कविता

कविता – अस्तित्व

dipakघुप्प अंधेरे में

टिमटिमाता है एक दीया

मेरे कमरे में ।

 

जानता हूँ अच्छी तरह

नहीं मिटा सकती अंधेरे को

उसकी रोशनी ।

 

उधर चाँद झांकता है

और कतरा-दर-कतरा

घुसता है

उसकी रोशनी

मेरे अंधेरे कमरे में ।

 

फिरभी नहीं मिटता अंधेरा

और मैं टटोलता हूँ

दो दिन की पड़ी बासी रोटी

ताकि खाया जाए जिंदगी भर

जिंदगी की तरह ।

 

और भुला दिया जाए

टिमटिमाता दीया

चाँद की रोशनी

या इस अंधेरे को ही

ठीक अपने अस्तित्व की तरह ।

 

मोतीलाल