आतंकवाद पर भी राजनीति

विश्वास द्विवेदी

देश का दुर्भाग्य है कि जो आतंकवादी हमारे देश में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के बाद गिरफ्त में हैं और उन्हें न्यायालय द्वारा सजा सुनाई जा चुकी है वे सियासत के चलते आज भी जिन्दा हैं। आतंकवादियों को सुनाई गयी सजा को लेकर राजनेता अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। आखिर उन आतंकवादियों को बचाने का प्रयास क्यों किया जा रहा है जिनकी मौत की सजा पर न सिर्फ उच्चतम न्यायालय अपनी मुहर लगा चुका है बल्कि राष्ट्रपति भी उनकी दया याचिका खारिज कर चुकी हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी नहीं देने का तमिलनाडु विधानसभा की ओर से सर्वसम्मति से पास किया गया प्रस्ताव क्या जाहिर करता है। राज्य विधानसभा का यह कदम अपने चुनावी फायदे को देखते हुए खेला जा रहा खेल नहीं तो और क्या है? तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट के माध्यम से अपनी मंशा जाहिर की क यदि जम्मू-कश्मी र विधानसभा अफजल गुरु को माफी के संबंध में प्रस्ताव पास करती तो क्या प्रतिक्रिया होती? इससे पहले पंजाब के सभी पार्टियों के नेता देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर को माफी दिलाने के लिए एक मंच पर आ चुके हैं

गौरतलब है कि देश में कई ऐसे मुजरिम या आतंकवादी हैं जिन्हें मौत की सजा सुनाई गयी है। चुनावी नफा नुकसान देख राजनीतिक पार्टिया इस तरह के प्रयास करती नजर आयेंगी। इससे उनको राजनैतिक फायदा तो हो सकता है परन्तु आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम कहीं न कहीं कमजोर अवश्य पड़ जायेंगे।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने राजीव गांधी के हत्यारों की सजा के मामले पर पहले तो कहा कि राष्ट्रपति के आदेश में संशोधन करने का उनके पास कोई अधिकार नहीं है लेकिन जब उनके करुणानिधि ने राजीव गांधी के हत्यारों की मौत की सजा को रद्द करने की वकालत करते हुए कहा कि यदि उन्हें छोड़ दिया जाता है तो तमिल लोग खुश होंगे तो जयललिता ने अपना रूख तुरंन्त बदल लिया और अगले ही दिन विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित करा दिया जिसमें दोषियों की फांसी की सजा को माफ करने का आग्रह किया गया। केवल इतना ही नहीं अन्य पार्टियों के कई नेता भी इस मामले से चुनावी लाभ उठाने के लिये मैदान में कूद पड़े। श्रीलंका के भी कुछ सांसदों ने भारत के राष्ट्रपति और अन्य नेताओं को पत्र लिखा कि राजीव के हत्यारों को फांसी नहीं दी जाये। कांग्रेस के कुछ नेता भी इसे अपने चुनाव में हितकर मान रहे हैं। यह दोहरा रवैया नहीं तो और क्या है कि एक ओर जहां राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का मत है कि कानूनी प्रक्रिया को अपना काम करने देना चाहिए वहीं राज्य स्तर पर उसके नेताओं को कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप से कोई गुरेज नहीं है। यहां दोष सिर्फ एक दल का नहीं बल्कि सभी पार्टियों का है क्योंकि हर कोई राजीव के हत्यारों को फांसी में अपना चुनावी नुकसान देख रहा है।

बहरहाल, जहां तक बात मौत की सजा के नैतिक पक्ष की है तो यह सही है कि दुनिया भर में इसका प्रचलन कम हो रहा है और मीडिया रिपोर्टों के आंकड़ों के मुताबिक 139 देश फांसी की सजा को हटा चुके हैं। अपने देश में भी फांसी की सजा को खत्म करने की बहस वर्षों से चल रही है लेकिन किसी तार्किक अंजाम तक नहीं पहुंच पायी है। जब तक इस मामले में कोई एकराय नहीं बन जाती तब तक जघन्य अपराधों, कांडों में शामिल लोगों की सजा पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे सिर्फ आतंकवादियों और अपराधियों का हौसला ही बुलंद होगा क्योंकि उन्हें पता है कि पहले तो मुकदमा वर्षों तक चलेगा और जब सजा सुना भी दी जायेगी तो राजनीतिक कारणों से इसमें विलंब होता रहेगा।

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