दुर्गेश्वर राय
92,100,000,000 डॉलर। यह वह विशाल धनराशि है जिसे भारत ने केवल एक वर्ष में अपनी सेना और हथियारों पर खर्च कर दिया। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की जून 2026 की वार्षिक रिपोर्ट वैश्विक सुरक्षा की एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश करती है। परमाणु-संपन्न देशों ने दुनिया को एक बार फिर बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है। पूरी दुनिया में इस समय 12,187 परमाणु हथियार मौजूद हैं जिसमे से 9745 सेना के पास, 4012 मिसाइल या विमान पर तैनात हैं और 1200 से अधिक तो हाई एलर्ट मोड में हैं। यह संख्या पूरी मानवता को कई बार नष्ट करने के लिए काफी है। शीतयुद्ध के बाद दुनिया अब सबसे खतरनाक और अस्थिर दौर से गुजर रही है।
सिपरी एक स्वतंत्र संस्था है जिसकी स्थापना 1966 ई० में स्वीडन के स्टॉकहोम में हुई थी जिसके 60 वर्ष पूरे हो चुके हैं। सिपरी की नवीनतम रिपोर्ट ‘सिपरी इयरबुक- 2026’ के अनुसार दुनिया भर में शांति और निरस्त्रीकरण के कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह विफल हो चुके हैं। विभिन्न देशों के बीच अब आधुनिक हथियारों की एक नई होड़ शुरू हो चुकी है। प्रमुख देश अब अंतरराष्ट्रीय कानूनों के बजाय केवल सैन्य शक्ति और परमाणु प्रतिरोध पर निर्भर हैं। पुराने द्विपक्षीय समझौते अब प्रभावी नहीं रहे। पारंपरिक युद्धों का स्वरूप बदल चुका है। अब युद्ध के मैदान में साइबर ऑपरेशन्स, घातक ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग तेजी से बढ़ा है। सिपरी ने सचेत किया है कि इन नई तकनीकों के सैन्य उपयोग से वैश्विक टकराव का जोखिम चरम पर पहुंच गया है।
वैश्विक सैन्य खर्च के मामले में सिपरी की रिपोर्ट एक नया ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज करती है। आर्थिक मंदी के बावजूद दुनिया भर की सरकारों ने अपने रक्षा बजटों में अप्रत्याशित वृद्धि की है। वैश्विक सैन्य खर्च की इस सूची में अमेरिका 954 बिलियन डॉलर के साथ हमेशा की तरह पहले स्थान पर बना हुआ है जो पूरी दुनिया के सम्पूर्ण सैन्य खर्च का एक तिहाई है। दूसरे स्थान पर 336 बिलियन डॉलर के साथ चीन है जो पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार कर रहा है। तीसरे और चौथे स्थान पर क्रमशः रूस और जर्मनी मौजूद हैं। इस सूची में भारत 92.1 अरब डॉलर के रक्षा खर्च के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश है। पिछले वर्ष की तुलना में भारत के सैन्य बजट में 8.9 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि दर्ज की गई है।
भारत का यह भारी-भरकम सैन्य खर्च सीमाओं पर जारी गंभीर सुरक्षा चुनौतियों को दर्शाता है। चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती के कारण भारत को अपनी सेना को लगातार आधुनिक बनाना पड़ रहा है। भारतीय रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा अब घरेलू स्तर पर हथियारों की खरीद के लिए आरक्षित किया जा रहा है। सरकार का मुख्य लक्ष्य रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है। इसके बावजूद वैश्विक हथियारों के हस्तांतरण के आंकड़े अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के एक अलग विरोधाभास को सामने लाते हैं। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के कारण यूक्रेन इस समय वैश्विक हथियारों के आयात में भारत को पीछे छोड़ शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है।
वैश्विक हथियारों के कुल आयात में 8.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बना हुआ है। भारत का अभी भी बड़ा आयातक बने रहना यह साबित करता है कि रक्षा प्रणालियों के स्वदेशीकरण की प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल होती है। भारत वर्तमान में लड़ाकू विमानों के कलपुर्जे, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और नौसैनिक इंजनों का बड़े पैमाने पर आयात कर रहा है। हालांकि अब भारत के आयात स्रोतों में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव आया है। रूस पर भारत की पारंपरिक निर्भरता पहले की तुलना में काफी कम हुई है। अब फ्रांस, अमेरिका और इजरायल जैसे देशों से हथियारों का आयात बढ़ा है। इसके साथ ही भारत का अपना रक्षा निर्यात भी अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
परमाणु शस्त्रागार के मोर्चे पर सिपरी की रिपोर्ट सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करती है। कुल वैश्विक परमाणु हथियारों का लगभग 83 प्रतिशत हिस्सा अकेले रूस और अमेरिका के पास केंद्रित है। इसके बाद चीन का स्थान आता है जो अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार सबसे तेज गति से कर रहा है। सिपरी का अनुमान है कि जनवरी 2026 तक भारत के परमाणु हथियारों की संख्या बढ़कर 190 हो गई है, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 180 थी।
इस रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला दावा भारत की परमाणु नीति में आए एक बड़े बदलाव को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पहली बार शांति काल के दौरान अपने कुछ परमाणु हथियारों को तैनात यानी पूरी तरह सक्रिय स्थिति में रखा है। माना जा रहा है कि ये हथियार भारत की परमाणु-सशस्त्र पनडुब्बियों पर गश्त के दौरान तैनात किए गए हैं। हालांकि भारत सरकार ने इस दावे की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। यदि सिपरी का यह रणनीतिक अनुमान सही है, तो यह चीन के खिलाफ भारत की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को और अधिक मजबूत करने की नीति को दर्शाता है।
वैश्विक शांति व्यवस्था के संदर्भ में भी सिपरी ने अपनी एक उप-रिपोर्ट में बेहद चिंताजनक आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। वर्ष 2025 के अंत तक अंतरराष्ट्रीय शांति सैनिकों की कुल संख्या घटकर केवल 79,000 रह गई है जो पिछले 25 वर्षों का सबसे निचला स्तर है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में महाशक्तियों के आपसी मतभेदों के कारण नए शांति मिशनों को मंजूरी नहीं मिल पा रही है। इस रिपोर्ट ने एक बड़े वैश्विक अंतर्विरोध को भी उजागर किया है। संयुक्त राष्ट्र के इन शांति मिशनों में सबसे ज्यादा सैनिकों का योगदान देने वाले शीर्ष दस देश भारत सहित ग्लोबल साउथ से हैं। इसके विपरीत इन मिशनों की नीतियां तय करने और वित्तीय नियंत्रण रखने का अधिकार केवल पश्चिमी देशों के पास है। यह स्थिति वैश्विक सुरक्षा प्रशासन में तत्काल सुधार की मांग को रेखांकित करती है।
सिपरी ने आधुनिक युद्ध के बदलते और अदृश्य तरीकों पर भी प्रकाश डाला है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक गुप्त सैन्य गतिरोध हुआ था। सिपरी के अनुसार इस गतिरोध में दोनों देशों ने पहली बार एक-दूसरे के खिलाफ बड़े पैमाने पर साइबर ऑपरेशन्स का उपयोग किया था। भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान ने इस पूरे घटनाक्रम पर पूरी तरह चुप्पी साधी हुई है। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि दक्षिण एशिया में सुरक्षा की चुनौतियां अब भौगोलिक सीमाओं से निकलकर डिजिटल डोमेन में प्रवेश कर चुकी हैं।
सिपरी ईयरबुक 2026 वैश्विक सुरक्षा के मोर्चे पर एक गंभीर चेतावनी है। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि दुनिया अब हथियारों के नियंत्रण के दौर से पूरी तरह बाहर आ चुकी है। भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट देश की संप्रभुता की रक्षा और आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच एक कठिन संतुलन बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
दुर्गेश्वर राय
(लेखक शैक्षिक संवाद मंच के संयोजक हैं)