पंजाब चुनाव पर इस बार भी हावी है ताकत, पैसा, शराब

गौतम चौधरी 

इस बार के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाली शिरोमणी अकाली दल नीत गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला है। जहां एक ओर अकाली गठबंधन निवर्तमान सरकार का नेतृत्व कर रही थी वही कांग्रेस पहले सरकार का नेतृत्व कर चुकी है। पंजाब में जिस कांग्रेस ने शासन किया उसके मुखिया पटियाला डैनेस्टी के वंशज कैप्टन अमरेन्द सिंह रहे हैं। पंजाब की जनता के लिए कांग्रेस का शासन कोई बहुत बढिया विकल्प नहीं था। इसलिए कुल मिलाकर अकाली भाजपा गठबंधन से ज्यादा बढिया स्थिति में इस बार कांग्रेस भी नहीं है। फिर कांग्रेस के केन्द्र की सरकार ने जो किया उसका भी प्रभाव पंजाब पर पड रहा है। इसलिए इस बार के चुनाव में आमने सामने के दोनों दल लगभग 19-20 की स्थिति में हैं। लेकिन चुनाव में जो सबसे महत्व की बात है वह यह है कि इस बार बहुजन समाज पार्टी को कितना मत प्राप्त होता है। चुनावी पंडितों का आकलन है कि बसपा को अगर 10 सीटें मिल जाती है तो फिर प्रदेश में अकालियों का भाजपा के साथ गठबंधन पर असर पडेगा। अगर बसपा को 10 प्रतिशत से ज्यादा मत मिलता है तो फिर पंजाब को भी बसपा प्रयोग भूमि बना सकती है। इस बार बहुजन समाज पार्टी ने प्रदेश के सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों पर अपने उम्मीदवार खडे किये हैं। एक चर्चा यह भी है कि शिरोमणी अकाली दल बसपाइयों को पैसा देकर चुनाव लडवा रहे हैं। यह कांग्रेस का उडाया गया अफवाह है या इसमें सत्यता है फिलहाल इसपर चर्चा करने से ज्यादा बढिया यह होगा कि बसपा को मिलने वाले मतों आकलन एवं उसके दूरगामी प्रभाव पर विचार किया जाये। हां बसपा जो वर्ग बसपा का बोट टारगेट है वह पंजाब में पारंपरिक रूप से कांग्रेस का मतदाता रहा है। अगर बसपा को दलित वोट मिलता है तो कांग्रेस को घाटा होगा। फिर जिस प्रकार कांग्रेस पार्टी में टिकट बटवारा को लेकर विवाद खडा हुआ उसका भी असर पंजाब चुनाव पर पडेगा। प्रेक्षक बताते हैं कि पंजाब में इस बार प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के लगभग 15 कार्यकर्ता चुनाव लडने का मन बनाये थे। सो टिकट बटवारे बाद कांग्रेस में जबरदस्त बवाल हुआ। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 40 बगी चुनाव मैदान में हैं।

दूसरी ओर चुनावी गणित भी कांग्रेस के पक्ष में नहीं दिखता है। सन 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत वोट मिली जबकि 37.09 प्रतिशत अकालियों को और 8.28 वोट भाजपा को मिली थी। सन् 2007 में अकालियों को 48 सीटें मिली और भाजपा 23 में से 19 सीटों पर विजयी रही। उस चुनाव में बसपा को भी 4.13 प्रतिशत वोट मिले। विगत लोग सभा चुनाव में कांग्रेस का पलडा भारी रहा प्रदेश में 40 प्रतिशत से ज्यादा मत प्राप्त कर 8 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा जमा लिया। सन 2009 के लोकसभा चुनाव में अकाली भाजपा को मात्र 05 सीटों पर ही संतोष करना पडा और प्रतिशत वोट घटकर 35 से नीचे चली गयी। अबकी बार समीकरण और गणित दोनों ही पार्टियों के लगभग बराबर है। लेकिन इस चुनाव में बादल का अपना भतिजा सरदार मनप्रीत बादल खेल बिगाड सकता है। उसकी पंजाब पीपुल पार्टी ने भी प्रदेश के कई सीटों पर मजबूत उम्मीदवार खडे किये हैं। हालांकि मनप्रीत बादल को भी प्रकाश सिंह बादल के लम्बे बिसात से जोडकर ही देखा जा रहा है लेकिन फिलहार अगर मनप्रीत की पार्टी को वोट मिलता है तो उसका खमियाजा गठबंधन को भी भुगतना पड सकता है। जानकार बताते हैं कि मनप्रीत बादल का प्रकाश सिंह बादल के परिवार से नहीं बनती है। सो मनप्रीत कांग्रेस के साथ जा सकते हैं। मनप्रीत की पार्टी अगर पांच सीटें जीतती है तो कांग्रेस सरकार बना सकती है जबकि बहुजन समाज पार्टी को सीटें आती है तो बादल सरकार बनाएंगे। फिलवक्त मनप्रीत की पार्टी पंथनिरपेक्ष रणनीति पर काम कर रही है जिसका खमियाजा कांग्रेस को भी भुगतना पड सकता है। मतप्रीत के आने से पंथनिरपेक्ष मतों में विभाजन होगा जिसका लाभ गठबंधन को मिल सकता है। यह लडाई भाजपा के लिए अहम लडाई है। इस बार भाजपा शत प्रतिशत सीट जीतने की योजना से मैदान में उतरी है लेकिन पार्टी को भीतरघात से खतरा है। पैठानकोट की सीट पर मास्टर मोहनलाल की टिकट काट दी गयी। यहां से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अश्‍वनी शर्मा को टिकट दिया गया है। विश्‍वस्थ सूचनाओं पर भरोसा करें तो अश्‍वनी शर्मा को हराने के लिए कुछ भाजपा के पदाधिकारी ही प्रतिपक्षियों को सहयोग कर रहे हैं। ऐसे पैठानकोट में शर्मा की स्थिति धीरे धीरे सुधर रही है। पैठानकोट में कांग्रेसी बागी खेल बिगाड रहे हैं। उधर लुधियाना से पार्टी ने पूर्व अध्यक्ष राजेन्द्र भंडारी को टिकट दिया है। यह सीट बटाला के बदले अकालियों ने भाजपा को सौंपा है। भंडारी पहले से ही विवादों में रहे है साथ ही उनको बागी अकाली वैस बंधुओं से मुकाबला करना पड रहा है जिसके कारण भंडारी की स्थिति कमजोर समझनी चाहिए। मनोरंजन कालिया के खिलाफ भी जबरदस्त अखाडेबाजी है, तो जिस सीट को भाजपा ने अकालियों को गिफ्ट किया है उस बटाला की सीट पर अकाली कमजोर साबित हो रहे हैं। ये कुछ ऐसे पहलू हैं जिससे प्रदेश भाजपा को दो चार होना पड रहा है बावजूद भाजपा के अधिकतर उम्मीदवार राजनीति के पुराने खिलाडी हैं। चुनाव कैसे जीती जाती है उन्हें पता है। फिलहाल उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई बडा मामला भी नहीं है। जनता पुराने मामले भुल चुकी है और अब केन्द्र सरकार के घोटालों की चर्चा हो रही है। भाजपा के कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के अरोप हैं लेकिन प्रेक्षकों की मानें तो भाजपा ने 15 ऐसे विधायकों को टिकट दिया है जिसकी स्थिति अपने क्षेत्र में अन्य दलों के उम्मीदवारों से ज्यादा ठीक है। जिसका लाभ भाजपा को मिलने वाली है। हां भाजपा ने जिस सीटों पर नया प्रयोग किया है वह सीट भाजपा के हाथौं से जा सकती है।

कुल मिलाकार देखा जाये तो एक बार फिर से इस चुनाव में पैसा, बांहुबल, नशा के कारोकार और पृथक्तावादी शक्तियों का गठजोड उभर कर सामने आया है जो पंजाब को आतंकवाद की चपेट में लेने की कोशिश में है। सीमा पार से जो खबरें आ रही है उसके भी संकेत अच्छे नहीं हैं। पाकिस्तान में पल रहे खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों के लिए वर्तमान समय करने मरने का है। इस आतंकियों के आका पाकिस्तानी जासूस उनके उपर दबाव बना रहे हैं। चुनाव में ये आतंकी बडी योजना के फिराक में हैं जिसका रास्ता पंजाब के पृथक्तावादियों ने तैयार किया है। हालांकि अभी चुनाव बांकी है और यह भी मुकम्मल पता नहीं कि ऊंट किस करवट बैठेगा लेकिन चुनावी पंडितो ने कांग्रेस के गिरते ग्राफ का ठिकडा कैप्टन अमरेंन्द्र पर फोडने का प्रयास किया है। केन्द्र की संप्रग सरकार को मीडिया क्लिंचिट दे रही है। उससे उस अनुमान को बल मिलता है कि प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है क्योंकि मीडिया का एक खास वर्ग कांग्रेस के अंदर सोनिया और उनके कुनवें को लगातार महिमा मंडित करती रही है। इस बार भी सोनिया की पंजाब चुनाव में सोनिया और मनमोहन सिंह की सभाओं के प्रति जनता का कोई आकर्षण नहीं दिखा लेकिन विगत दो दिनों से मीडिया कांग्रेस के पक्ष में हवा बनने लगी है। इससे भी इस अनुमान को बल मिलता है कि प्रदेश में कांग्रेस अपने नेतृत्व की कुशलता और विकल्प की परिकल्पना को सिद्ध करने में असफल है। कांग्रेस के अहम सूत्र इस बात से इन्कार नहीं करते कि कैप्टन की मनमानी से आलाकमान भी खफा है। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व प्रदेश में नये नेतृत्व की तलाश में है। जबतक कैप्टन नहीं निपटेंगे तब तक यह संभव नहीं है। कैप्टन हारे तो सोनिया कांग्रेस को कैप्टन से पीछा छुडाना और आसान हो जायेगा।

1 thought on “पंजाब चुनाव पर इस बार भी हावी है ताकत, पैसा, शराब

  1. ||ॐ साईं ॐ|| सबका मालिक एक है ,इसीलिए प्रकृति के नियम क़ानून सबके लिए एक है …
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    चुनाव पर इस बार भी हावी है ताकत, पैसा, शराब….इससे यह सिद्ध हो चुका है की देश के भ्रष्ट नेताओं की सोच के हिसाब से जंग,चुनाव और राजनीती में सब जायज है……
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    ऐसा कोई दल नहीं है देश में जो चुनाव जीतने के लिए ताकत ,शराब और पैसे का इस्तेमाल नहीं कर रहा है….अब फिर कोई चुनाव आयुक्त बोलने वाला है की ” इस देश का भगवान् ही मालिक है…..और देश की जनता को भी सुअरों की तरह है जो भ्रष्टाचार की गन्दगी से बाहर आना ही नहीं चाहती है…..यह भी एक कडुआ सत्य है ……७०% गरीब जनता है जिसमे से ३०% दबंगों और आतंकवादियों के दबाव में .२५% दारु के पाँव में और १५% पैसे के भाव में हराम खोर नेताओं को वोट दे देती है……इसीलिए भ्रष्टाचार कैंसर है…..नेता कहते है इसका कोई इलाज नहीं है…..ये सब ठीक वैसा ही है…जैसे सब जानते और मानते है की तम्बाखू से कैंसर होता है लोगो की जान चली जाती है…फिर भी जनता खाती है और साकार खिलाती है……और जनता को मिलता है कैंसर और भ्रष्टनेताओ और मंत्रियो को मिलता है पैसा …..गांधी बाबा का कांग्रेस को दिया फार्मूला “सर्वोदय” सफल हो गया | सबका उदय हो “गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर हजार गुना अमीर होता जा रहा है……..जबकि “सर्वोदय” केवल गरीबोदय” होना चाहिए…………
    सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार

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