ज्ञान चंद पाटनी
देश में जिस तेजी से सड़कें, पुल, फ्लाईओवर और दूसरे सार्वजनिक ढांचे खड़े किए जा रहे हैं, उससे विकास की चमकीली तस्वीर नजर आती है। इस तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। ताश के पत्तों की तरह पुल और फ्लाईओवर ढह रहे हैं। हाईवे और एक्सप्रेस—वे की नवनिर्मित सड़कें उधड़ रही हैं, यानी निर्माण तो खूब हो रहा है पर इसके टिकाऊ और सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है। हाल के वर्षों में बार-बार होने वाले हादसे यही बताते हैं कि निर्माण की गुणवत्ता, रखरखाव और निगरानी पर खास ध्यान नहीं दिया जाता। कई सड़क परियोजनाएं उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद टूटने, धंसने, दरकने के कारण जानलेवा बन जाती हैं। ऐसे में विकास का उत्सव कई बार मातम में बदल जाता है। लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे इसका ताजा उदाहरण है। उद्घाटन के महज 18 दिन में ही 63 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेस-वे कई जगह पर खराब हो गया,जिससे आवागमन प्रभावित हुआ। यह उत्तरप्रदेश का सबसे महंगा एक्सप्रेस-वे है। यानी भारी राशि खर्च करने के बावजूद गुणवत्ता की अनदेखी की गई। केंद्र सरकार ने संसद में खुद स्वीकार किया है कि पिछले पांच वर्षों और चालू वर्ष के दौरान देश के बीस राज्यों में फैली 48 परियोजनाओं में पुलों, ओवरब्रिज और सड़कों के धंसने और स्ट्रक्चरल फेलियर के कई मामले सामने आए। इससे समस्या की गंभीरता का पता चलता है।
इन घटनाओं को केवल हादसा कहकर टाल देना सही नहीं होगा। यह पूरे तंत्र की विफलता है। डिजाइन, सामग्री, निर्माण, जांच रखरखाव जैसे मोर्चों पर हद दर्ज की लापरवाही बरती जा रही है। निर्माण कार्य की गुणवत्ता कागज पर तो शानदार दिखाई देती है, लेकिन जमीनी हालात अलग होते हैं। जाहिर है समस्या बहुत गहरी है। इसका एक बड़ा कारण खराब गुणवत्ता वाली सामग्री और कमजोर इंजीनियरिंग है। कई बार काम शुरू से ही कम लागत में निपटाने की मानसिकता से किया जाता है। टेंडर हासिल करने के लिए ठेकेदार कम दर बताते हैं और गुणवत्ता से समझौता करते हैं। उस समझौते की कीमत जनता को चुकानी पड़ती है। सीमेंट और दूसरी निर्माण सामग्री की मात्रा घटाई जाती है, स्टील की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता, जल-निकासी की योजना अधूरी रह जाती है और डिजाइन में भी बुनियादी खामियां रह जाती हैं। सड़क बन जाती है लेकिन पानी निकासी की व्यवस्था नहीं होती। पुल खड़ा हो जाता है, लेकिन उसके भार, मिट्टी, जल निकासी और लंबे उपयोग से जुड़े सवालों पर ध्यान नहीं दिया जाता, यानी निर्माण कार्य पूरा हो जाता है लेकिन उसकी बुनियाद कमजोर रह जाती है। यही वजह है कि ऐसे निर्माण कुछ ही समय में संकट के कारण बन जाते हैं।
रखरखाव की अनदेखी इस समस्या को और खतरनाक बना देती है। भारत में अक्सर निर्माण को एक बार का काम माना जाता है मानो सड़क बन गई या पुल बन गया, तो जिम्मेदारी खत्म हो गई जबकि असलियत यह है कि हर संरचना को लगातार देखभाल चाहिए। समय-समय पर निरीक्षण, मरम्मत, जल-निकासी की जांच, दीवारों और छतों की समीक्षा, जोड़ों की मजबूती, जमीन की स्थिति और उपयोग के दबाव का आकलन—ये सब लगातार चलते रहने वाली प्रक्रियाएं हैं। दुर्भाग्य से हमारे यहां रखरखाव को प्राथमिकता नहीं दी जाती। इसी वजह से छोटी-छोटी कमियां समय के साथ बड़े हादसों में बदल जाती हैं। जिस दरार को मामूली समझकर टाल दिया जाता है, कुछ समय बाद वही जानलेवा हादसे का कारण बन जाती है।
हादसों के बाद हमारी प्रतिक्रिया भी एक तयशुदा ढर्रे में बंधी हुई दिखती है। जांच आयोग बनता है, कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई होती है, ठेकेदार पर केस दर्ज किया जाता है, मुआवजे की घोषणा होती है और कुछ दिनों तक चर्चा चलती है। इसके बाद सब फिर सामान्य हो जाता है। असली सुधार वहीं से शुरू होना चाहिए था जहां से हादसा हुआ था। यानी निर्माण प्रक्रिया, अनुमोदन प्रणाली, निरीक्षण तंत्र और जवाबदेही की पूरी चेन पर ध्यान दिया जाए। यदि कोई सड़क समय से पहले खराब हो जाती है, तो केवल गड्ढा भर देना समाधान नहीं है। यदि कोई पुल बार-बार क्षतिग्रस्त होता है, तो केवल मरम्मत कर देना काफी नहीं है। जरूरत है आमूलचूल सुधार की।
दरअसल, भारत में सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं की गुणवत्ता पर ध्यान देने की बजाय उद्घाटन समारोहों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, ताकि राजनीतिक लाभ लिया जा सके। इसके लिए निर्माण में जल्दबाजी भी की जाती है। अपने नाम की पट्टिका लगाने के लिए निर्माण शीघ्र पूरा करने का दबाव बनाया जाता है। इस कारण सड़कें और दूसरे निर्माण बनाने में लापरवाही बरती जाती है। यदि निर्माण में ईमानदारी, पारदर्शिता और वैज्ञानिक दृष्टि हो, तो वही ढांचा दशकों तक चल सकता है। दुनिया के कई देशों में खराब मौसम, भारी बर्फबारी, तूफान और भूकंप के बावजूद इंफ्रास्ट्रक्चर टिकता है। इसकी वजह यह है कि वहां निर्माण कार्य को गंभीरता से लिया जाता है। भारत में भी पुरानी और अच्छी तरह बनी संरचनाएं आज तक काम कर रही हैं। इसका अर्थ यही है कि टिकाऊ निर्माण संभव है। यानी प्रश्न क्षमता का नहीं, इच्छा और व्यवस्था का है।
देश के वास्तविक विकास के लिए निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर खास ध्यान देने की जरूरत है। वाहवाही बटोरने के लिए ही निर्माण नहीं होने चाहिए, वे टिकाऊ भी होने चाहिए। हमें ऐसी हाईवे और सड़कें चाहिए जो बरसात में न बहें, ऐसे पुल चाहिए जो उद्घाटन के बाद भी दशकों तक सुरक्षित रहें। विकास का असली अर्थ यही है कि जो बनाया जाए, वह टिके भी और जिनके लिए निर्माण हो, उनकी जिंदगी सुरक्षित भी रहे। आज जरूरत सिर्फ और अधिक निर्माण की नहीं, बल्कि बेहतर निर्माण संस्कृति की है। इसके लिए ठेकेदारी व्यवस्था में गुणवत्ता को बोली से ऊपर रखना आवश्यक है। दोषी एजेंसियों के संचालकों को सिर्फ चेतावनी देना ही काफी नहीं है. उनको कठोर सजा भी मिलनी चाहिए। जब तक हम गुणवत्ता, रखरखाव और जवाबदेही को केंद्र में नहीं रखेंगे, तब तक नई परियोजनाओं के निर्माण पर पैदा होने वाले उत्साह पर पानी फिरता रहेगा।