राजनीति

संसद का सियासी संग्राम: असहमति के शोर में गुम होती संसदीय मर्यादा


ओ.पी. पाल 
भारतीय लोकतंत्र का सबसे पवित्र मंदिर ‘संसद’ जनता की समस्याओं, राष्ट्रीय नीतियों और भावी कानूनों पर तर्कसंगत बहस का केंद्र माना जाता है। मसलन संसद केवल कानून बनाने की मशीन नहीं है बल्कि यह देश की सामूहिक चेतना और आकांक्षाओं का दर्पण है लेकिन संसद के वर्तमान मानसून सत्र में जो दृश्य सामने आ रहा है, वह विधायी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। सत्र के पहले ही दिन से विपक्षी दलों द्वारा विभिन्न राष्ट्रीय व राजनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों सदनों में जोरदार हंगामा किया जा रहा है। सदन के भीतर नारेबाजी और वेल (सदन के बीचों-बीच) में आकर तख्तियां दिखाने से लेकर संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा से लेकर नए भवन के मकर द्वार पर प्रदर्शन करना विपक्ष की रोजाना की दिनचर्या देखी जा रही है। यह भारतीय लोकतंत्र और जनता के प्रति जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की दृष्टि से शुभ संकेत नहीं हैं।

संसद के मानसून सत्र में बीते दो हफ्ते की तरह तीसरे सप्ताह की कार्यवाही के दौरान भी जिस तरह हंगामे के बीच बिना बहस के विधेयक पारित हो रहे है, वह भारतीय लोकतंत्र में विधायी कार्य और जवाबदेही का गहराता संकट पैदा करता नजर आ रहा है। यह सत्र अपने अंतिम पड़ाव पर है तो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के पास अपनी जिम्मेदारी निभाने का आखिरी अवसर हैं। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक और आवश्यक है, लेकिन असहमति को प्रकट करने का जरिया ‘संसदीय संवाद’ होना चाहिए, ‘संसदीय गतिरोध’ नहीं। जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए यह अनिवार्य है कि दोनों पक्ष अपनी राजनीतिक रणनीतियों से ऊपर उठकर देश के विधायी और लोकतांत्रिक हितों को प्राथमिकता दें। शुरुआती दो हफ्तों में हंगामे और लगातार होते स्थगन के कारण दोनों सदनों में कोई ठोस कामकाज नहीं हो सका। यद्यपि सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि वह विपक्ष द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों पर नियम-नियमावली के तहत चर्चा कराने को तैयार है, वहीं विपक्ष का कहना है कि उनकी प्राथमिक मांगों पर तुरंत और बिना शर्त बहस कराई जाए। इस गतिरोध के बीच सबसे बड़ा नुकसान देश के उस विधायी ढांचे का हो रहा है, जिसकी जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों को सौंपी गई है।

विधायी कामकाज पर सत्ता पक्ष की जवाबी रणनीति
संसद में विपक्ष की ओर से जारी व्यवधान के बीच केंद्र सरकार ने भी विधायी कामकाज निपटाने के लिए एक आक्रामक और व्यावहारिक रणनीति अपनाई है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह हंगामे के कारण विधायी एजेंडे को रुकने नहीं देगी। नतीजतन, शोर-शराबे और तख्तियों की आड़ में ही कई अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयक बिना किसी विस्तृत चर्चा के दोनों सदनों से पारित कराए जा चुके हैं। पीठासीन अधिकारियों (लोक सभा अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति) द्वारा बार-बार सदस्यों से अपनी सीटों पर लौटने और बिलों पर चर्चा में भाग लेने की अपील की गई। इसके बावजूद, जब विपक्षी दल चर्चा में शामिल होने के बजाय वाकआउट (सदन का बहिष्कार) करने या नारेबाजी जारी रखने का विकल्प चुनते हैं, तो सरकार ध्वनिमत के जरिए विधेयकों को पारित करवा लेती है।  कई विधेयकों पर सदन के दोनों सदनों की मुहर लग चुकी है, जो राष्ट्रपति की मुहर के बाद देश में कानून बनने की दहलीज पर जा चुके हैं। संसदीय कार्यप्रणाली के दृष्टिकोण से यह स्थिति चिंताजनक है। जब कोई विधेयक बिना बहस के कानून का रूप लेता है, तो उसमें रह जाने वाली व्यावहारिक कमियों या खामियों पर विचार करने का अवसर समाप्त हो जाता है।

प्रश्नकाल और शून्यकाल: जनहित के मुद्दों की अनदेखी
संसदीय लोकतंत्र में ‘प्रश्नकाल’ और ‘शून्यकाल’ ऐसे दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं जिनके माध्यम से संसद सदस्य (चाहे वे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के) सीधे सरकार और उसके मंत्रियों की जवाबदेही तय करते हैं। प्रश्नकाल के दौरान सांसद अपने क्षेत्रों की समस्याओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, रक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े तारांकित और अतारांकित प्रश्न पूछते हैं। चालू मानसून सत्र में लगातार व्यवधान के कारण अधिकांश दिनों में प्रश्नकाल शुरू होते ही स्थगित करना पड़ा या शोर-शराबे में डूब गया। इससे मंत्रियों से सीधे तीखे सवाल पूछने का जनता का अधिकार अप्रत्यक्ष रूप से छीन गया। वहीं शून्यकाल वह समय होता है जब सांसद बिना किसी पूर्व सूचना के लोक महत्व के अविलंबनीय मुद्दों को उठाते हैं। सदन के लगातार बाधित रहने से न तो देश के ज्वलंत मुद्दों पर बात हो पा रही है और न ही दूर-दराज के क्षेत्रों के आम नागरिकों की आवाज दिल्ली तक पहुंच पा रही है।

रणनीतियों के द्वंद्व में फंसी लोकतंत्रिक प्रक्रियाएं
इस मानसून सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपनी-अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को साधने में लगे हैं, लेकिन इसका खामियाजा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को भुगतना पड़ रहा है। शायद विपक्ष की रणनीति मुख्य रूप से सरकार को राजनीतिक रूप से बैकफुट पर धकेलने की है। विपक्ष का तर्क है कि जब तक उनकी प्राथमिक मांगों ज्वलंत सामाजिक, आर्थिक या जांच से जुड़े मुद्दों पर पहले चर्चा नहीं होती, तब तक सामान्य कामकाज नहीं चलने दिया जाएगा। हालांकि, इस रणनीति के कारण विपक्ष उस मंच को खुद ही खो देता है जहाँ वह सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ा सकता था। सदन से वाकआउट करने का सीधा अर्थ है, सरकार को बिना किसी विरोध के बिल पास कराने का ‘वॉकओवर’ दे देना। वहीं दूसरी ओर, सरकार की रणनीति यह दिखाने की है कि वह देश के विकास और विधायी कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध है। सरकार का तर्क है कि वह हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है लेकिन विपक्ष चर्चा से दूर भाग रहा है। विपक्ष के बहिष्कार का लाभ उठाते हुए सरकार अपने प्रमुख और दूरगामी असर वाले कानूनों को तेजी से पारित करवा रही है। हालांकि, बिना बहस के बिल पास कराने से भले ही सरकार का लक्ष्य पूरा हो जाए, लेकिन उन कानूनों की नैतिक स्वीकार्यता पर सवाल खड़े होते हैं।

जनता के प्रति जवाबदेही और विपक्ष का दायित्व
संसदीय व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका केवल विरोध करने की नहीं, बल्कि एक ‘सकारात्मक आलोचक’ की होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में इसलिए चुनकर भेजती है ताकि वे उनकी समस्याओं को उठाएं और बनने वाले कानूनों पर गहराई से मंथन करें। जब विपक्षी सांसद चर्चा का बहिष्कार करते हैं, तो वे विधेयकों में जनहित से जुड़े संशोधन पेश करने के अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते। संसद को चलाने में देश के करदाताओं का करोड़ों रुपया प्रति घंटे खर्च होता है। सत्र का हंगामे में धुल जाना वित्तीय और समय दोनों की भारी बर्बादी है। तख्तियां लहराना, कागज फाड़कर फेंकना और पीठासीन अधिकारी के सामने नारेबाजी करना संसदीय गरिमा को ठेस पहुंचाता है। ऐसे में विपक्ष को यह समझना होगा कि सरकार को घेरने का सबसे सशक्त माध्यम ‘सदन का स्थगन’ नहीं, बल्कि ‘सदन के भीतर अकाट्य तर्कों के साथ बहस’ करना है।

क्या हो सकती है आगे की राह?
अब जब मानसून सत्र के केवल तीन दिन शेष बचे हैं, तब यह सवाल सबसे बड़ा है कि क्या बाकी बचे समय का उपयोग देशहित में किया जा सकता है? सत्र के अंत की ओर बढ़ते हुए आगे की राह को असान बनाने के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष के सामने मौका है। दोनों पक्षों को अपने अड़ियल रुख से पीछे हटना होगा। सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष की मुख्य मांगों पर किसी बीच के रास्ते या विशेष नियम के तहत चर्चा कराने का औपचारिक आश्वासन दे। वहीं विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि सदन को ठप रखने से किसी समस्या का समाधान नहीं निकलता। सत्र के अंतिम दिनों में जो भी महत्वपूर्ण विधेयक पटल पर रखे जाने हैं, उन पर कम से कम संक्षिप्त बहस अवश्य कराई जाए। विपक्ष को वाकआउट करने के बजाय सदन में रहकर अपने संशोधन दर्ज कराने चाहिए और सरकार को भी विपक्ष के जायज सुझावों को शामिल करने का बड़प्पन दिखाना चाहिए।