समाज

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की डिजिटल लोकप्रियता के सियासी निहितार्थ 

कमलेश पांडेय

कॉकरोच जनता पार्टी जैसे व्यंग्यात्मक डिजिटल पेज को लाखों लाइक मिलना केवल इंटरनेट-मज़ाक नहीं माना जा सकता बल्कि यह कई गहरे सामाजिक-राजनीतिक संकेत देता है- खासकर युवाओं, मध्यम वर्ग और डिजिटल समाज की मानसिकता के बारे में। यही वजह है कि केंद्र-राज्यों में सत्तारूढ़ दलों और नागरिक प्रशासन को सावधान हो जाना चाहिए अन्यथा उन्हें अगली जेन-जी क्रांति के साइड इफेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है।

बताया जाता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी अशोभनीय थी, जिससे अब खुद भी वो मुकर चुके हैं लेकिन उनकी उक्ति ने सत्ता प्रतिष्ठान की सोच को उजागर करके लोगों को भड़काने का काम किया है और शायद विपक्षी दलों के हिमायती लोग और उनकी समर्थक युवा पीढ़ी इसी मौके की तलाश में थी जो कॉकरोच जनता पार्टी जैसे व्यंग्यात्मक डिजिटल पेज के सृजन और उसको मिले लाखों लाइक से स्पष्ट होती है। इसे केवल इंटरनेट-मज़ाक समझने की बजाए इस असंतोष की जड़ में जाना होगा। 

कॉकरोच जनता पार्टी’ की डिजिटल लोकप्रियता के सियासी निहितार्थ निम्नलिखित है:-

पहला, व्यवस्था के प्रति बढ़ती निराशा-हताशा: जब बड़ी संख्या में लोग किसी व्यंग्यात्मक या मीम-आधारित राजनीतिक पेज से जुड़ते हैं, तो इसका अर्थ होता है कि:

लोग पारंपरिक राजनीति से असंतुष्ट हैं, और उन्हें लगता है कि उनकी समस्याएँ नहीं सुनी जा रहीं, और वे गुस्से को हास्य, व्यंग्य और डिजिटल ट्रेंड के रूप में व्यक्त कर रहे हैं।

दूसरा, जेन-जी (Gen-Z) की “डिजिटल राजनीति”: आज की युवा पीढ़ी सड़क से पहले सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देती है, मीम, रील, ट्रोलिंग और व्यंग्य को राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बना चुकी है। इसलिए ऐसे पेज “डिजिटल जनमत” का संकेत बन जाते हैं।

तीसरा, बेरोज़गारी और अवसर संकट का दबाव: ऐसे प्लेटफॉर्मों की लोकप्रियता अक्सर इन मुद्दों से जुड़ती है:

बेरोज़गारी, परीक्षा पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी,

महंगाई, और अवसरों में असमानता। लिहाजा, जब युवाओं को लगता है कि मेहनत के बावजूद व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है, तब व्यंग्यात्मक आंदोलन लोकप्रिय होने लगते हैं।

चौथा, राजनीतिक दलों पर भरोसे में गिरावट: यह संकेत भी माना जा सकता है कि कुछ युवाओं को मुख्यधारा के दलों में अपना प्रतिनिधित्व नहीं दिख रहा, वे “एंटी-एस्टैब्लिशमेंट” भावनाओं की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यानी वे सीधे किसी पार्टी का समर्थन नहीं, बल्कि “सिस्टम विरोधी भावना” व्यक्त कर रहे हैं।

पांचवां, डिजिटल असंतोष भविष्य में वास्तविक आंदोलन बन सकता है: इतिहास बताता है कि कई बड़े आंदोलन पहले सोशल मीडिया ट्रेंड के रूप में शुरू हुए, और बाद में वे वास्तविक राजनीतिक दबाव में बदल गए। हालाँकि हर वायरल ट्रेंड आंदोलन नहीं बनता, लेकिन यह “सामाजिक तापमान” अवश्य दिखाता है।

छठा, हास्य अब राजनीतिक हथियार बन चुका है: पहले राजनीतिक विरोध भाषण, धरना, पोस्टर तक सीमित था।

अब मीम, पैरोडी, व्यंग्यात्मक नाम, वायरल वीडियो भी जनभावना को प्रभावित कर रहे हैं।

सातवां, भारत में “डिजिटल क्रांति” का संकेत: यह भी माना जा सकता है कि भारत में असंतोष फिलहाल संगठित सड़क आंदोलन से ज्यादा, डिजिटल संस्कृति में दिखाई दे रहा है। यानी भारत का जेन-जेड (Gen-Z) पहले “ऑनलाइन राजनीतिक चेतना” बना रहा है। लेकिन सावधानी भी जरूरी सोशल मीडिया की लोकप्रियता हमेशा वास्तविक जनसमर्थन के बराबर नहीं होती।

जानकारों की मानें तो कई बार एल्गोरिद्म, ट्रेंडिंग संस्कृति, मनोरंजन, और क्षणिक गुस्सा भी किसी पेज को वायरल बना देते हैं। इसलिए इसे पूर्ण राजनीतिक क्रांति का संकेत मानना जल्दबाज़ी होगी लेकिन इसे युवाओं की बेचैनी और व्यवस्था से असंतोष का महत्वपूर्ण डिजिटल संकेत जरूर माना जा सकता है। राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने ठीक ही कहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी कोई मान्यता दल नहीं है, न ही उसकी कोई घोषित नीति-सिद्धांत है। फिर भी पेज की लोकप्रियता विपक्षी नेताओं के मनोबल बढ़ाने को काफी हैं।

कमलेश पांडेय