राफेलः ईमानदार निकला चौकीदार

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प्रमोद भार्गव
तीन राज्यों में हार के अवसाद में डूबी भाजपा को राफेल विमान सौदे में सर्वोच्च न्यायालय के आए फैसले से बड़ी राहत मिली है। यह फैसला सरकार और विपक्ष दोनों के लिए संदेश देता है कि रक्षा और सामरिक महत्व से जुड़े संवेदनशील व गोपनीय विषयों को बिना किसी ठोस आधार के अदालत में ले जाना और राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दा बनाना उचित नहीं है। यहां तक की इस मुद्दे में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘चैकीदार चोर है‘ के लांक्षणों से नवाजा था। किंतु अब अदालत ने रफाल खरीद प्रक्रिया को काल्पनिक संदेहों से मुक्त कर परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी को ईमानदार घोषित कर दिया है। कांग्रेस और राहुल गांधी को भूलना नहीं चाहिए कि बोफोर्स तोपों की खरीद को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने राजीव गांधी पर इसी तरह के काल्पनिक भ्रष्टाचार के आरोप मढ़े थे। यहां तक कि यह मुद्दा उस समय इतना गरमाया था कि ‘गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है‘ का नारा गूंजने लगा था। विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक ने तो प्रश्न -पत्र में सवाल ही पूछ लिया था कि यह नारा किस नेता से जुड़ा है। नतीजतन कांग्रेसियों ने इस प्राध्यापक के चेहरे पर कालिख भी पोत दी थी। इस लिहाज से 36 लड़ाकू विमानों की इस खरीद पर बिना सबूत के सवाल उठाना गलत है। यह इसलिए भी अनुचित है, क्योंकि हमारे पड़ोसी देश रक्षा तैयारियों में हम से बहुत आगे निकलते जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भारत और फ्रांस के बीच विमान खरीदने के सौदे को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं रद्द कर दीं। अदालत ने कहा है कि सौदे को निरस्त करने के लिए इसके निर्णय लेने की प्रक्रिया पर वास्तव में संदेह करने का कोई ठोस आधार नहीं है। सौदे में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गेगोई, न्यायामूर्ति संजयकिशन एवं केएम जोसेफ ने सर्वसम्मति से इस खरीद में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने व शीर्ष अदालत की निगरानी में एसआईटी जांच की मांगें ठुकरा दीं।
मालूम हो, भारतीय वायुसेना के लिए 58,000 करोड़ रुपए की अनुमानित कीमत से 36 राफेल विमान खरीदने के लिए फ्रांस और भारत दोनों देशों की सरकारों के बीच अंतर-सरकारी समझौता हुआ था। याचिकाओं में न्यायालय के समक्ष मुख्य रूप से तीन मुद्दे उठाए गए थे। पहला, निर्णय लेने की प्रक्रिया, दूसरा, विमानों का मूल्य और तीसरा, भारतीय आफसेट साझीदार का चयन। पीठ ने खरीद से जुड़े दस्तावेजों की छानबीन के बाद कहा कि लड़ाकू विमान खरीदने जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अदालत के लिए हस्तक्षेप की तथा शक की गुंजाइश नहीं है। साथ ही ऐसे मामलों में अंधेरे में हाथ-पैर मारना और अंतहीन जांच व्यक्तिगत नजरिए का आधार नहीं हो सकता है। अदालत 126 विमानों की बजाय 36 विमान खरीदने के सरकार के फैसले की समीक्षा नहीं कर सकती है और विमान की कीमत तय करना भी न्यायालय का काम नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि सितंबर 2016 में जब सौदे को अंतिम रूप दिया गया था, तब इस पर सवाल क्यों नहीं उठाए गए ? सौदे पर सवाल उस समय उठे जब फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलांद ने बयान दिया। यह बयान न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हो सकता है।
फैसले के आने के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जब राहुल गांधी से इस मामले में सदन और देश से माफी मांगने की बात कही तो लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने संयुक्त संसदीय समिति से जांच की मांग कर डाली। दूसरी तरफ राहुल गांधी ने सौदे में भ्रष्टाचार के आरोपों को दोहराते हुए सदन में कैग की रिपोर्ट रखने की बात कही। साफ है, अभी भी यह लड़ाई प्रतिष्ठा का प्रश्न और सियासी लाभ का चुनावी जरिया बनी हुई हैं। सरकार जहां अदालत के निर्णय को अपनी जीत बता रही हैं, वहीं विपक्ष पलटवार पर उतारू है। जबकि अदालत के फैसले के बाद इस संवेदनशील मुद्दे पर विराम लग जाना चाहिए था। दरअसल हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को तीन बड़े राज्यों में जो सफलता मिली हैं, उसे वह 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भी भुनाना चाहती हैं।
दरअसल ओलांद ने मीडिया पार्ट नामक वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में कहा था कि 58000 करोड़ रुपए के इस सौदे के लिए भारत सरकार ने रिलाइंस डिफेंस का एकमात्र नाम सुझाया था। इस बयान के सार्वजनिक होने के तत्काल बाद ही फ्रांस की वर्तमान सरकार ने स्पष्ट किया कि भारत के औद्योगिक भागीदार के रूप में रिलाइंस के चयन में दोनों सरकारों की कोई भूमिका नहीं है। इस बाबत यूरोप एंड फाॅरेन अफेयर्स मंत्रालय ने भी सफाई दी है कि इस करार में भागीदार का चयन दासौ कंपनी ने ही किया था, न कि भारत सरकार ने। अब दासौ एविएशन कह रही है कि उसने ‘मेक इन इंडिया‘ के तहत रिलाइंस डिफेंस को अपना भागीदार बनाया है। इस साझेदारी से ही फरवरी 2017 में दासौ-रिलाइंस एयरोस्पेस लिमिटेड ज्वाइंट वेंचर तैयार हुआ है। नागपुर में फाॅल्कन-दासौ और रिलाइंस मिलकर विमान के औजारों के निर्माण के लिए संयंत्र लगाएंगें। इससे लगता है कि इस सौदे में महज रिलाइंस को भागीदार बना लेने से गड़बड़ी की आशंका नहीं जताई जा सकती है ? मूल्य को लेकर जरूर अभी भी रहस्य बना हुआ है। राहुल गांधी इसे ही भ्रष्टाचार का आधार बनाकर मुख्य मुद्दा बना रहे हैं। राहुल का कहना है कि सरकार प्रत्येक विमान 1670 करोड़ रुपए में खरीद रही है। जबकि यूपीए सरकार ने प्रत्येक विमान की कीमत 526 करोड़ रुपए तय की थी। मोदी सरकार यदि औपचारिक रूप से विमान की कीमत बताते तो यह मुद्दा यहीं थम जाएगा, लेकिन सरकार का तर्क है कि यदि लड़ाकू विमानों की सही कीमत बता दी गई तो शत्रु को उसकी मारक क्षमता और उससे जुड़े उपकरणों का अंदाजा लगाने में आसानी होगी। इसलिए इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। अदालत ने भी इस दलील को सहमति दी है। अलबत्ता वर्तमान समय में यह तय है कि कोई भी सौदा लंबे समय तक गोपनीय बना नहीं रह सकता है। लिहाजा सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह बीच का कोई ऐसा रास्ता निकालें, जिससे यह रक्षा सौदा अनावश्यक विवाद और सियासी फायदे का औजार नहीं बनने पाए ?
नरेंद्र मोदी ने 2016 में फ्रांस यात्रा के दौरान फ्रांसीसी कंपनी दासौ से 36 राफेल जंगी जहाजों का सौदा किया था, अर्से से अधर में लटका हुआ था। इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाने की पहल वायु सैनिकों को संजीवनी देकर उनका आत्मबल मजबूत करना है। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद और नरेंद्र मोदी से सीधे बातचीत ने इस सौदे को अंतिम रूप दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह और रक्षा मंत्री एके एंटनी की साख ईमानदार जरूर थी, लेकिन ऐसी ईमानदारी का क्या मतलब, जो जरूरी रक्षा हथियारों को खरीदने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाए ? जबकि ईमानदारी तो व्यक्ति को साहसी बनाने का काम करती है। हालांकि रक्षा उपकरणों की खरीदी से अनेक किंतु-परंतु जुड़े होते हैं,सो इस खरीद से भी जुड़ गए हैं। यह सही है कि जंगी जहाजों का जो सौदा हुआ है वह यूपीए सरकार द्वारा चलाई गई बातचीत की ही अंतिम परिणति है। इस खरीद प्रस्ताव के तहत 18 राफेल विमान फ्रांस से खरीदे जाने थे और फ्रांस के तकनीकी सहयोग से स्वेदेशीकरण को बढ़ावा देने की दृष्टि से 108 विमान भारत में ही बनाए जाने थे। स्वदेश में इन विमानों को बनाने का काम हिंदुस्तान एयरोनाॅटिक्स लिमिटेड ;एचएएलद्ध को करना था, ये शर्तें अब इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं। इससे मोदी के ‘मेक इन इंडिया‘ कार्यक्रम को धक्का लगा है। इन सब तोहमतों के बावजूद ये विमान खरीदना इसलिए जरूरी थे, क्योंकि हमारे लड़ाकू बेड़े में शामिल ज्यादातर विमान पुराने होने के कारण जर्जर हालत में हैं। अनेक विमानों की उड़ान अवधि समाप्त होने को है और पिछले 19 साल से कोई नया विमान नहीं खरीदा गया है। इन कारणों के चलते आए दिन जेटों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं सामने आ रही हैं। इन दुर्घटनाओं में वायु सैनिकों के बिना लड़े ही शहीद होने का सिलसिला बना हुआ है।शायद इसीलिए अदालत ने कहा भी है कि भारतीय वायुसेना में राफेल जैसे चैथी और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को शामिल करना बेहद जरूरी हैं, क्योंकि देश लड़ाकू विमानों के बिना नहीं रह सकता है।

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