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    Homeराजनीतिप्रधानमंत्री सिर्फ शासक ही नहीं, अभिभावक और समाज सुधारक भी

    प्रधानमंत्री सिर्फ शासक ही नहीं, अभिभावक और समाज सुधारक भी

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को दिया गया भाषण हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। देशवासियों को लगता है कि प्रधानमंत्राी ने लिखा हुआ भाषण न पढ़कर अपनी अंतरात्मा की आवाज को व्यक्त किया है। श्री नरेंद्र मोदी जब बोल रहे थे तो लग रहा था कि उनका भाषण किसी राजनेता का कम बल्कि समाज सुधारक और अभिभावक का अधिक था। प्रधानमंत्राी ने उन छोटी-छोटी बुनियादी समस्याओं की तरफ देशवासियों का ध्यान आकर्षित किया है जिनसे आम जनता का आये दिन पाला पड़ता रहता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि जिस प्रकार लोग अपनी बेटियों से पूछते हैं कि वह कहां जा रही है, क्यों जा रही है, उसी तरह यदि अपने बेटों से भी पूछने लगें कि वह कहां और क्यों जा रहा है? इस बात में उनकी एक अपील थी। यह बात भी उन्होंने कही कि कानून अपना काम कड़ाई से करेगा, किंतु लोग भी यदि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करें तो बहुत कुछ बदला जा सकता है। प्रधानमंत्राी की इस बात में निःस्वार्थ भाव था कि राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी पूरे देशवासियों की है। उन्होंने बिल्कुल साफ किया कि यह देश प्रधानमंत्रियों एवं सरकारों ने नहीं बनाया है, बल्कि यह देश किसानों, मजदूरों, सैनिकों एवं अन्य लोगों ने बनाया है।
    चूंकि, सरकार देश एवं जनता को रास्ता दिखाने का काम करती है किंतु सरकार को एक बात का ध्यान हमेशा रखना चाहिए कि कोई भी काम जन-भावनाओं के विपरीत न हो। लाल किले की प्राचीर से पहली बार ऐसा देखने को मिला कि कोई प्रधानमंत्राी अभिभावक है तो समाज सुधारक भी। शासक है तो अपने को प्रधान सेवक भी घोषित करता है। आध्यात्मिक गुरु है तो गरीबों का मसीहा भी। समाज में गिरते हुए मूल्यों को लेकर जिस प्रकार उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की है उससे प्रधानमंत्राी ने अपने को जनता से जोड़ने का काम किया है।
    हिन्दुस्तान के किसी भी प्रधानमंत्राी ने मां-बाप से अब तक इस बात की अपील नहीं की कि वे अपने बेटों से उतनी ही पूछताछ क्यों नहीं करते हैं जितनी बेटियों से करते हैं। समाज के लिए यह अपने आप में बहुत बड़ा संदेश है। जाहिर सी बात है कि बलात्कारी किसी न किसी का तो बेटा ही होता है। प्रधानमंत्राी ने यह बात ऐसे वक्त में कही है जब लोगों का अपने बेटों पर पहले की अपेक्षा नियंत्राण कम होता जा रहा है।
    प्रधानमंत्राी ने अपने भाषण में यह नहीं कहा कि हमने क्या किया और उन्होंने क्या किया, उन्होंने जनता से जो कुछ भी कहा, निश्चित रूप से वह एक निर्दोष गुजारिश थी। श्री नरेंद्र मोदी ने अपने को देश का प्रधान सेवक बताकर यह संदेश देने का काम किया है कि शासन-प्रशासन में शामिल कोई भी व्यक्ति अपने को जनता से बड़ा न समझे। सभी लोग जनता के सेवक हैं। प्रधानमंत्राी ने अपने सहयोगियों से गुजारिश की कि यदि वे 12 घंटे काम करेंगे तो मैं 13 घंटे काम करूंगा। यानी कि किसी भी बलिदान एवं त्याग-तपस्या की पहल उन्होंने स्वतः अपने से ही की है।
    आज के हालात में कोई प्रधानमंत्राी यदि अपनी पत्नी, परिवार, सगे, संबंधियों को अपने शपथ ग्रहण समारोह में न बुलाये तो क्या यह कम बड़ा त्याग है। कुछ बातें कहने में बहुत अच्छी लगती हैं, किंतु जब उन्हें अपने जीवन में लागू करना पड़ता है तो बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बगैर किसी बुलेट-प्रूफ केबिन में बंद हुए एक घंटे से अधिक समय तक धारा प्रवाह बोलना यह दर्शाता है कि उनमें आत्म विश्वास किस हद तक है? साथ ही यह भी साबित होता है कि वे अपने सुरक्षा बलों पर किस हद तक भरोसा करते हैं?
    प्रधानमंत्राी ने शौचालय एवं साफ-सफाई की बात कहकर एक ऐसी बुनियादी समस्या की तरफ इशारा किया है जिसका समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाना जरूरी है। यह बात बिल्कुल सही है कि महिलाओं एवं लड़कियों को सार्वजनिक स्थानों एवं अन्य जगहों पर शौचालय की व्यवस्था न होने के कारण कितनी दिक्कत होती है? गरीबों के लिए प्रधानमंत्राी जन-धन योजना की घोषणा कर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनके एजेंडे में समाज में अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति प्राथमिकता में है।
    गरीब के बच्चे उसके मरने के बाद बेसहारा न हों, उनके इलाज एवं जीवन-यापन में परेशानी न हों, इसके लिए प्रधानमंत्राी जन-धन योजना शुरू की। सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के संबंध में उनका यह कहना कि यदि वे समय से कार्यालय आने लगे तो ब्रेकिंग न्यूज बन गई, इससे यह साबित होता है कि किस स्तर तक गिरावट आ चुकी है? प्रधानमंत्राी की इस बात का भी समाज में बहुत व्यापक स्तर पर संदेश गया है। सांसदों के लिए जो उन्होंने ‘आदर्श गांव’ का कान्सेप्ट दिया है वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बुनियादी बातों एवं बुनियादी समस्याओं की चर्चा वही कर सकता है, जो आम जनता का दुख-दर्द जानता एवं समझता हो।
    चूंकि, प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने आम व्यक्ति की जिंदगी जी है, गरीबी देखी है, इसलिए उन्हें इस तरह की बुनियादी समस्याओं की जानकारी है और उसी के आधार पर उन्होंने लाल किले से इसकी चर्चा की है। सरकार के अंदर एक विभाग से दूसरे विभाग का तालमेल नहीं है, इस बात की भी उन्होंने चर्चा करके यह संदेश देने की कोशिश की है कि इस संबंध में सिर्फ कानूनी प्रक्रिया में उलझने के बजाय स्वतः संज्ञान लेकर कुछ बेहतर करने का प्रयास किया जाये। कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि प्रधानमंत्राी ने छोटी-छोटी किंतु बेहद महत्वपूर्ण बातों की चर्चा कर अपने को जनता से जोड़ने का काम किया है। आज देश के तमाम बुद्धिजीवी एवं ओपिनियन मेकर जो बात-बात में श्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हैं, उन्होंने भी प्रधानमंत्राी के भाषण को सराहा है।
    प्रधानमंत्राी द्वारा लाल किले से दिये गये भाषण को भी यदि दरकिनार कर दिया जाये तो उनकी अब तक की जो कार्यप्रणाली है, उससे भी यही साबित होता है कि वे किसी भी मुद्दे पर आम सहमति के आधार पर आगे बढ़ना चाहते हैं। लोकसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं तमाम कमेटियों का चुनाव जिस प्रकार से सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ, इससे यह जाहिर होता है कि उनकी मंशा क्या है? जहां वे आम सहमति के आधार पर शासन चलाना चाहते हैं वहीं वे देश को अपने बूते आत्म-निर्भर भी बनाना चाहते हैं।
    उनका स्पष्ट रूप से मानना है कि भारत में हर सामान का उत्पादन होना चाहिए। आयात पर भारत जितना पैसा खर्च करता है यदि उसमें कमी होगी तो राष्ट्र स्वयं मजबूत एवं संपन्न होता जायेगा। जबसे श्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्राी पद की शपथ ली है तभी से उनमें इतना आत्म विश्वास है कि वे भारत को विश्व गुरु बना सकते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि देश उस दिशा में आगे बढ़ भी रहा है। शपथ ग्रहण के समय उन्होंने अपने पड़ोसी देशों को आमंत्रित कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे अपने पड़ोसियों से दोस्ताना संबंध चाहते हैं। उनका स्पष्ट रूप से मानना है कि वे न किसी को आंख दिखाना चाहते हैं और न ही किसी के सामने आंख झुकाना चाहते हैं। भूटान, नेपाल एवं ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में उनकी उपस्थिति हर दृष्टि से शानदार रही।
    श्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली की महत्वपूर्ण खासियत यह है कि वे पश्चिमी देशों या अमेरिका के प्रभाव में आकर कोई भी काम नहीं कर रहे हैं। वे देश, आम आदमी एवं गरीबों के लिए काम करना चाहते हैं। इसी कारण उन्होंने गरीबों का एक लाख रुपये का बीमा कराने की प्रधानमंत्राी जन-धन योजना शुरू की है। देश में नये आंकड़े के अनुसार सात करोड़ के करीब गरीब परिवार हैं। परिवार के मुखिया के निधन पर परिवार के सदस्य बेसहारा हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अभाव के चलते परिवार न बिगड़े या किसी गलत रास्ते पर न जाये, बीमा इस मामले में निहायत ही मददगार साबित हो सकता है। उनकी कार्यप्रणाली का नतीजा है कि आज दुनिया के तमाम विकासशील देश भारत की तरफ आशा भरी नजरों से देखने लगे हैं और चाहते हैं कि भारत उनका नेतृत्व करे।
    प्रधानमंत्राी स्थानीय एवं बुनियादी समस्याओं पर बात करते हैं तो उसका मतलब यह नहीं कि वे अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय समस्याओं के संदर्भ में बात नहीं करते। अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति उनकी रुचि काफी गहरी है। भूटान, नेपाल एवं ब्रिक्स देशों की यात्रा से उन्होंने यह साबित भी किया है। एनडीए सरकार के अस्तित्व में आने के बाद तत्काल जिस तरह इराक का संकट आया उसका भी समाधान बहुत बेहतरीन तरीके से मोदी सरकार ने निकाला। अमेरिका जैसा देश यदि अपने यहां श्री नरेंद्र मोदी का बेसब्री से इंतजार कर रहा है तो इसका मतलब हुआ कि श्री नरेंद्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के भी माहिर खिलाड़ी हैं।
    हाल ही में समाप्त हुए संसद सत्रा की यदि बात की जाये तो वह काफी बेहतर रहा है। पिछले 10 वर्षों में संसद में लगातार अवरोधों और काम-काज के स्तर में गिरावट के बाद 16वीं लोकसभा का पहला बजट सत्रा (7 जुलाई – 14 अगस्त) पिछले दस वर्षों में सबसे उत्पादक (104 प्रतिशत) सत्रा रहा। गौर तलब है कि 2005 का मानसून सत्रा 110 प्रतिशत काम-काज के साथ सबसे अधिक उत्पादक सत्रा था।
    किसानों की समस्याओं के प्रति उन्होंने विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया है। उनके मन में इस बात की बेहद पीड़ा है कि आज हमारा किसान आत्म-हत्या क्यों करता है? वह साहूकार से कर्ज लेता है, कर्ज दे नहीं सकता, मर जाता है। बेटी की शादी है, साहूकार से कर्ज लेता है, कर्ज दे नहीं पाता, इस कारण उसका जीवन कष्ट में गुजरता है। इन गरीब परिवारों की रक्षा कौन करेगा? प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश को आगे ले जाने की सिर्फ दो ही पटरियां हैं – सुशासन एवं विकास। इन्हीं को लेकर हम चलना चाहते हैं। अगर कोई प्राइवेट नौकरी करता है तो कहता है कि मैं जॉब करता हूं, लेकिन जो सरकारी नौकरी करता है तो वह कहता है कि मैं सर्विस करता हूं। दोनों कमाते हैं लेकिन एक के लिए जॉब है तो दूसरे के लिए सर्विस। किन्तु उन्होंने साफ तौर पर कहा कि कहीं सर्विस शब्द ने अपनी ताकत खो तो नहीं दी। हमें इस भाव को पुनर्जीवित करना है और एक राष्ट्रीय चरित्रा के रूप में आगे ले जाना है।
    कुल मिलाकर एनडीए सरकार एवं प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जा सकता है कि वे सिर्फ नियमों, परंपराओं एवं संविधान की बदौलत ही सब कुछ कर लेने की बात नहीं सोचते हैं। वे चाहते हैं कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का सहयोग लेते हुए जितना अच्छे से अच्छा काम हो सकता है, उस दिशा में हमें आगे बढ़ना है। ऐसा भारत बनाना है जिसमें हर किसी में आत्म-विश्वास एवं सुरक्षा का भाव हो। भविष्य को लेकर किसी के मन में किसी प्रकार का असमंजस न हो। ‘सबका साथ – सबका विकास’ एवं ‘एक भारत – श्रेष्ठ भारत’ इस सरकार एवं प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी का मूल मंत्रा है। इस मंत्रा की बदौलत भारत निरंतर प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ता ही रहेगा।

    अरूण कुमार जैन
    अरूण कुमार जैन
    इंजीनियर लेखक राम-जन्मभूमि न्यास के ट्रस्टी हैं

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