रामस्वरूप रावतसरे
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में ’26वें अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन 2026′ का उद्घाटन किया। यह सम्मेलन भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक बड़े डिजिटल बदलाव का गवाह बना। गृह मंत्री ने ‘एनसीआरबी -अभिज्ञान’ के 4 अत्याधुनिक मोबाइल ऐप्स और प्लेटफॉर्म लॉन्च किए हैं। ये ऐप्स पुलिसिंग को ‘स्मार्ट’ और जाँच को पूरी तरह ‘वैज्ञानिक’ बनाएँगे। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य अपराधियों को सजा दिलाना और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करना है।
गृह मंत्री ने 4 नई डिजिटल सुविधाएँ लॉन्च की हैं। ‘एनसीआरबी -अभिज्ञान’ एक मोबाइल एप्लिकेशन है। यह पुलिस को कहीं भी और कभी भी फिंगरप्रिंट स्कैन करने की ताकत देता है। पुलिसकर्मी मौके पर ही संदिग्धों के फिंगरप्रिंट नेशनल डेटाबेस से मिला सकते हैं। दूसरा है ’’सीआरपीआई एप्लीकेशन’’। इसमें चेहरा, आँखों की पुतली और डीएनए मैचिंग का मिलन है। यह रिपीट ऑफेंडर्स को पकड़ने के लिए सबसे सटीक टूल है।
तीसरा है ‘ई-फ़ॉरेंसिक्स 2.0’। यह लैब और जाँच एजेंसियों को डिजिटल रूप से जोड़ता है। इसमें नमूनों के पंजीकरण से लेकर रिपोर्ट तक सब कुछ ऑनलाइन ट्रैक होगा। चौथा है ‘ई-प्रॉसिक्यूशन 2.0’। यह पुलिस, वकीलों और अदालतों को जोड़ता है। इससे केस की फाइलिंग से लेकर सजा तक का सफर तेज होगा। ये चारों ऐप्स मिलकर एक ‘इंटीग्रेटेड क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम’ (आईसीजेएस) बनाते हैं।
जानकारी के अनुसार मोदी सरकार का लक्ष्य बहुत साफ है। एफआईआर से कन्विक्शन तक का सफर 3 साल के भीतर पूरा होना चाहिए। गृह मंत्रालय इसके लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के साथ मिलकर काम कर रहा है। लंबित (पेंडिंग) मामलों को कम करने के लिए एक ठोस ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है। गृह मंत्री ने कहा कि अपराधी कितना भी चतुर हो, वह विज्ञान और कानून की शक्ति से नहीं बच सकता।
अब तक एनसीआरबी जैसी संस्थाएँ सिर्फ रिकॉर्ड रखने का काम करती थीं। अब यह ‘इंटेलिजेंस-ड्रिवन’ संस्था में बदल रही है। गृह मंत्री ने साफ किया कि सिर्फ अपराधी को पकड़ना काफी नहीं है। अपराध को होने से पहले ही रोकना असली सफलता है। पुलिस अब ‘प्रेडिक्टिव पुलिसिंग’ की तरफ बढ़ रही है, यानी अपराध होने के बाद कार्रवाई करने से आगे बढ़कर, अब अपराध को होने से पहले ही रोकने की तैयारी है।
गृह मंत्री के अनुसार डेटा का अंबार किसी काम का नहीं है। अगर डेटा का विश्लेषण न हो, तो वह एक अलमारी में रखे बोझ जैसा है। अब इस डेटा को ‘एक्शन योग्य इंटेलिजेंस’ में बदला जा रहा है। सरकार के पास 1 करोड़ 29 लाख फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड मौजूद हैं। इसके अलावा 9 लाख 91 हजार नार्को अपराधियों का डेटा है। साथ ही 3 लाख 65 हजार मानव तस्करी के मामलों का रिकॉर्ड भी उपलब्ध है।
अब एआई और मशीन लर्निंग का उपयोग करके इन डेटाबेस को जोड़ा जा रहा है। इससे अपराध के पैटर्न को समझा जाएगा। रिपीट ऑफेंडर्स और अंतरराज्यीय अपराधी नेटवर्क को पहले ही पहचाना जा सकेगा। राज्यों को विशेष टीमें बनाने को कहा गया है। ये टीमें एआई की मदद से अपराधियों की प्रोफाइलिंग करेंगी।
जानकारी के अनुसार आज देश का हर कोना तकनीक से जुड़ चुका है। देश के 17,840 पुलिस थानों में सीसीटीएनएस की पहुँच शत-प्रतिशत हो गई है। आज पुलिस के पास 37 करोड़ 68 लाख ऑनलाइन रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। इनमें पुरानी एफआईआर का डेटा भी शामिल है। वहीं, 22,000 अदालतें ई-कोर्ट से जुड़ चुकी हैं। ई-प्रिजन में 2 करोड़ 29 लाख कैदियों का डेटा सुरक्षित है। ई-फॉरेंसिक में 34 लाख 48 हजार केसों का फॉरेंसिक डेटा है। 43 लाख 16 हजार का अलर्ट डेटा भी सिस्टम में मौजूद है। ये सारे आँकड़े अब मिलकर एक शक्तिशाली डिजिटल सुरक्षा कवच बना रहे हैं।
गृह मंत्री अमित शाह ने सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों से कहा है कि डेटा की सुरक्षा और गुणवत्ता राज्यों की जिम्मेदारी है। डेटा के कपबोर्ड में रखे रहने से किसी का भला नहीं होता। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से हर हफ्ते कम से कम एक दिन ट्रेनिंग के लिए निकालने को कहा। यह ट्रेनिंग कम से कम एक साल तक चलनी चाहिए।
चार्जशीट को छोटा रखने और केवल उपयोगी साक्ष्यों को शामिल करने की कला सिखाई जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि एनएएफआईएस का उपयोग केवल पुराने केस सुलझाने के लिए न करें। हर अपराध स्थल से फिंगरप्रिंट लेकर डेटाबेस को लगातार समृद्ध करें। यह एक दो-तरफा रास्ता है। डेटा जितना बढ़ेगा, अपराधी के बचने के चांस उतने ही कम होंगे।
पुराने समय में पुलिसिंग सिर्फ फोर्स के भरोसे होती थी। अब वैज्ञानिक साक्ष्य सबसे बड़ा हथियार है। नए आपराधिक कानूनों के तहत 90 दिनों के अंदर उम्र कैद की सजा दिलाने के मामले सामने आए हैं। गृह मंत्री का मानना है कि जब समाज में यह संदेश जाएगा कि अपराध करने के बाद दंड निश्चित है, तो लोग अपराध करने से डरेंगे।
इस सम्मेलन और नई टेक्नोलॉजी के लॉन्च से देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा। यह व्यवस्था अब अधिक पारदर्शी, सटीक और समयबद्ध हो गई है। पुलिस, अभियोजन, फॉरेंसिक और न्यायपालिका अब एक ही डिजिटल कड़ी में जुड़ गए हैं। अपराधियों के लिए अब छिपने की जगह नहीं बची है। विज्ञान और तकनीक की इस नई लहर से भारत में अपराध नियंत्रण का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है।
रामस्वरूप रावतसरे