सरकारी भूमि की रजिस्ट्रियों का गोरखधंधा

-प्रमोद भार्गव-

yuddhशिवपुरी। शिवपुरी नगर पालिका क्शेत्र में इन दिनों खाली पड़ी सरकारी भूमि की व्यक्तिगत रूप में रजिस्ट्रियां कराने का गोरखधंधा जोरों पर चल रहा है। ज्यादातर रजिस्ट्रियां उषा राजे चेरिटेबल ट्रस्ट द्वारा तय किए गए मुख्त्यारआम करा रहे हैं। इन राजिस्ट्रियों को सत्र व उच्च न्यायालय गलत साबित कर चुकी हैं। धोखाधड़ी करके बेचे गए इन भू-खंडों पर बने निर्माण भी अदालत के आदेश से तोड़े जा चुके हैं। बावजूद जिले के कलेक्टर समेत अन्य राजस्व अधिकारी न तो खाली पड़ी सरकारी जमीन की सुरक्शा करने को तैयार हैं और न ही स्थानीय स्तर पर जो भू-माफिया इन जमीनों को ट्रस्ट से साठगांठ करके बेचने में लगे हैं, उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं। इस कारण इन भूमाफियाओं के हौसले बुलंद हैं।

इस धोखाधड़ी से जुड़ा पहला मामला शिवशंकर गोयल को ट्रस्ट द्वारा बेची गई जमीन से जुड़ा है। ट्रस्ट ने पोहरी रोड पर 2293 वर्गफीट जमीन गोयल को बेची थी। इसी जमीन को गोयल ने दिलीप मुदगल को 2012 में बेच दिया था। यह भूखंड पोहरी रोड के केंद्र से 45 फीट छोड़कर बेचा था। किंतु बाद में मुख्त्यारआम अशोक मोहित ने इस भूखंड और सड़क के बीच स्थित सरकारी जमीन का 800 वर्ग फीट का टुकड़ा सुनील नायक को बेच दिया। इस भूखंड की रजिस्ट्री कराई तो सर्वे क्रमांक 1112 में थी,लेकिन कब्जा सरकारी सर्वे क्रमांक 1104 की भूमि पर दिया गया। क्रेता ने इस पर चार पक्की दुकानों का निर्माण भी कर लिया।

दिलीप मुद्गल ने सरकारी भूमि पर हुए इस निर्माण को एसडीएम कोर्ट में कानूनी चुनौती दी। पटवारी और आरआई द्वारा किए सीमांकन में ये दुकानें सरकारी पाई गईं। लेकिन ट्रस्ट का नाम जुड़ा होने के कारण राजस्व न्यायालय दुकानें तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। मजबूरन मुद्गल को तबके कलेक्टर आर के जैन के यहां सुनवाई का आवेदन लगाना पड़ा। कलेक्टर ने इन दुकानों की वास्तविक जानकारी नगर पालिका से मांगी। पालिका के जांच अधिकारियों ने भी दुकानों का निर्माण सरकारी भूमि पर होना पाया। लेकिन कलेक्टर जैन सच्चाई से अवगत होने के बावजूद ठोस कार्रवाही करने से बचते रहे। इस बीच उनका तबादला भी हो गया।

कोई ठोस पहल होते न देख मुद्गल ने जांच रिपोर्टों की सत्यप्रतिलिपियों व खसरे की नकलों के आधार पर उच्च न्यायालय ग्वालियर में याचिका लगा दी। हाईकोर्ट ने दास्तावेजों की समीक्शा के बाद कलेक्टर, शिवपुरी को आदेश दिया कि वह मामले का निराकरण दो सप्ताह के भीतर करते हुए, सरकारी भूमि पर बनी दुकानें तोड़े। इस स्पश्ट आदेश के बावजूद कलेक्टर ने मामले को ठंडे बास्ते में डाल दिया। तब मुद्गल ने हाईकोर्ट में अवमानना की याचिका दायर की। आखिरकार कोर्ट को सात दिन के भीतर उक्त अवैध निर्माण तोड़ने का सख्त आदेश देना पड़ा। इस आदेश के मिलने के बाद कलेक्टर राजीव चंद्र दुबे के निर्देश पर ये दुकानें तोड़ीं गईं। इसी तरह ट्रस्ट ने एक सरकारी भूखंड हाथीखाने में डीके सिंघल के सामने राठौर को बेच दिया। इस पर रोतोंरात निर्माण कर लिया गया। इस निर्माण को कमिशनर ग्वालियर केके खरे ने अवैध ठहराया और तुड़वा भी दिया।

इन दो भूखंडों को अवैध घोशित कर दिए जाने व तोड़ देने के बावजूद ट्रस्ट के मुख्त्यारआम सरकारी भूमि की रजिस्ट्री कराने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं। कुछ समय पहले अशोक मोहित ने पोहरी रोड की ही सरकारी जमीन पर एक और भूखंड ताराचंद्र राठौर को बेच दिया। जबकि बेची गई इसी भूमि को खुद अशोक मोहित ने डॉ. परशुराम शुक्ल विरही को कराई रजिस्ट्री में सरकारी बताया था। यह रजिस्ट्री 13.12.90 को हुई थी। इसका सर्वे क्रमांक 1011 है। लेकिन मोहित ने क्रेता ताराचंद्र को सरकारी भूमि की रजिस्ट्री कराकर खाली पड़ी सरकारी भूमि पर क्रेता को कब्जा देने की कोशिश की। इसका विरोध पड़ोसियों ने किया। नतीजतन अवैध कब्जा तत्काल रोक दिया। बाद में डॉ. अनुराग भार्गव ने इस धोखाधड़ी के खिलाफ अदालत की शरण ली। तृतीय अपर जिला न्यायाधीश कमर इकबाल खान ने सरकारी दस्तावेजों का निरीक्शण करने के बाद उक्त भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण करने पर रोक लगाने का स्थगन आदेश दे दिया। इस प्रकार की धोखाधड़ी के एक के बाद एक मामले सामने आने के बावजूद राजस्व विभाग इन अवैध राजिस्ट्रियों को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। और न ही सरकारी भूमि बेचने वालों के विरूद्ध कानूनी कार्रवाही करने का साहस जुटा पा रहे है। प्रशासन की यह चुप्पी नगर के अमन के लिए भविश्य में खतरनाक भी साबित हो सकती है।

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