– डॉ. शैलेश शुक्ला
यह केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सामने खड़े सबसे बड़े संकट का जीवंत दस्तावेज बनती जा रही है। भारत सहित दुनिया के अनेक हिस्से भीषण गर्मी, जल संकट, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा, जंगलों में आग, प्रदूषण और जलवायु असंतुलन की भयावह परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रकृति ने जितनी तीव्र चेतावनियां दी हैं, शायद इतिहास में इतनी लगातार और व्यापक चेतावनियां पहले कभी नहीं मिलीं। लेकिन दुखद सत्य यह है कि मनुष्य अब भी अपनी तथाकथित “विकास यात्रा” के नशे में इतना डूबा हुआ है कि उसे अपनी ही जड़ों के कटने की आवाज सुनाई नहीं दे रही।
हाल ही में आई रिपोर्टों में बताया गया कि दुनिया के सबसे गर्म शहरों की सूची में बड़ी संख्या भारत के शहरों की रही। उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिम भारत के अनेक क्षेत्रों में तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच गया। राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में धरती मानो आग उगलती दिखाई दी। सड़कों पर दोपहर के समय सन्नाटा छा गया। मजदूरों का काम करना कठिन हो गया। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ने लगे। पक्षी आसमान से गिरने लगे। जलाशय सिकुड़ने लगे। यह केवल “गर्मी” नहीं थी; यह प्रकृति का वह आक्रोश था जिसे हमने वर्षों तक नजरअंदाज किया।
आज भारत का सामान्य नागरिक यह महसूस करने लगा है कि मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। बचपन की गर्मियां और आज की गर्मियों में जमीन-आसमान का अंतर है। कभी मई-जून की दोपहरें भी इतनी भयावह नहीं लगती थीं। गांवों में पेड़ों की छांव, मिट्टी की नमी, तालाबों की ठंडक और हवाओं की प्राकृतिक ताजगी वातावरण को संतुलित रखती थी। लेकिन आज शहरों से लेकर गांवों तक कंक्रीट का साम्राज्य फैल चुका है। पेड़ों की जगह टावर खड़े हो गए हैं। खेतों की जगह कॉलोनियां बन गई हैं। तालाबों को पाटकर मॉल और इमारतें खड़ी कर दी गईं। परिणामस्वरूप धरती की स्वाभाविक शीतलता समाप्त होती चली गई।
विडंबना यह है कि जिस आधुनिकता को हमने प्रगति माना, उसी ने जीवन के आधारों को कमजोर कर दिया। हमने वातानुकूलित कमरों को विकास का प्रतीक बना दिया, लेकिन यह नहीं सोचा कि करोड़ों एसी मशीनें वातावरण को और अधिक गर्म कर रही हैं। हमने निजी वाहनों की संख्या को प्रतिष्ठा से जोड़ दिया, लेकिन यह नहीं समझा कि बढ़ता ईंधन दहन हवा को जहरीला बना रहा है। हमने उद्योगों को आर्थिक समृद्धि का आधार माना, लेकिन उन उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण ने नदियों, मिट्टी और वातावरण को विषाक्त बना दिया।
आज भारत के बड़े शहर “हीट आइलैंड” में बदलते जा रहे हैं। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, जयपुर, भोपाल, नागपुर, अहमदाबाद और हैदराबाद जैसे शहरों में सीमेंट, डामर और कंक्रीट दिनभर सूर्य की गर्मी सोखते हैं और रात में भी वातावरण को ठंडा नहीं होने देते। यही कारण है कि अब रातें भी पहले जैसी राहत नहीं देतीं। तापमान लगातार ऊंचा बना रहता है।
लेकिन यह संकट केवल शहरों तक सीमित नहीं है। गांवों में भी जल संकट गहरा रहा है। भूमिगत जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। कुएं सूख रहे हैं। छोटे तालाब समाप्त हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। खेती का पूरा चक्र प्रभावित हो रहा है। कभी असमय वर्षा फसलों को बर्बाद कर देती है, तो कभी लंबे सूखे से उत्पादन घट जाता है।
हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ रही है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही स्थिति रही, तो भविष्य में नदियों के जलस्तर और जलचक्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पिछले वर्षों में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंधाधुंध निर्माण और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी कितनी घातक हो सकती है।
केरल, असम और पूर्वोत्तर के अनेक क्षेत्रों में बाढ़ की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। दूसरी ओर राजस्थान और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र बार-बार सूखे की मार झेलते हैं। यह असंतुलन केवल प्राकृतिक नहीं है; इसके पीछे मानवजनित कारण भी उतने ही जिम्मेदार हैं। जंगलों की कटाई, नदियों के प्राकृतिक मार्गों में हस्तक्षेप, अत्यधिक खनन, प्रदूषण और अनियोजित शहरीकरण ने प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है।
सबसे दुखद स्थिति उन गरीब और मेहनतकश लोगों की है जो खुले आसमान के नीचे काम करने को मजबूर हैं। निर्माण मजदूर, रिक्शाचालक, ठेला चलाने वाले, किसान, डिलीवरी कर्मचारी, ट्रैफिक पुलिसकर्मी और दिहाड़ी श्रमिक भीषण गर्मी में अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं। जिन लोगों के पास एसी कमरों की सुविधा नहीं, उनके लिए यह मौसम जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष बन जाता है।
आज पर्यावरण संकट सामाजिक असमानता का भी प्रश्न बन चुका है। अमीर लोग महंगे संसाधनों के माध्यम से अस्थायी राहत खरीद सकते हैं, लेकिन गरीब के पास बचने का विकल्प नहीं होता। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक दुष्प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है जिन्होंने प्रदूषण सबसे कम फैलाया।
एक और गंभीर समस्या वायु प्रदूषण की है। भारत के अनेक शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान जहरीली हवा सामान्य जीवन को प्रभावित करती है। लेकिन अब गर्मियों में भी धूल, धुआं और प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं। अस्थमा, एलर्जी, फेफड़ों की बीमारियां और हृदय संबंधी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं।
प्लास्टिक प्रदूषण ने भी पर्यावरण को गहरे संकट में डाल दिया है। नदियों, समुद्रों, खेतों और यहां तक कि भोजन श्रृंखला में भी माइक्रोप्लास्टिक पहुंच चुका है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि भविष्य की स्वास्थ्य आपदा का संकेत है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम सचमुच जागना चाहते हैं? क्योंकि चेतावनियां लगातार मिल रही हैं। वैज्ञानिक बोल रहे हैं। पर्यावरणविद लिख रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं रिपोर्टें जारी कर रही हैं। लेकिन हमारा समाज अब भी उपभोग की अंधी दौड़ में भाग रहा है। अधिक गाड़ियां, अधिक उपभोग, अधिक निर्माण और अधिक प्रदर्शन—यही आधुनिक जीवन का लक्ष्य बन गया है।
हम यह भूल गए हैं कि पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं। प्रकृति की सहनशीलता की भी एक सीमा है। यदि नदियां सूख जाएंगी, जंगल समाप्त हो जाएंगे और हवा विषैली हो जाएगी, तो तकनीक भी मानव जीवन को सुरक्षित नहीं रख पाएगी। आज आवश्यकता केवल सरकारी योजनाओं की नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना की है। पर्यावरण संरक्षण को “अलग विषय” मानने की मानसिकता बदलनी होगी। यह सीधे-सीधे जीवन रक्षा का विषय है।
हमें विकास की नई परिभाषा गढ़नी होगी। ऐसा विकास जिसमें हरियाली भी हो, जल संरक्षण भी हो, स्वच्छ ऊर्जा भी हो और प्राकृतिक संतुलन भी बना रहे। केवल जीडीपी की वृद्धि को प्रगति मानना घातक हो सकता है। यदि आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण नष्ट हो रहा है, तो वह विकास नहीं, विनाश है।
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को व्यवहार से जोड़ना होगा। बच्चों को पेड़ लगाने, जल संरक्षण करने और प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा देनी होगी। मीडिया को भी पर्यावरणीय मुद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिए। जिस गंभीरता से राजनीति और मनोरंजन की खबरें दिखाई जाती हैं, उसी गंभीरता से जलवायु संकट पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं को भी आगे आना होगा। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को पूजनीय माना गया है। यदि हम वास्तव में अपनी संस्कृति का सम्मान करते हैं, तो हमें नदियों, पेड़ों, पहाड़ों और धरती के प्रति अपने व्यवहार को बदलना होगा।
आज आवश्यकता केवल भाषणों और अभियानों की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या हम अपने बच्चों को रहने योग्य पृथ्वी दे पाएंगे? क्या आने वाली पीढ़ियां हमें धन्यवाद देंगी या धिक्कारेंगी? एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब हमारे पास ऊंची इमारतें होंगी, लेकिन पीने योग्य पानी नहीं होगा; हमारे पास अत्याधुनिक तकनीक होगी, लेकिन शुद्ध हवा नहीं होगी; हमारे पास धन होगा, लेकिन सुरक्षित जीवन नहीं होगा।
इसलिए अब समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि निर्णायक परिवर्तन का है। क्योंकि अंततः सबसे बड़ा सत्य यही है— यदि पर्यावरण नहीं बचेगा, तो मानव सभ्यता का कोई भी विकास टिक नहीं पाएगा।
धरती को बचाना अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। और यदि हम अब भी नहीं चेते, तो इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद करेगा जिसने सुविधा के लिए भविष्य को जला दिया।