पाकिस्तान का आर्थिक चक्रव्यूह में फंसना तय

अरविंद जयतिलक

पुलवामा में जैश ए मुहम्मद के आतंकी के आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के चार दर्जन से अधिक जवानों की शहादत के उपरांत भारत द्वारा पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) यानी तरजीही राष्ट्र का दर्जा छीना जाना बेहद सख्त कदम है। यह इसलिए आवश्यक था कि लाख समझाने-बुझाने के बाद भी पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने से बाज नहीं आया और उसने पुलवामा में तो नृशंसता की सारी हदें पार कर दी। दो राय नहीं कि पाकिस्तान से तरजीही राष्ट्र का दर्जा वापस लिए जाने से दोनों देशों का आर्थिक कारोबार प्रभावित होगा और संबंधों में खटास पैदा होगा। लेकिन पाकिस्तान की कायरतापूर्ण कृत्यों को देखते हुए उसके साथ कूटनीतिक-आर्थिक संबंधों पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक हो गया था। यहां ध्यान देना होगा कि पाकिस्तान से तरजीही राष्ट्र का दर्जा वापस लिए जाने से सर्वाधिक नुकसान पाकिस्तान को ही उठाना होगा। इसलिए कि भारत पाकिस्तान को चीनी, तेल, केक, पेट्रोलियम आॅयल, टायर, रबड़, काॅटन, कालीन, गलीचा, शाॅल और स्टोल, नामदा, गब्बा, केमिकल, स्टेपल फाइबर जैसे औद्योगिक कच्चे माल एवं चाय तथा नमक जैसे घरेलू उत्पादों का सस्ते दामों पर निर्यात करता है। इन वस्तुओं के निर्यात से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को गति मिलती है और लाखों लोग रोजगार से लाभान्वित होते हैं। तरजीही राष्ट्र का दर्जा वापस लिए जाने से भारत अब इन वस्तुओं का निर्यात नहीं करेगा जिससे कि पाकिस्तानी उत्पादों की कीमत बढ़ेगी और महंगाई आसमान छुएगी। यहां ध्यान देना होगा कि पाकिस्तान से तरजीही राष्ट्र का दर्जा वापस लिए जाने से भारत के आर्थिक सेहत पर इसलिए बहुत अधिक प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा कि पाकिस्तान को होने वाला निर्यात भारत के कुल निर्यात का बहुत छोटा हिस्सा है। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत के कुल निर्यात का महज 0.83 प्रतिशत पाकिस्तान को जाता है जबकि पाकिस्तान से हमारा आयात कुल आयात का 0.13 प्रतिशत है। गत वित्त वर्ष में दोनों देशों के बीच 2.67 अरब डाॅलर का वस्तु व्यापार हुआ जिसमें निर्यात 2.17 अरब डाॅलर तथा आयात 50 करोड़ डाॅलर रहा। भारत के कारोबारी पाकिस्तान की तुलना में छः गुना तक पाक को निर्यात करते हैं। ऐसे में अगर भारत पाकिस्तान से तरजीही राष्ट्र का दर्जा वापस लेता है तो भारत को कोई खास नुकसान नहीं होगा लेकिन हां पाकिस्तान को इसका खामियाजा अवश्य भुगतना होगा। बाजार के विश्लेषकों की मानें तो भारत द्वारा निर्यात रोके जाने से जहां पाकिस्तान के बाजारों में दैनिक उत्पादों की कीमत बढ़ जाएंगी और जनता को इसके लिए ज्यादा कीमत चुकाना होगा। उदाहरण के लिए अगर भारत काॅटन और केमिकल पदार्थों का ही निर्यात बंद कर दे तो पाकिस्तान के टेक्सटाइल्स मिलों और औद्योगिक कल-कारखानों के पहिए थम जाएंगे। किसी से छिपा नहीं है कि भारत द्वारा पाकिस्तानी मिलों को सस्ते दामों पर काॅटन उपलब्ध कराया जाता है जिसकी वजह से उसके रेडिमेड उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में टिके हुए हैं। अगर भारत निर्यात बंद किया तो फिर टेक्सटाइल्स मामले में पाकिस्तान का अंतर्राष्ट्रीय बाजार में टिक पाना मुश्किल होगा और उसका सीधा फायदा भारत को मिलेगा। इसलिए कि टेक्सटाइल्स बाजार में बांग्लादेश और पाकिस्तान ही भारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंदी हैं। पाकिस्तान के लिए जो दूसरा सबसे बड़ा दिक्कत होगा वह यह कि पड़ोस में भारत जैसा कोई बाजार नहीं है जो उसकी जरुरतों को पूरा कर सके। दो राय नहीं कि पाकिस्तान चीन के साथ वरीयता के साथ व्यापार कर रहा है लेकिन इससे उसका उद्योग किसी समस्या का समाधान ढुंढ नहीं पा रहा है। उसका कारण यह है कि चीन द्वारा पाकिस्तान को निर्यात किया जाने वाले कच्चा माल काफी महंगा होता है। गौर करें तो विगत कुछ वर्षों से पाकिस्तान लगातार व्यापार घाटा झेल रहा है। ऐसे में अगर कहीं भारत निर्यात बंद करता है तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार पड़ेगी। उल्लेखनीय है कि भारत ने 1996 में दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध स्थापित करने के लिए पाकिस्तान को तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिया था। यह दर्जा विश्व व्यापार संगठन के शुल्क एवं सामान्य समझौते के तहत दिया गया। तरजीही राष्ट्र का दर्जा मिलने से ही पाकिस्तान को अधिक आयात कोटा और कम टेªड टैरिफ की सुविधाएं मिलती है। गौरतलब है कि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुसार दूसरे सदस्य देश से तरजीही राष्ट्र का दर्जा पाना किसी भी देश का मौलिक अधिकार है। भारत द्वारा पाकिस्तान को तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिए जाने से वस्तुओं की सकारात्मक सूची के अंतर्गत भारत द्वारा निर्यात किए जाने वाले उत्पादों की संख्या में लगातार विस्तार हो रहा है। इसका सीधा फायदा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को मिल रहा है। भारत के प्रयासों से ही श्रीनगर-मुजफ्फराबाद एवं पूंछ-रावलकोट मार्गों पर नियंत्रण रेखा पार व्यापार संभव हुआ है। इसके लिए शुल्क मुक्त आवाजाही के लिए 21 मदों की पहचान की गयी। सालमाबाद से चकोती एवं चकंदाबाग से रावलकोट को व्यापार की जाने वाली मदों में बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत द्वारा पाकिस्तान से तरजीही राष्ट्र का दर्जा वापस लिए जाने से पाकिस्तान के आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ेगी। वैसे भी गौर करें तो आज की तारीख में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरे दौर में है। अमेरिका ने उसकी आर्थिक नाकेबंदी शुरु कर दी है। आतंकवाद और अराजकता के कारण उद्योग-धंधे बदहाली के कगार पर है। नागरिकों की क्रयशक्ति और प्रतिव्यक्ति आय में जबरदस्त गिरावट आ रही है। आज की तारीख में पाकिस्तान विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से मिलने वाली मदद पर निर्भर होकर रह गया है। उसके उत्पादन और खपत में गिरावट से कीमतें आसमान छू रही हैं। गरीबी व बेरोजगारी रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। युवाओं की आबादी का बड़ा हिस्सा नौकरी की तलाश में देश से पलायन कर रहा है। आंकड़े बताते हैं कि बीते साल में पाकिस्तान के तकरीबन 10 लाख युवाओं ने देश छोड़ा है। पाकिस्तान के केंद्रीय योजना व विकास मंत्रालय के मुताबिक विगत देश में गरीबों को अनुपात बढ़कर 30 प्रतिशत के पार पहुंच चुका है। आज पाकिस्तान के हर नागरिक पर तकरीबन 1 लाख 30 हजार रुपए का कर्ज है। लेकिन विडंबना यह है कि इसके बावजूद भी पाकिस्तान समझने को तैयार नहीं है। भारत द्वारा पाकिस्तान से तरजीही राष्ट्र का दर्जा इसलिए भी लिया जाना आवश्यक हो गया था कि वर्षों बाद भी उसने भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा नहीं दिया। वह इस मसले पर वह कई बार पलटी मारता नजर आया। अक्सर उसके द्वारा सुर अलापा जाता रहा है कि भारत के साथ संबंधों में ठोस सुधार होने के बाद ही व्यापार के लिए उसे तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिए जाने का फैसला किया जाएगा। याद होगा गत वर्ष पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और तत्कालीन विदेशमंत्री हिना रब्बानी खार ने भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा देने का एलान किया था और यहां तक कहा था कि इस फैसले से पीछे हटने का सवाल ही नहीं है। इस सिलसिले में उन्होंने संयुक्त राष्ट्रª सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान को अस्थायी सदस्य बनाए जाने में भारत का समर्थन, यूरोपीय बाजारों में पाकिस्तान की पहुंच को लेकर विश्व व्यापार संगठन में भारत की ओर से अवरोध हटाए जाने का जिक्र भी किया। लेकिन पाकिस्तानी सेना के विरोध के कारण गिलानी सरकार ने भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा देने से कदम पीछे हटा लिया। और उसके बाद पाकिस्तान द्वारा बार-बार रट लगाया जाता रहा कि स्थिति अनुकूल होने पर ही वह भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा देगा। जबकि पाकिस्तान भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा दे दिया होता तो सर्वाधिक फायदा उसे ही मिलता। उसके तेज बाजार एवं विकास को गति मिलती और दोनों देशों के बीच व्यापार कई गुना बढ़ जाता। सूचना प्रौद्योगिकी एवं विनिर्माण समेत कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलता। लेकिन आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले पाकिस्तान को यह छोटी सी भी बात समझ में नहीं आयी और वह अपनी समस्त उर्जा भारत में आतंकी गतिविधियों को फैलाने में खर्च करता रहा। अब उसे अपने किए का नतीजा भुगतना होगा। अब समय आ गया है कि भारत पाकिस्तान पर नकेल कसने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सामरिक गोलबंदी तेज करे और पाकिस्तान को मजा चखाए।

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