गैर-राजनीतिक अंदोलन का राजनीतिक होना

प्रमोद भार्गव

चुन-चुन कर अन्ना दल के सदस्यों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं को एक गैर राजनीतिक सामाजिक आंदोलन के राजनीतिक होने की दिशा में बढ़ते जाने के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे तंत्र और समाज के बीच जो लड़ाई चल रही हैं, उसमें तंत्र समाज की रचनात्मक शक्तियों को कैसे धूल चटा देने का माहौल रचने में लग गया हैं, इस परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। क्योंकि राजनीतिक दलों में अपने भविष्य को लेकर यह चिंता घर करना लाजिमी हैं कि भष्टाचार का मुद्दा उनके हाथों से निकलकर समाजिक कार्यकताओं के हाथ कैसे लग गया ? क्या उन पर से आमजन का भरोसा उठ रहा है ? अगले कुछ माहों में पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव होने जा रहे हैं। इतने कम समय में क्या वह जनता के विशवास की कसौटी पर खरे उतर कर अपनी खोई साख की दोबारा बहाली कर पाएंगे ? हालाकिं वक्त की इस नजाकत को प्रधानमंत्री डाँ मनमोहन सिंह और वित मंत्री प्रणव मुखर्जी ने शायद ताड़ लिया है। इसलिए इन नेता द्वय ने सार्थक हस्तक्ष्ेप करते हुए अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम, न्यायायिक सक्रियता और नियंत्रक व महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों को सही ठहराने के बयान देकर एक रचनात्मक पहल की है। इस पहल के बाद यदि तंत्र और समाज के बीच लोकतांत्रिक संवाद कायम होता है तो स्वस्थ लोक जीवन और लोकतंत्र कायमी की उम्मीद की जा सकेगाी।

एक गैर राजनीतिक सामाजिक संगठन का राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप न केवल राजनीतिक दलों के लिए बल्कि अन्य सामाजिक संगठनों के लिए भी चिंता का सबब बनकर उभर रहा हैं। अन्ना दल को राजनीतिक रूप में तब्दील होते देख लोग न केवल हैरान है, बल्कि अन्ना की नैतिकता पर भी सवाल उठा रहे हैं। इसी कारण अन्ना दल के प्रमुख राष्‍ट्रीय एकता परिषद के अध्यक्ष पीवी राजगोपाल और जल बिरादरी के सदस्य राजेन्द्र्र सिंह ने कोर कमेटी से खुद को अलग कर लिया है। संतोष हेगड़े भी आपत्ति जता चुके हैं। कश्मीर मुद्दे पर विवादास्पद बयान देकर और घर का भेदी लंका ढाए की भूमिका में आकर स्वामी अग्निवेश पहले ही अलग-थलग पड़ गए है। यहां यह भी गोरतलब हैं कि अन्ना अंदोलन यदि अराजनीतिक ही बना रहता तो अन्ना दल एक मजबूत प्रतिपक्ष की भूमिका में भी नहीं उभरता। हिसार से लेकर उत्तर प्रदेश तक जनमत तैयार करने का जो सिलसिला चल पड़ा है, दरअसल वह राजनीतिकों को पच नहीं रहा है, इसलिए यह बौखलाहट कथित हमलों के रूप में जंग को कुंद करने के नाना रूपों में सामने आ रही है। इसी छटपटाहट कि प्रतिक्रिया है कि मायावती जैसी तेज तर्रार नेत्री दलित प्रेरणा स्थल से अन्ना और बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार मुहिम चलाने के लिए उत्तर प्रदेश की धरती पर आमंत्रित करती है। दूसरी तरफ महाराष्ट के कद्दावर नेता और संप्रग के प्रमुख सहयोगी शरद पवार सीधे प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर कहते हैं कि केंद्र सरकार कमजोर नेतृत्व से घिरी हुई है। घोटालों तथा गलत फैसलों के चलते सरकार की छवि जनमानस में धूमिल हुर्ह है। हालांकि खड़गवासला विधानसभा उपचुनाव में एनसीपी के उम्मीदवार की हार से भी पवार आहत हैं। इसलिए भी शायद उनकी यह पीड़ा प्रगट हुर्ह हो ? यही नहीं जिन राहुल गांघी को कांग्रेस अन्ना की काट मानकर चल रही है ,उन्हीं राहुल को अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी में लोगों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए नसीहत दे डाली कि वे भ्रष्टों से बचें और साफ छवि के प्रत्याशियों को टिकट दें। यह वाक्या अन्ना फेंक्टर का ही असर है।

दूसरी तरफ अन्ना दल के हिसार हस्तक्षेप को मनमोहन सिंह और प्रणव मुखर्जी ने समझदारी व दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उसे सकारात्मक रूप में लिया है। उन्हाेंने शायद अहसास कर लिया है कि अपनी खामियों और कमजोरियों का ठिकरा दूसरों के सिर फोड़ने से कांग्रेस का कोई भला होने वाला नहीं है। क्योंकि अब तक घोटालों में लिप्त मंत्री अपने पाप का ठीकरा न्यायपालिका, सीएजी, सीबीआई और आरटीआई पर ही फोड़ते आए हैं। इसी कारण आरटीआई के पर कतरने और सामाजिक संगठनों पर अंकुश लगाने की वकालत राजनीतिक व प्रशासनिक हलकों में पुरजोरी से उठ रही है। जबकि वाकई इन संस्थाओं का दायित्व अनियंत्रित हो रही स्थितियों को नियंत्रित करने का ही है, जिस पर वे जिम्मेबारी से अमल कर रही हैं। इस नाते राजनैतिक नेत्त्व का यह फर्ज बनता है कि वह उन्हें दुत्कारने की बजाए उनका सम्मान करे।

प्रधानमंत्री अब लोकतांत्रिक संस्थाओं के सम्मान की दिशा में बढ़ते दिखाई देने के साथ सशक्त लोकपाल इसी शीतकालीन सत्र में लाने की बात करने लगे है। उन्होंने यह भी भरोसा जताया है कि निजी क्षेत्र में रिश्वतखोरी को अपराघ घोषित करने पर भी सरकार विचार कर रही है। यही नहीं ड़ाँ मनमोहन सिंह का रूख अब उदार व लचीला हो रहा है, यह न्यायपालिका और अन्ना के समर्थन में दिए बयान से जाहिर होता है। डॉ. सिंह ने कहा है, एक सरकार के रूप में हम न्यायपालिका का पूरा सम्मान करते है। दूसरी तरफ अन्ना हजारे की भष्टाचार के खिलाफ वातावरण बनाने की अंहम् भूमिका को स्वीकारते हुए कहा कि अन्ना अंदोलन अपना लक्ष्य साधने में सफल रहा हैं।

प्रणव मुखर्जी ने भी सार्वजनिक बयान देकर कहा है कि सीएजी अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं कर रही है। 2 जी स्पेटम घोटाले और कावेरी गोदावारी बेसिन तेल अनुबंध जैसे मामलों में भ्रष्टाचार बरते जाने की पृष्ठभूमि का खुलासा करने में सीएजी की सक्रिय योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सीएजी अपने दायित्व का निर्वहन कर रही है। डाँ सिंह और प्रणव मुखर्जी द्वारा यह रूख अपनाना परोक्ष रूप से अन्ना के राजनितिक हस्तक्षेप का ही प्रतिफल है। इसकी आलोचना करने कि बजाए सराहना की जरूरत है। क्योंकि लोकतांत्रिक संवैधानिक संस्थाओं, निकायों और नागरिक समाज के प्रति आदर भाव जताना संवाद के लिए खिड़की खोल देने की राजनीतिक समझदारी भी है।

यह अन्ना और रामदेव का ही प्रभाव हैं कि 81 देशों के साथ दोहरे कराधान से बचाव संबंधित संधि में संशोधन हो गया है और विदेशों में भारतीयों के संदेहास्पद लेने – देने के मामले में 9900 सूचनाएं मिल चुकी हैं। यही नहीं संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में लोकपाल विधेयक पारित किए जाने और मंहगई पर नियंत्रण के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की मांग को लेकर भाकपा महासचिव भी एक दिनी उपवास पर अपने दल के साथ हाल ही में बैठ चुके हैं। जाहिर हैं भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी लड़ाई में व्यापक सहमति बढ़ती जा रही हैं। लोकपाल से भष्टाचार पूरी तरह खत्म भले ही न हो, लेकिन वह जबाबदेही के लिए, सूचना का अधिकार कानून की तरह एक कारगर औजार जरूर बनेगा। शिखर पर पहुंचे अन्ना दल को भी अब नब्ज पर हाथ रखते हुए सहमति की दरकार पेश करने और वक्त का इंतजार करने की जरूरत हैं। वरना अंतिम चोटी पर पहुंचने के बाद और उपर चढ़ पाने की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं।

3 thoughts on “गैर-राजनीतिक अंदोलन का राजनीतिक होना

  1. प्रमोद भार्गव जी ,एक तरफ तो आपका विवेचनात्मक और सारगर्भित लेख और दूसरी तरफ मेरे विचार से सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार की बे सर पैर की टिप्पणी.मुझे पता नहीं चल रहा है की इन दोनों में कोई सम्बन्ध है भी.ऐसे भी कुछ भी लिखने और बोलने की स्वतंत्रता सबको है,इसलिए मै इस तरह की टिप्पणियों पर भी ज्यादा कुछ कह नहीं सकता.
    अब मै मुख्य बात पर आता हूँ.मेरे विचार से सामाजिक संगठनों का राजनीति में न केवल हस्तक्षेप,बल्कि उनकी प्रमुख भूमिका होनी चाहिए.साधू संतों को भी इसमे योगदान की आवश्यकता है.जब टीम अन्ना ने यह घोषणा की थी कि वे किसी भी चुनाव क्षेत्र में जनता से सबसे ईमानदार उम्मीदवार को जीताने का आग्रह करेंगे तो वे बहुत बड़ा सामाजिक कर्तव्य निभाने का वादा कर रहे थे.हिसार लोक सभा चुनाव में वे लोग थोड़ा भटके अवश्य,पर अभी भी समय है उनको अपने सिद्धांत पर अमल करने के लिए.प्रजातंत्र में साधू संतों को भी इस भूमिका में आगे आना चाहिए.इस तरह वे समाज के लिए सच्चे पथ प्रदर्शक की भूमिका निभायेंगे.रह गयी बात भ्रष्टाचार के मामले में सरकार द्वारा कदम उठाये जाने की बात,तो अगर ये कदम वास्तव में उठाये जारहे हैं तो इसकी सराहना की जानी चाहिए,पर सरकार के पिछले वादे और उनपर अमल न करने का जो इतिहास है,उसको देखते हुए तो यह संदेह जनक लगता है कि सरकार ऐसा करेगी.फिर भी प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ेगी

  2. जब तक महात्मा गाँधी,सोनिया गाँधी,इंदिरा गाँधी,राजीव गाँधी,राहुल गाँधी………गाँधी…गाँधी…गाँधी… का नशा है ……तब तक देश भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो सकता …… मोहन दस करम चाँद गाँधी कोई पहला और आखरी महात्मा नहीं है, उससे पहले भी और बाद में भी कई महान आत्माओ ने जन्म लिया है इस भारत भूमि पर …..इस देश में जो कांग्रेस की दलाली,चापलूसी करे वाही महात्मा और राष्ट्र पिता ………..क्या फेस बुक की जनता सहमत है….या जिसे अन्ना महात्मा माने वही महात्मा बाकि सब जीवात्मा और गाँधी नाम परमात्मा ……….तो इश्वर आपको भी गाँधी बना दे…..

  3. मैंने ९ माह पहले ही लिख दिया था की अन्ना के साथ चोर,बेईमान,भ्रष्ट और कांग्रेस के दलाल भी काम कर रहे है , जो सामने आ रहा है | ………. सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार
    *********************ॐ साईं ॐ *************
    भारत वर्ष में नेता मतलब चोर,बेईमान और भ्रष्ट
    इसलिए आदरणीय अन्ना का लोकपाल विधेयक फ़ैल होना तय है,क्योकि देश को लाखो सरदार पटेल,भगतसिंह,सुखदेव,चंद्रशेखर आजाद,सुभाष चन्द्र बोस चाहिए जो अंग्रेजो की तरह भ्रष्टाचारियो को काटकर भारत माता को बलि चड़ा दे
    तभी भारत माता भ्रष्टाचारियो की गुलामी से आजाद हो सकती है
    या…………भारत सरकार यदि इमानदारी से भरष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण करना चाहती है तो देश से भ्रष्टाचार मिटाने का काम मुझे ठेके पर दे दे जैसे सारे सरकारी काम केंद्र और राज्य सरकारों ने ठेके पर दे रखे (जिनसे देश के भ्रष्टनेताओं,मंत्रियो,संतरियो,अधिकारिओ,कर्मचारियो और काला बाजारी अमीरों को भरपूर कमीशन मिलता है
    सरे हरराम्खोर ऐश कर रहे है और गरीब जनता भूखो मर रही है
    ) मै ६३ वर्षो के भ्रष्टाचार की कमाई को मात्र ७ वर्षो में वसूल करके सरकारी खजाने में जमा कर दूंगा और भ्रष्टाचार को जड़ मूल से उखाड़ फेकुंगा , मेरी भ्रष्टाचार निवारण की प्रक्रिया के बाद कोई भी नेता,मंत्री,संत्री,अधिकारी,कर्मचारी और कालाबजारी भ्रष्ट होने से पहले हजार बार सोचेगा
    मुझे कुल वसूली का मात्र 0.०७% मेहनताना ही चाहिए

    मई पिछले २५ वर्षो से देश के भ्रष्ट कर्णधारों को लिखता आ रहा हु की मुझे भ्रष्टाचार मुक्त भारत का काम ठेके पर दे दो ,मै ६३ वर्षो के भ्रष्टाचार की कमाई को मात्र ७ वर्षो में वसूल करके सरकारी खजाने में जमा कर दूंगा और भ्रष्टाचार को जड़ मूल से उखाड़ फेकुंगामेरे पत्रों को पड़कर देश के भ्रष्ट कर्णधारों को सांप सूंघ जाता है
    “भ्रष्टाचार सामाजिक अन्याय का जन्म दाता है और सामाजिक अन्याय उग्रवाद और आतंकवाद का जन्म दाता है”
    महेश चन्द्र वर्मा , प्रधान सम्पादक,
    सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार ,
    साप्ताहिक समाचार पत्र,म.प्र.

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