डॉ घनश्याम बादल
कुछ लोग समय की धारा के साथ बहते हैं और कुछ उसकी दिशा बदल देते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल दूसरी श्रेणी के नेता थे। भारत आज़ादी के बाद एक बड़ी चुनौती जिस चुनौती से रूबरू हुआ वह थी एक बिखरे हुए सामंतवादी देश को एक राष्ट्र बनाना, जो सैकड़ों रियासतों और परस्पर विरोधी आकांक्षाओं में बंटा हुआ था। अंग्रेज अपने पीछे ऐसा राजनीतिक बारूद छोड़ गए थे, जिसकी चिंगारी देश को टुकड़ों में बांट सकती थी। इस बारूद को निष्क्रिय करने का कठिन काम पटेल ने किया। उनकी जयंती केवल उन्हें याद करने का दिन नहीं, बल्कि यह जांचने का भी दिन है कि हम उनके बनाए भारत को कितना समझ पाए हैं।
31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में जन्मे वल्लभभाई पटेल महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। खेड़ा के किसान आंदोलन और 1928 के बारडोली सत्याग्रह ने उनके नेतृत्व की असली ताकत दिखाई। कर न चुका पाने वाले किसानों के साथ खड़े होकर उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। बारडोली के संघर्ष ने उन्हें ‘सरदार’ बनाया।
पटेल का व्यक्तित्व गांधीजी की नैतिक शक्ति से प्रभावित तो था, लेकिन उनकी कार्यशैली में व्यावहारिकता और कठोर निर्णय क्षमता का विशेष स्थान था। वे जानते थे कि राजनीति में संगठन, अनुशासन, समय पर निर्णय और परिणाम हासिल करने की क्षमता चाहिए। वे उन नेताओं में थे जो आंदोलन की आग में भी तपे थे और प्रशासन की कठिन जमीन पर उतरना भी जानते थे।
भारत के बिस्मार्क
जर्मनी के एकीकरण में निर्णायक भूमिका निभाने वाले प्रशियाई राजनेता ऑटो फॉन बिस्मार्क को इतिहास में ‘जर्मन एकीकरण का शिल्पकार’ कहा जाता है। उन्होंने अनेक स्वतंत्र जर्मन राज्यों को एक राजनीतिक राष्ट्र के रूप में संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरदार पटेल ने भी स्वतंत्रता के समय बिखरी हुई भारतीय रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराने का असाधारण कार्य किया। इसी ऐतिहासिक समानता के कारण पटेल को ‘भारत का बिस्मार्क’ कहा जाता है। यह तुलना केवल दो नेताओं की दृढ़ता तक सीमित नहीं है। दोनों के सामने बिखरे राजनीतिक भूगोल को एक केंद्रीय सत्ता के अधीन संगठित करने की चुनौती थी। दोनों ने कूटनीति, राजनीतिक दबाव और परिस्थितियों के अनुरूप कठोर कदमों का सहारा लिया। अंतर यह था कि बिस्मार्क ने जर्मनी का एकीकरण प्रशिया के नेतृत्व में युद्धों और शक्ति-राजनीति के माध्यम से आगे बढ़ाया, जबकि पटेल को विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक तनाव, ब्रिटिश सत्ता की वापसी और सैकड़ों रियासतों की जटिलताओं के बीच लोकतांत्रिक भारत का निर्माण करना था। इसलिए यह उपाधि पटेल की ऐतिहासिक भूमिका को समझने का उपयोगी माध्यम है,
1947 में देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री बने पटेल के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था— बिखरी हुई 562 रियासतों का भारत में विलय करना।पटेल ने वी. पी. मेनन के साथ मिलकर इस चुनौती का सामना किया। अधिकांश रियासतों को बातचीत और विलय-पत्रों के माध्यम से भारत में शामिल कराया गया। जूनागढ़ में राजनीतिक दबाव और बाद में जनमत-संग्रह कराया वहीं हैदराबाद के निजाम के साथ बातचीत विफल होने पर सितंबर 1948 में सैन्य कार्रवाई की, जिसे उस समय ‘पुलिस कार्रवाई’ कहा गया। जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय भी इसी दौर का महत्वपूर्ण घटनाक्रम था, इस ऐतिहासिक अभियान ने भारत को ऐसे संभावित विखंडन से बचाने में निर्णायक योगदान दिया । पटेल की विशिष्टता इस बात में थी कि उन्होंने इस जटिल प्रक्रिया में समय गंवाने के बजाय निर्णय लिए और राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर असाधारण दृढ़ता दिखाई।
उनकी उपलब्धियां रियासतों के विलय तक सीमित नहीं थीं। विभाजन के बाद शरणार्थियों का पुनर्वास, सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण और आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां भी सामने थीं। भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा जैसी अखिल भारतीय सेवाओं को बनाए रखने की उनकी वकालत का उद्देश्य एक ऐसा प्रशासनिक ढांचा तैयार करना था, जो राज्यों की सीमाओं से परे राष्ट्रीय एकता और शासन की निरंतरता को मजबूती दे। उन्हें मालूम था कि नक्शे पर सीमाएं जोड़ देना पर्याप्त नहीं; देश को चलाने वाली संस्थाएं भी मजबूत होनी चाहिए।
पटेल को याद करने का मतलब
आज सरदार पटेल की तस्वीर लगभग हर राजनीतिक मंच पर दिखाई दे सकती है। उनकी विशाल प्रतिमा देश के गौरव का प्रतीक है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उनके विचार भी हमारे सार्वजनिक जीवन में उतनी ही ऊंचाई प्राप्त कर पाए हैं? महापुरुषों को अपने पक्ष में खड़ा दिखाना राजनीति का आसान तरीका है; उनके सिद्धांतों के अनुसार अपने आचरण को बदलना कठिन काम है। पटेल की राष्ट्रीय एकता की कल्पना को केवल शक्तिशाली केंद्र या कठोर प्रशासन तक सीमित नहीं किया जा सकता। एकता का अर्थ यह भी है कि भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्र के आधार पर नागरिकों के बीच स्थायी दीवारें खड़ी न हों। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता हैं, लेकिन जब विरोधी को देश का शत्रु और असहमति को अपराध मानने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तब राष्ट्र की सामाजिक नींव कमजोर होती है। पटेल की विरासत का सम्मान करने वालों को यह समझना होगा कि देश को जोड़ने का काम केवल सीमाओं पर नहीं, समाज के भीतर भी करना पड़ता है।
उनकी प्रशासनिक दृष्टि आज भी प्रासंगिक है। शासन में अनुशासन हो, संस्थाएं सक्षम हों, निर्णय समय पर लिए जाएं और अधिकारी राजनीतिक दबाव के बजाय कानून तथा जनहित के प्रति जवाबदेह रहें, ये वे कसौटियां हैं जिन पर आधुनिक भारत को भी खरा उतरना चाहिए। दृढ़ता का अर्थ मनमानी नहीं और राष्ट्रीय एकता का अर्थ विचारों की एकरूपता नहीं है।
सरदार पटेल ने अपने समय में राजनीतिक बिखराव के सामने खड़े होकर भारत की एकता को आकार दिया था। आज चुनौती उस एकता को भीतर से मजबूत करने की है। आज राजनीतिक नेतृत्व को समझना होगा कि उसका भविष्य जनता के विश्वास, लोकतांत्रिक मर्यादा और सामाजिक सद्भाव से जुड़ा है।
पटेल की जयंती पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम अखंड भारत को केवल राजनीतिक नक्शे पर अखंड रखना चाहते हैं, या उसके नागरिकों के मन में भी एकता बचाए रखना चाहते हैं? सरदार पटेल को सच्ची श्रद्धांजलि इसी प्रश्न का ईमानदार उत्तर देने में है।
डॉ घनश्याम बादल