चीनी सामान का कीजिए बहिष्कार

buycott-chinese-productलोकेन्द्र सिंह

 

भारत की देशभक्त जनता ने चीनी सामान के बहिष्कार का अभियान चला रखा है। यह उचित ही है। इस अभियान का भरपूर समर्थन किया जाना चाहिए। भारत के सामने लगातार चीन बाधाएं खड़ी कर रहा है। हालांकि प्रत्येक भारतीय के लिए सबसे असहनीय बात यह है कि चीन लगातार पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है। आतंकवाद पर भी चीन का व्यवहार ठीक नहीं है। उड़ी हमले के बाद जिस तरह से चीन ने पाकिस्तान का बचाव करने का प्रयास किया है, उससे भारत की देशभक्त जनता में चीन के प्रति काफी आक्रोश है। चीन को सबक सिखाने के लिए भारतीय नागरिकों ने सोशल मीडिया पर चीनी सामान के बहिष्कार की मुहिम चलाई है। यह मुहिम अपना रंग दिखा रही है। तकरीबन एक ही महीने में भारत में चीनी सामान की बिक्री इतनी कम हो गई है कि उससे चीन बुरी तरह बौखला गया है। बौखलाहट में चीनी मीडिया ने भारत और उसके नागरिकों के खिलाफ बहुत हल्की भाषा में कटाक्ष किया है। चीनी सामान के बहिष्कार की मुहिम के संबंध में लिखते हुए चीनी मीडिया ने लिखा है कि भारत भौंक तो सकता है, लेकिन कुछ कर नहीं सकता। चीन के सामान और तकनीक के सामने भारत का सामान और तकनीक टिक नहीं सकता है। लेकिन, चीन को इस बात का आभास नहीं है भारत के नागरिक यदि तय कर लेते हैं तो सब बातें एक तरफ और भारतीयों का निर्णय एक तरफ। चीन को यह भी नहीं पता होगा कि भारत में उसके सामान के प्रति आम नागरिकों की भावना किस प्रकार की है। चीनी माल को दोयम दर्जे का समझा जाता है। उसकी गुणवत्ता को संदेह से देखा जाता है। चीनी सामान भारत में इसलिए बिकता है, क्योंकि वह सस्ता है। उसकी बिक्री गुणवत्ता के कारण नहीं है।

भारत में कुछ ऐसे भी लोग मौजूद हैं, जो चीनी सामान के बहिष्कार के राष्ट्रीय अभियान का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे भारत के उन छोटे व्यापारियों का भारी नुकसान होगा, जिन्होंने त्यौहार के समय में काफी पैसा निवेश कर बिक्री के लिए चीनी सामान अपनी दुकानों में भर लिया है। छोटे व्यापारियों की दीपावली बिगड़ जाएगी। दरअसल, ऐसा सोचने वाले बहुत ही संकीर्ण मानसिकता के लोग हैं। यदि इस सोच का बस चलता तब स्वतंत्रता आंदोलन के तहत अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए कभी भी विदेशी सामान की होली नहीं जलाई जा सकती थी। भारत के हित में विचार करने वाले सदैव विदेशी सामान के बहिष्कार और स्वदेशी सामान की उपयोग पर जोर देते रहे हैं। विदेशी सामान के बहिष्कार का आग्रह देश की आजादी के पहले से रहा है। दूसरी बड़ी बात यह है कि चीनी सामान के बहिष्कार से भले ही अभी छोटे व्यापारियों को घाटा हो जाए, लेकिन अंत में इस मुहिम की सफलता उनके ही हित में है। छोटे व्यापारियों, कामगारों और कुटीर उद्योगों को सबसे अधिक नुकसान चीनी सामान ने ही पहुँचाया है। इसलिए जो चीनी सामान के बहिष्कार की मुहिम का विरोध कर रहे हैं, असल में वह लोग भारत के कामगारों और कुटीर उद्योगों पर चोट कर रहे हैं।

भारतीय बाजार जब से चीनी सामान से पट गए, तब से भारत में कुम्हार के चाक की गति मंद ही नहीं हुई, बल्कि बहुत हद तक उनका चाक बंद हो गया है। लकड़ी, मिट्टी और चीनी के खिलौना बनाने वाले लोगों का धंधा बंद हो गया। चीनी पटाखों ने कई भारतीय पटाखा कारखानों के शटर गिरा दिए। दीपावली पर सस्ती चीनी लाइट आने से भारतीय इलेक्ट्रीशियनों का काम ठप हो गया। रक्षाबंधन पर भारतीय राखी कारोबार पर गहरी चोट पहुँची है। हालात यहाँ तक हैं कि पूजन सामग्री तक चीन से बनकर आ रही है। इसलिए चीनी सामान का बहिष्कार उचित है। भारत विरोधी मानसिकता वाले लोगों की भावनात्मक अपीलों में न फंसकर हमें यथासंभव चीनी सामान का बहिष्कार करना चाहिए, ताकि हमारे कामगारों, बुनकरों, शिल्पकारों और कुटीर उद्योगों को नई ताकत मिल सके। स्वाभाविक तौर पर चीनी सामान का बहिष्कार करने वाले लोग आज बाजार में भारतीय सामान की माँग कर रहे हैं। यानी जब भारतीय सामान की माँग बढ़ेगी, तब हमारे कुटीर उद्योग मजबूत होंगे। इसलिए चीनी सामान के बहिष्कार के अभियान के दो बड़े फायदे हैं। एक, चीन को सबक मिलेगा। दो, भारत के कुटीर उद्योग को ताकत मिलेगी। छोटे कारोबार से जुड़े लोगों की स्थिति सुदृढ़ होगी। भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। भारत में रोजगार बढ़ेगा। इसलिए आईए, ‘चीनी सामान का बहिष्कार’ अभियान’ का हिस्सा बनते हैं।

14 thoughts on “चीनी सामान का कीजिए बहिष्कार

  1. कुतर्की जो ज्ञान बाँट रहे हैं कि चाइना कमा गया उसे क्या फर्क पड़ रहा है वो जरा चाइना डेली के पिछले एक महीने के लेख पढ़ लें। अगर उसे फर्क नहीं पड़ रहा है रोज धमकी भरे अंदाज में आर्टिकल क्यों निकल रहे हैं ? दरअसल चीन से ज्यादा मरोड़ यहाँ के सफेदपोश सूदखोर वामियों को हो रही है। जो खाते यहाँ का हैं और गर्दभ गीत गाते चीन का हैं। भले ही अभी विरोध कम स्तर का था, लेकिन भविष्य की नींव यही रख दी गई है और भारत के जन का विरोध अब अंतरराष्ट्रीय स्तर सुना गया और अब देखिएगा भारत के देखा देखी अन्य राष्ट्र भी चीन के कूड़ा करकट सामानों की लंका जलाएंगे। इनका सस्ते का किला अब दरक जाएगा।

  2. कुतर्क चाहिए तो नए अधोगामी नकटे वाममार्गियों से बहस कर लीजिये, अपने अधकचरे ज्ञान को यहाँ वहां नगरपालिका के कूड़े के ट्रक की तरह बिखेरते मिलेंगे। गुजरात सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट L & T को दिया, अब L & T किसे दे रही है उससे गुजरात सरकार को क्या मतलब ? अगर गुजरात सरकार चाइना को कॉन्ट्रैक्ट देती तब बात होती। जो लोग इसकी तुलना स्वदेशी आंदोलन से नहीं करते हैं मुझे उनके सतही ज्ञान और तुच्छ बुद्धि पर तरस आता है। बल्कि ये आंदोलन उससे भी ऊंचा है जो बिना किसी नेतृत्व के सफल हो रहा है। वो आंदोलन भी स्वस्फूर्त था और ये भी स्वस्फूर्त है कुछ चमन चिलांडुओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश देशवासी राष्ट्रप्रेम की एक मिसाल बन गए हैं।

  3. जो लोग आज के चीनी सामान के बहिष्कार की तुलना गाँधी जी के स्वदेशी आंदोलन से करते हैं,उनकी बुद्धि पर मुझे तरस आता है, क्योंकि वे लोग भूल जाते हैं कि यहां की सरकार उसी देश की थी,अतः उसको तो रोक नहीं सकते थे,तो जो संभव था,वही कर रहे थे.क्या आज की परिस्थितियां वही है? रही बात चीनी सामन के बहिष्कार की, तो आपलोगों में से कितने ऐसे लोग हैं,जो सरदार पटेल की चीन में बनी हुई मूर्ति को लगने से रोकेंगे या चीन से आयात जिओ सिम नहींखरीदेंगे? अभी ही गुजरात सरकार ने बहुत बड़ा कॉन्ट्रैक्ट चीन के साथ साइन किया है ,उसको क्यों नहीं रोक रहे हैं?चीन को जो मेट्रो लाइन का भी ठीका मिला है,उसको क्यों नहीं रोकते? इस सोडा वाटरी जोश से चीन का क्या नुकशान होगा? वह तो सामान बेच कर अपना मुनाफा कमा चुका है.

    1. द्रुत गति की ट्रेन बनाने की तकनीकी आपके पास नही है तो निश्चित रूप से विदेश में जहां सस्ती और अच्छी टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, उससे लेना होगा, चाहे वह चीन ही क्यों न हो. आप सोच से अतिवादी है. अतिवादी बात करते है. मैं मध्यम मार्गी हूँ. जहां तक सम्भव है विदेशी ब्रांड नही खरीदता. मध्यम मार्ग को अपनाइए, एक दिन आप नम्बर वन बनेंगे, निश्चित.

  4. मान लीजिए मुझे मोबाइल लेना हो, जिस प्रकार का लेना है उसमें दो विकल्प है, चाइनीज या iphone7. मुझे कौन सा लेना चाहिए ? मैं चाइनीज को अपेक्षाकृत बेहतर मानूंगा.

    1. भारतीय को क्यों नहीं चुन सकते हैं। भारत की कुछ कम्पनियां भी तो बनाती हैं और मार्किट पर अच्छी पकड़ भी है। नेट उनकी जानकारी ले सकते हैं , इंटेक्स, माइक्रोमैक्स, लावा है और भी हैं भ्राता श्री।

      ​सादर,

      1. जब भारत सरकार मोबाइल इंफ्रास्य्रक्चर को बढ़ा रही थी, तब सेल फोन बनाने के लिए इंकुबेटर्स क्यों नही खड़े किए. हमने मोबाइल फोन बनाने विलम्ब से शुरू किए इसलिए हम तकनीकी में उनसे पीछे है. जिन भारतीय कम्पनियों का आप जिक्र कर रहे है वह हो सकता है सेमी नाकड डाऊन ला कर ठप्पा लगा रही है. स्वदेशी उद्योग को आगे बढाने के लिए उसे कुछ संरक्षण की आवश्यकता है, सहयोग की आवश्यकता है. मैं जहां तक सम्भव हो भारतीय कम्पनी के प्रोडक्ट्स खरीदता हूँ.

        1. किस सरकार की बात कर रहे हैं आप ? आज के पहले सरकारें नहीं सत्ता के दलाल बैठे थे जो हर चीज के लिए विदेश का मुँह देखा करते थे। अब आज से पांच साल बाद का नजारा देख लीजियेगा।

  5. हम साबुन, तेल, टूथ पेष्ट और ब्रश तो कोलगेट का प्रयोग करे और बातें स्वदेशी की करे तो लक्ष्य हासिल नही होगा.

    तकनीकी रूप से कठिन product हमे विदेशी ब्रांड प्रयोग करने होंगे, विवशता है. लेकिन साबुन , तेल , टुथपेष्ट और ब्रश विदेशी ब्रांड क्यों ?

    आज से एक दशक पहले वेष्टन, टेक्सला, वीडियोकॉन आदी अनेक स्वदेशी ब्रांड के टेलिभिजन बिकते थे, अब सिर्फ सामसुंग, एलजी, सोनी आदी रह गए है. इसके लिए कौन जिम्मेवार है? सरकार, जनता या निजी क्षेत्र? या तीनो ?

    1. ​मेरी समझ से तीनों लेकिन सर्वप्रथम उस समय की सरकारें

  6. Masses की सोच में परिवर्तन (transformation) क्रान्ति से आती है.

    आपको मैं बता दूं कि संघ rss एक किताब प्रकाशित करता है जिसमे वह multinational के product और उसके विकल्प की सूची देता है, यह आज से नही 2 दशक से कर रहा है, मैं उस जहाँ तक सम्भव है follow करता रहा हूँ.

    लेकिन masses में यह विचार पहली बार क्रान्ति के रूप में दिख रहा है, देखिए यह क्रान्ति परिणाम आने से पहले स्खलित हो जाती है या लक्ष्य को हासिल करती है.

    1. ​वांछित परिणाम भले न आएं लेकिन ये क्रांति भविष्य की रूप रेखा तय जरूर कर देगी, ये भी निश्चित जान लीजिये।

      1. निश्चित रूप से जो हो रहा है वह एक क्रान्ति है, आशा करे की वह वांछित लक्ष्यों को प्राप्त करें. बस यूँ ही स्खलित न हो जाए. क्रान्ति को सफल बनाने के लिए मुझे और आपको क्या करना है सोचे और ईमानदार बने रहे यह आवश्यक है.

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