सीधे-सीधे दवा उत्पादक, निजी अस्पतालों के मालिक एवं चिकित्सक तथा सरकारी खरीद में लिप्त जिम्मेदारों का अमानवीय चेहरा सामने लाती है।

यह विडंबना तब है, जब भारत सरकार एक दवा, एक मूल्य और एक गुणवत्ता नीति से जुड़ा कानून फरवरी 2025 में पूरे देश में लागू कर चुकी है। इस नियम के तहत खेरीज, थोक दवा विक्रेताओं और ई-फार्मेसी को दवाओं की मूल्य-सूची को सार्वजनिक रूप से दिखाना अनिवार्य है, ताकि रोगियों को तय दामों पर ही उचित गुणवत्ता की मानक दवाएं मिल सकें। परंतु शीर्ष न्यायालय की इस तीखी प्रतिक्रिया से साफ है कि दवा विक्रेताओं और सरकारी दवा खरीद से जुड़े अधिकारियों ने इस कानून को बट्टे खाते में डाल दिया है। कार्पोरेट अस्पताल अब सेवा नहीं उद्योग बन गए हैं। यहां तक कि ये अस्पताल के भीतर स्थित मेडिकल स्टोर से ही रोगी को दवा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। यदि कोई रोगी बाहर से दवा लाने को कहता है तो उपचार की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने की बात (एक तरह की धमकी) कहते हैं। जबकि इनमें से ज्यादातर अस्पताल आयुष्मान भारत और अन्य सरकारी लाभदायी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत भी उपचार करते हैं। यानी दवा उत्पादकों और अस्पतालों की मनमानी कानून अस्तित्व में आने के बाद भी बनी हुई है। क्योंकि फार्मा कंपनियां अपनी दवाओं के मूल्य का निर्धारण किस आधार पर करती हैं, यह भी एक बड़ा सवाल है? साफ है, जब दवाएं आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आती हैं, तो फिर एमआरपी के छद्म-आधारित मूल्य व्यवस्था कैसे और क्यों बनी हुई है? जबकि सबका स्वस्थ रहना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

कुछ समय पहले कंपनी मामलों के मंत्रालय की एक सर्वे रिपोर्ट ने सरकार को आगाह किया था कि दवाएं आम आदमी की पहुंच से जानबूझकर बाहर की जा रही हैं। इस रिपोर्ट ने तय किया कि दवाओं की महंगाई का कारण दवा में लगने वाली सामग्री का महंगा होना नहीं है, बल्कि दवा कंपनियों का मुनाफे की हवस में बदल जाना है। इस लालच के चलते कंपनियां राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के नियमों का भी पालन नहीं करती हैं और दवाओं की कीमत कई सैकड़ा गुना तक अधिक रख देती हैं। यहां तक कि नामी-गिरामी दवा कंपनियां भी दो सौ से पांच सौ गुना ज्यादा कीमत अपने दवा उत्पादों की रख रही हैं। ये महंगे दवा उत्पाद सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार के बूते खपाए जाते हैं।

इसके पहले नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने भी देशी-विदेशी दवा कंपनियों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि दवा कंपनियों ने सरकार द्वारा दी उत्पाद शुल्क में छूट का लाभ तो लिया, लेकिन दवाओं की कीमतों में कटौती नहीं की? यह गोलमाल प्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों के साथ तो हो ही रहा है, अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के साथ राजस्व कर के रूप में भी हो रहा है। इस धोखाधड़ी को लेकर सीएजी ने सरकार को दवा मूल्य नियंत्रण अधिनियम में संशोधन का सुझाव दिया था। ऐसे ही सुझावों को मानते हुए सरकार ने देशभर में फैले सीजीएचएस के 1200 अस्पताल, 200 जांच केंद्र, 500 वेलनेस सेंटर और 8000 से अधिक जन-औषधि भंडारों पर एक मूल्य, एक दवा भेजने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। हालांकि इस योजना पर प्रभावी अमल की दृष्टि से सरकार को मजबूत और पारदर्शी नेटवर्क बनाना होगा? जिसके लिए प्रभावी डेटा भी जरूरी है। इस दवा वितरण में बोली के आधार पर भागीदारी करने वाले विक्रेताओं की तकनीकी योग्यता से कहीं ज्यादा ईमानदारी के मानदंडों की जरूरत है। दवा क्रय समिति को भी उन दवाओं को खरीदने की जरूरत है, जो उपचार में प्रभावी और कीमत में सस्ती हों। क्योंकि अंततः सरकार का उद्देश्य आम आदमी को सस्ती, असरकारी और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराना ही है। चूंकि देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है, इसलिए उन्हें भी यदि इस योजना में भागीदार बना लिया जाए तो दवा वितरण का दायरा तो बढ़ा होगा ही, लाभ लेने वाले रोगियों का दायरा भी बढ़ जाएगा।

इंसान की जीवन-रक्षा से जुड़ा दवा कारोबार अपने देश में तेजी से मुनाफे की अमानवीय व अनैतिक हवस में बदलता जा रहा है। चिकित्सकों को महंगे उपहार देकर रोगियों के लिए महंगी और गैर जरूरी दवाएं लिखवाने का प्रचलन लाभ का धंधा हो गया है। बेमतलब की अनेक जांचें भी केवल मुनाफे के लिए कराई जा रही हैं। दरअसल, वर्तमान में दवा कारोबार मुनाफे की हवस की गिरफ्त में तो है ही, निजी चिकित्सालय उद्योग रोगी पैदा करने और रोगी बनाए रखने का काम भी कर रहे हैं। इसलिए चिकित्सकों पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि वे दवा कारोबार की सेवा में लिप्त हैं। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि चिकित्सक ज्ञान तो निश्चित रूप से उच्च चिकित्सा संस्थानों से प्राप्त करते हैं, लेकिन चिकित्सा-सेवा में आने के बाद उनके इस ज्ञान का अपहरण दवा उद्योग कर लेते हैं। अतएव ज्यादातर डॉक्टर पर्चे में वहीं दवाएं लिखते हैं, जो उन्हें दवा कंपनियों के एमआर समझाते हैं और कमीशन के साथ उपहार देते हैं। जबकि चिकित्सा का व्यवसाय जीवन रक्षा का धंधा है। वह मनुष्यता की संवेदना और मर्म की सुरक्षा का नैतिक व्यवसाय है। एक लाचार मरीज चिकित्सक के पास स्वास्थ्य लाभ लेने की उम्मीद से जाता है, न कि दवा उद्योग के लालच को बढ़ाने की दृष्टि से? किंतु पैसा कमाने की अनैतिक होड़ का ही परिणाम है कि रोगी अब चिकित्सक को धरती का भगवान मानने से मुकर रहा है। इस अविश्वास के चलते ही अस्पतालों में चिकित्सक और रोगियों के परिजनों के बीच निरंतर मारपीट और ज्यादा धन वसूलने के विवाद सामने आ रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में शीर्ष न्यायालय की डकैती और सामूहिक संहार जैसी टिप्पणियों को बेवजह की प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता है।

प्रमोद भार्गव