कविता : ‘तू’ और ‘प्यार’ – विजय कुमार

तू

 

मेरी दुनिया में जब मैं खामोश रहती हूँ ,

तो ,

मैं अक्सर सोचती हूँ,

कि

खुदा ने मेरे ख्वाबों को छोटा क्यों बनाया ……

 

एक ख्वाब की करवट बदलती हूँ तो;

तेरी मुस्कारती हुई आँखे नज़र आती है,

तेरी होठों की शरारत याद आती है,

तेरे बाजुओ की पनाह पुकारती है,

 

तेरी नाख़तम बातों की गूँज सुनाई देती है,

तेरी बेपनाह मोहब्बत याद आती है ………

 

तेरी क़समें ,तेरे वादें ,तेरे सपने ,तेरी हकीक़त ॥

तेरे जिस्म की खुशबु ,तेरा आना , तेरा जाना ॥

अल्लाह …..कितनी यादें है तेरी……..

 

दूसरे ख्वाब की करवट बदली तो, तू यहाँ नही था…..

खुदाया , ये कौन पराया मेरे पास लेटा है .

 

तू कहाँ चला गया….

 

 

 

 

प्यार

 

सुना है कि मुझे कुछ हो गया था…

 

बहुत दर्द होता था मुझे,

सोचता था, कोई खुदा ;

तुम्हारे नाम का फाहा ही रख दे मेरे दर्द पर…

 

 

कोई दवा काम ना देती थी…

कोई दुआ असर न करती थी…

और फिर मैं मर गया ।

 

जब मेरी कब्र बन रही थी,

तो;

मैंने पूछा कि मुझे हुआ क्या था।

 

लोगो ने कहा;

 

” प्यार “

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