प्रेमचंद की जरूरत थी

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poet
अधराता हो चुका था। पर आखों से नींद वैसे ही गायब थी जैसे यूपी में चुनाव के चलते हर नेताई आंख से नींद गायब है। जैसे तैसे सोने का नाटक कर सोने ही लगा था कि फोन आया तो चैंका। किसका फोन होगा? किसी दोस्त को कहीं कुछ हो तो नहीं गया होगा? ये दोस्त भी न ! इन्हें भी रात को ही कुछ होता है। अरे, दिन के बारह घंटे भी तो होते हैं दोस्तों को तंग करने के लिए। वैसे, सच कहूं तो दिन को भी किसी का फोन आए तो डर सा लगता है। डरते हुए फोन उठाया तो सेवड नंबर भाषा एवं संस्कृति विभाग के चौकीदार का । विभाग के साहब के मुंह मैं आजतक नहीं लगा कि उन्होंने मुझे आजतक अपने मुंह नहीं लगाया, अपने ढंग से तय कर लीजिए ‘, सर, रामआसरे बोल रहा हूं सुन्नसंकृति बभाग से, पहचाना?’
‘आधी रात को! सुबह नहीं होनी थी क्या?’ मुझे गुस्सा आया। हम भी बड़े अजीब बंदे हैं। हम तो जैसे- कैसे सो जाते हैं पर ये गुस्सा कंबख्त चौबीसों घंटे पता नहीं कैसे जागा रहता है।
‘रात को ही डयूटी पर होता हूं न,’ उसने सफाई दी तो मैंने शांत होते पूछा,‘ क्या बात? विभाग में चोरी- बोरी तो नहीं हो गई?’
‘अरे साहब! अब इस विभाग में चोरी होने को रह ही क्या गया है? सुन्नसंकृति, भाषा तो सब पच्छिम की चल रही है,’ उसके मन से भारतीय भाषा एवं संस्कृति के प्रति लगाव देखा तो मन भर आया।’
‘ तूने तो बाय गाड डरा कर रख दिया था …..तो फिर कल कवि गोष्ठी है क्या?’लगा दस बार बिक चुकी कविता अबके फिर पांच सात सौ की गई। कई बार लगता है कइयों की कविताएं जैसे कोठे वालियां सी हों।
‘ वो कल ही साहब को पता चला कि कल प्रेमचंद की जयंती है। सो साहब ने कहा था कि मैं तुम्हें प्रेमचंद को बुलाने को कहूं।’
‘क्यों ? वे खुद नहीं बुला सकते उन्हें?’ सुस्ती की भी भाई साहब हद होती है। पर यार! बहुत बुरी बात है ये! तुम लोग आग लेने पर ही हर जयंती, पुण्यतिथि पर कुंआ खोदते हो हमेशा। अपने को तो तुम लागे संभाल कर रख नही सकते पर कम से मरे हुए लेखकों के नंबर तो अपने पास संभाल कर रखा करो ,‘ मैंने दिखावे को विरोध दर्ज किया तो वह सच बोलने को तैयार होता दिखा,‘ बजट ही आग लगने के बाद आग बुझाने को रिलीज होता है तो हम क्या करें? दूसरे साहब के कमरे का सरकारी फोन खराब चल रहा है,’ उसके कहने से ही पता चल गया था कि झूठ बोल रहा है। पूरे दम के साथ। मुफ्त में झूठ कहने वाले और वेतन लेकर झूठ बोलने वाले में एक यही खास अंतर होता है।’
पर उसके बाद भी मुझे परम शांति मिली कि मरने के बाद ही सही, किसी लेखक को सरकारी विभाग पूछ ले तो लेखक की मरने के बाद भी उसकी आधी पीड़ा दूर हो जाती है।
‘पर यार! बहुत बुरी बात है ये! तुम लोग जिंदा लेखकों से तो दूरी रखते ही हो पर मरे लेखकों से तो कम से कम नजदीकियां बनाए रखा करो। जिंदा लेखकों की तरह वे कौन सी परेशानी खड़े करेंगे?‘ मैंने दिखावे को विरोध दर्ज किया तो वह सच बोलने को तैयार होता दिखा,‘ असल में वे कह रहे थे कि प्रोटोकाल में प्रेमचंद उनके आसपास तो क्या, दूर तक नहीं ठहरते सो मुझे……’ आगे मैं सब समझ गया।
‘तो??
‘ सुना है, आप कहेंगे तो प्रेमचंद आ जाएंगे। वे कह रहे थे। वैसे भी न प्रेमचंद साहब को जानते हैं न साहब प्रेमचंद को। हो सकता है वे इनका फोन उठाए भी या नहीं। पर एक बात कहूं! बुरा मत मानना! तुम लेखक लोग भी न बड़े अजीब किस्म के जीव होते हो। किसी कार्यक्रम में इसे बुलाओ तो पंगा, उसे बुलाओ तो पंगा।’
‘तो??’
‘तो अब आप उन्हें बुला लीजिएगा। चौकीदार की नाक का सवाल है। किसी लेखक की जयंती, पुण्यतिथि पर लेखक को न बुलाया जाए तो…. वे न मानें तो पिछले साल का उनका फोटो तो तुम्हारे पास होगा ही। वही ले आना। घी, धूप और रूईं मैं घर से ले आऊंगा। सच पूछो तो जिंदे लेखक मनाने कठिन हैं पर मरे मनाने उससे भी कठिन! काश ! लेखक न होते तो मैं चौन की सांस ले चौकीदारी तो करता, ’ चौकीदार ने गुस्साते कहा।
भाई साहब! ये लेखक भी बड़े अजीबोगरीब होते हैं, जिन्हें जीते जी कोई नहीं पूछता पर उनके मरने के बाद कम से कम दो दिन उनकी डिमांड ऐसी बढ़ जाती है कि बंदा तो बंदा, उसका फोटो तक विभागों को दौडा़- दौड़ा कर मार डालता है। दूसरी ओर उस दिन हर कोई साहित्यप्रेमी बनना चाहता है कि कम से कम अपनी पुण्यतिथि और जयंती की अध्यक्षता आकर मरे खुद करें तो साहित्य के पुजारी अमर रहें।
‘ चलो, सुबह देखता हूं। अभी तो सो गए होंगे। नहीं तो फोटो तो मेरे पास कहीं पड़ी ही होगी,’ मैं जिसे कुत्ता भी नहीं पूछता वह देखते ही देखते अंगद का पांव हुआ।
‘ कह देना, लालच दे देना ,जयंती झक्कास रहेगी। ऐसी कि जैसे उनके जीते जी भी न मनाई गई होगी।’
‘ ठीक है! ठीक है! कवि गोष्ठी तो होगी न? मुझे अपनी पड़ी थी सो हड़बड़ाते पूछा।
‘ हां साहब! वह तो होगी ही। उसके बिना किसी भी महापुरूष की जयंती, पुण्यतिथि सफल गई है आज तक क्या?’ सुनते ही मन बिहारी हुआ।
अशोक गौतम

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