डॉ. घनश्याम बादल
31 अक्टूबर भारतीय इतिहास की दो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक विरासतों को याद करने का दिन है। सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती और श्रीमती इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि। एक ने बिखरी रियासतों को जोड़कर भारत की एकता का आधार मजबूत किया, तो दूसरी ने अपने फैसलों से देश की सामरिक शक्ति और राजनीतिक दिशा पर गहरी छाप छोड़ी। दोनों दृढ़ इच्छाशक्ति और निर्णायक नेतृत्व की प्रतीक थीं, एक को ‘लौह पुरुष’ तो दूसरी को ‘लौह महिला’ का खिताब देश की जनता ने दिया । दोनों अलग-अलग व्यक्तित्व के स्वामी थे, दोनों की पृष्ठभूमि बिल्कुल अलग-अलग थी और दोनों ही भारत के बड़े नेताओं में शुमार रहे लेकिन उनकी राजनीतिक दृष्टि और कार्यशैली में बुनियादी अंतर भी था और कुछ मुद्दों पर साम्य भी। दोनों की पृष्ठभूमि कांग्रेस की रही लेकिन आज सरदार पटेल की राजनीतिक विरासत पर भारतीय जनता पार्टी अपना हक जमाती दिख रही है दोनों ही व्यक्तित्व अपने आप में बेजोड़ और अतुलनीय रहे हैं इसलिए इनका मूल्यांकन श्रद्धा या विरोध से नहीं, इतिहास की कसौटी पर होना चाहिए।
पटेल : राष्ट्र को जोड़ने का संकल्प
आजादी के समय भारत के सामने विभाजन, सांप्रदायिक हिंसा और सैकड़ों देशी रियासतों के भविष्य का प्रश्न था। यदि इन रियासतों का समय रहते विलय नहीं होता, तो भारत की एकता गंभीर संकट में पड़ सकती थी। तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार पटेल ने वी. पी. मेनन के सहयोग से संवाद, कूटनीति और आवश्यकतानुसार कठोर निर्णयों के जरिए इस चुनौती का सामना किया। हैदराबाद में पुलिस कार्रवाई और जूनागढ़ के जटिल घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर वे अनिर्णय के पक्षधर नहीं थे।
पटेल को भारत का बिस्मार्क कहा जाना उनके इसी ऐतिहासिक योगदान का स्वीकार है। जर्मनी के एकीकरण के शिल्पकार बिस्मार्क की तरह पटेल ने भी राजनीतिक बिखराव को समाप्त करने में कूटनीति, संवाद और शक्ति तथा सख्ती का सहारा लिया। हालांकि दोनों की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन राष्ट्रीय एकीकरण के प्रति व्यावहारिक दृष्टि में समानता थी।
पटेल ने अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं को बनाए रखने की वकालत कर नए नए स्वतंत्र हुए भारत की प्रशासनिक रीढ़ मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। नेहरू से उनके नीतिगत मतभेद थे, फिर भी राष्ट्रीय दायित्वों के निर्वहन में सहयोग की आवश्यकता को उन्होंने न केवल समझा अपितु देश को मजबूत करने के लिए नेहरू का कंधे से कंधा मिलाकर साथ भी दिया । आज जब राजनीतिक असहमति को दुश्मनी में बदलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, पटेल याद दिलाते हैं कि राष्ट्रहित दलहित से बड़ा होना चाहिए।
इंदिरा : शक्ति और सत्ता का केंद्रीकरण
इंदिरा गांधी की राजनीतिक पहचान संकटों में निर्णायक नेतृत्व और भारत की सामरिक क्षमता के प्रदर्शन से बनी। 1971 के युद्ध में भारत की सफलता और बांग्लादेश का निर्माण उनकी बड़ी उपलब्धियां थीं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति और गरीबी हटाओ का नारा सामाजिक-आर्थिक बदलाव की राजनीति के प्रमुख पड़ाव बने। हरित क्रांति से खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने और 1974 के परमाणु परीक्षण से भारत की वैज्ञानिक-सामरिक क्षमता प्रदर्शित करने में भी उनके शासनकाल की भूमिका रही
लेकिन उपलब्धियां किसी नेता को आलोचना से ऊपर नहीं उठा देतीं। 1975 में आपातकाल लागू करना इंदिरा गांधी की सबसे गंभीर राजनीतिक भूल थी। नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित हुईं, विपक्षी नेता जेलों में डाले गए और प्रेस पर सेंसरशिप लगी। जिस लोकतंत्र ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया, उसी की आवाज दबाने का प्रयास उनकी विरासत पर गहरा दाग बन गया। 1977 में मतदाताओं ने उन्हें सत्ता से बाहर कर स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला शासक का नहीं, जनता का होता है और समय की इस सिख को इंदिरा ने तहे दिल से स्वीकार करते हुए अपनी राजनीतिक दृष्टि एवं शैली दोनों बदले जिसका परिणाम यह हुआ कि केवल ढाई वर्षो में ही 1980 के चुनाव में भी फिर से सत्ता में लौट कर आई, बिल्कुल बदली हुई और एक कहीं अधिक दृढ़ व परिपक्व राजनेता के रूप में।
31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या देश के लिए दुखद घटना थी। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद तनावपूर्ण माहौल में हुई इस हत्या के पश्चात भड़के सिख-विरोधी दंगों में निर्दोष लोगों की हत्याएं भारतीय लोकतंत्र पर कलंक बनीं। हत्या की निंदा और उसके बाद हुई हिंसा के लिए जवाबदेही की मांग—दोनों एक साथ आवश्यक हैं। किसी नेता के प्रति संवेदना का अर्थ इतिहास के कठिन प्रश्नों से मुंह मोड़ना नहीं है।
दो नेतृत्व, दो सबक
पटेल और इंदिरा गांधी में साहस, दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय शक्ति के प्रति प्रतिबद्धता समान थी। लेकिन पटेल की ऐतिहासिक पहचान मुख्यतः राजनीतिक एकीकरण और प्रशासनिक स्थिरता से बनी, जबकि इंदिरा गांधी की विरासत में सामरिक उपलब्धियों के साथ सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का विवाद भी जुड़ा है।
पटेल ने राष्ट्र को जोड़ने के लिए शक्ति का उपयोग किया; इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय शक्ति का प्रदर्शन किया, लेकिन आपातकाल में सत्ता की सीमाएं लांघ दीं। यही अंतर निर्णायक है। मजबूत नेतृत्व और निरंकुश नेतृत्व एक नहीं होते। राष्ट्र को दृढ़ निर्णय लेने वाला शासक चाहिए, लेकिन जो स्वयं को संविधान, संसद और नागरिक अधिकारों से ऊपर समझने लगे उसे नेता को जनता सबक भी सिखा देती है।
दोनों नेताओं का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं होना चाहिए। पटेल किसी एक दल की बपौती नहीं हैं और इंदिरा गांधी का मूल्यांकन केवल उनके राजनीतिक परिवार या विरोधियों के चश्मे से नहीं किया जा सकता। इतिहास न किसी को निष्कलंक देवता बनाता है, न उसकी सारी उपलब्धियां मिटा देता है।
आज भारत को पटेल की एकीकरणकारी दृष्टि, प्रशासनिक दृढ़ता और राष्ट्रीय हित के प्रति प्रतिबद्धता की जरूरत है। इंदिरा गांधी के नेतृत्व से सामरिक आत्मविश्वास और निर्णायक क्षमता की प्रेरणा ली जा सकती है, लेकिन आपातकाल से सत्ता के अहंकार के खतरे को भी समझना होगा और विरोध के स्वर को दबाने या विरोधियों को बांटने की कुटिल नीति की बजाय राष्ट्र की स्थिरता, सामाजिक समरसता एवं सांप्रदायिक एकता को दृढ़ करना होगा।
भारत की एकता केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि संविधान, सामाजिक सद्भाव और नागरिकों के आपसी विश्वास से मजबूत होती है। इसी तरह राष्ट्र की शक्ति केवल शक्तिशाली नेतृत्व में नहीं, बल्कि स्वतंत्र संस्थाओं और निर्भय नागरिकों में भी निहित है।
पटेल ने भारत को जोड़ने की ऐतिहासिक चुनौती का समाधान दिया; इंदिरा गांधी ने उसकी शक्ति का प्रदर्शन किया। एक की विरासत राष्ट्र की एकता है, दूसरी की विरासत उपलब्धियों और गंभीर लोकतांत्रिक चेतावनियों का मिश्रण। 31 अक्टूबर का सच्चा संदेश यही है कि राष्ट्रहित में दृढ़ता जरूरी है, लेकिन लोकतंत्र की कीमत पर नहीं।