बदले की राजनीति करती राजस्थान सरकार

राकेश कुमार आर्य

राजनीतिज्ञ चाहे कहने के लिए भले ही  यह कहें  कि उनके लिए देशहित पहले है , परंतु सच यह है कि  राजनीतिज्ञों के लिए  देश हित से पहले दलहित होता है । अब तो स्थिति यह हो गई है कि  इनका मानसिक स्तर  भी  परस्पर की गुत्थमगुत्था, गाली – गलौज,  ताने – उलहाने  और व्यंग्यबाणों से एक दूसरे को घायल करने की प्रवृत्ति के चलते  इतना निम्नस्तरीय हो चुका है  कि जब किसी प्रदेश से  किसी पार्टी की सत्ता का परिवर्तन होता है और दूसरी पार्टी उसके स्थान पर सत्ता संभालती है  या केंद्र में  सत्ता परिवर्तन होकर कोई दूसरी पार्टी  अपनी सरकार बनाती है तो वह  पहली सरकार के  राष्ट्रोपयोगी  निर्णयों की भी समीक्षा के नाम पर  निरस्तीकरण की कार्यवाही करती है । जिससे  देश के राष्ट्रवादी लोगों को  धक्का लगता है , परंतु इन्हें  राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादिता से कुछ लेना  देना नहीं है ।  राजनीतिज्ञों को तो अपने स्वार्थ साधने हैं और एक दूसरे को नीचा दिखाना है । इससे  भारत माता की  क्या स्थिति  होती होगी ? –  इसे सहज ही समझा जा सकता है । राजस्थान में कांग्रेस के सत्ता में आने के साथ ही बीजेपी द्वारा स्कूली शिक्षा में कथित भगवाकरण के अंतर्गत किए गए कार्यों को बदले जाने की तैयारियां की जा रही हैं ।प्रदेश की स्कूली शिक्षा में एक बार फिर भगवाकरण का मुद्दा छाया हुआ है । पिछली भाजपा सरकार में शिक्षा मंत्री रहे वासुदेव देवनानी पर कांग्रेस ने बार-बार शिक्षा के भगवाकरण करने के आरोप लगाए थे ।शिक्षा में पाठ्यक्रम, ड्रेस, सूर्य नमस्कार समेत कई ऐसे विषय रहे, जिन्हें लेकर विरोध भी किया गया ।लेकिन अब कांग्रेस के सत्ता में आने के साथ ही भाजपा द्वारा कथित भगवाकरण के अंतर्गत किए गए कार्यों को बदले जाने की तैयारियां की जा रही हैं । भाजपा सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री रहे वासुदेव के कई निर्णयों पर विपक्ष ने सड़क से लेकर सदन तक में विरोध दिखाया था ।ये ऐसे विषय थे जिन पर कांग्रेस की स्पष्ट रूप में  नाराजगी बनी रही । पाठ्यक्रम में परिवर्तन के आरोप समेत ऐसे कई विषय रहे जो भाजपा और कांग्रेस के बीच विरोध का कारण बने । भाजपा सरकार में देश प्रदेश के वीर-वीरांगनाओं को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया । महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद और सुभाषचंद्र बोस जैसे महापुरुषों के पाठ जोड़े गए । स्पष्ट है कि ऐसे महापुरुषों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करके अपने देश के गौरवपूर्ण क्रांतिकारी स्वतंत्रता आंदोलन का बोध कराना ही पिछली सरकार का मंतव्य था। इसके अतिरिक्त भारत की समृद्धिशाली सांस्कृतिक विरासत को बच्चों के कोमल मन में स्पष्टत: उकेरकर उन्हें भारत के बारे में सही जानकारी देना भी सरकारों का उद्देश्य होता है ,- यह हमारा संवैधानिक दायित्व भी है ।जिसे निभाना प्रत्येक सरकार के लिए अनिवार्य होता है  । परंतु हमारे देश में पहले दिन से संस्कृति गौरवबोध के प्रति सरकारी स्तर पर निराशा भाव का प्रदर्शन किया जाना ही सरकारी नीति का एक अंग बन गया ।  जिसके चलते कांग्रेस और उसके जैसे धर्मनिरपेक्ष दलों ने कभी भी  और कहीं भी भारतीय सांस्कृतिक गौरव बोध को प्रकट करने वाले पाठ्यक्रमों को स्कूलों में लगाने को प्राथमिकता नहीं दी। हिंदू महासभा और आरएसएस जैसे हिंदूवादी राजनीतिक दल या संगठन यदि भारतीय सांस्कृतिक गौरवबोध को प्रकट करने वाले किन्ही कार्यों को कहीं पर करते भी रहे तो उन कार्यों को कांग्रेस ने सदा ही उपेक्षित भाव से देखने का प्रयास किया । इतना ही नहीं  कांग्रेस ने इन दोनों संगठनों के कार्यों को देश विरोधी या हिंदू आतंकवाद को प्रोत्साहित करने वाले कार्यों की श्रेणी में रखने तक का राष्ट्रघाती कार्य भी किया । अपनी इसी सोच के अंतर्गत कांग्रेस ने अब राजस्थान में सत्ता संभालते ही पिछली भाजपा सरकार के अच्छे कार्यों की भी निरस्तीकरण की कार्यवाही आरंभ कर दी है।  जिसे उचित नहीं कहा जा सकता।  भाजपा शासनकाल मे पाठ्यक्रम से पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से जुड़े कुछ अंशों में काट-छांट को लेकर विवाद भी सामने आया था । एकीकरण वाले पाठ में पहले नेहरू के स्थान पर सरदार पटेल का चित्र छापने पर विवाद हुआ । अकबर महान के स्थान पर महाराणा प्रताप महान पढ़ाने का शुभारंभ हुआ ।पाठ्यक्रम में जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कश्मीर आंदोलन, पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्ममानव दर्शन, पूर्व सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन की पर्यावरण पर कविता, बीजेपी नेता मेनका गांधी, नानाजी देशमुख और वीर सावरकर जैसे महापुरुषों के नाम सम्मिलित किए गए ।संघ के द्वारा आदर्श माने जाने वाले भास्कराचार्य, आर्यभट्ट  और पन्ना धाय को पाठ्यक्रम में जोड़ा गया । पाठ्यक्रम में भगवद् गीता, योग, वंदे मातरम, सूर्य नमस्कार को भी जोड़ा गया ।इस प्रकार भाजपा की पिछली सरकार का यह सारा प्रयास शिक्षा का भारतीयकरण करना था ।जिसे कांग्रेस और उसके समर्थक दलों ने शिक्षा का ‘भगवाकरण’ कहकर पुकारा ।  ‘उगता भारत ‘ के एक प्रतिनिधिमंडल ने राजस्थान के महामहिम राज्यपाल श्री कल्याण सिंह को 22 जुलाई 2015 को एक ज्ञापन के माध्यम से अपने स्तर पर भी यह सुझाव दिया था कि शिक्षा का भारतीयकरण किया जाए और भारत के विद्यालयों में बहुत पहले पढ़ाई जाने वाली  ‘हमारे पूर्वज’ नामक पुस्तक के साथ-साथ  ‘नैतिक शिक्षा ‘ को भी लागू कराया जाए। जिससे कि हमारे बच्चों को उनके छात्र जीवन से ही अपने महापुरुषों के गौरवपूर्ण कार्यों की जानकारी मिलने लगे और उनके भीतर राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीयता की भावना को बलवती करने में हमें सहायता मिले । महामहिम राज्यपाल ने ‘ उगता भारत ‘ के इस सुझाव को गंभीरता से लिया था और जब 6 दिसंबर 2015 को ‘ उगता भारत’ का एक प्रतिनिधिमंडल पुनः महामहिम से मिला तो उस समय उन्होंने स्वयं अपने मुखारविंद से यह कहा था कि हमने आपके द्वारा दिए गए सुझाव के आधार पर पाठ्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन करा दिया है । इस पर न केवल हमें प्रसन्नता हुई थी बल्कि देश के प्रत्येक राष्ट्रवादी व्यक्ति को प्रसन्नता हुई होगी। क्योंकि यह महान कार्य कराया जाना इस देश के लिए बहुत ही अपेक्षित है ।देश के बच्चों को जब तक अपने महान इतिहास की महान परंपराओं और सांस्कृतिक गौरव बोध से परिचित नहीं कराया जाएगा – तब तक किसी भी प्रकार से देश का कल्याण संभव नहीं है  और देश की एकता और अखंडता को  खतरे में डालने वाली शक्तियों  पर लगाम लगाया जाना भी संभव नहीं है। नैतिक शिक्षा के लिए और बच्चों के भीतर अपनी योग परंपरा को मजबूती से स्थापित करने के उद्देश्य से राजस्थान की भाजपा सरकार और महामहिम राज्यपाल श्री कल्याण सिंह के सदप्रयासों से गीता को भी पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया । इसके अतिरिक्त अन्य वैदिक ऋषियों के जीवन चरित्र और उनके द्वारा वैदिक संस्कृति को मजबूत करने के उल्लेखनीय कार्यों को भी पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया । स्पष्ट है कि इससे देश की सांस्कृतिक एकता बलवती होनी अपेक्षित थी  । जिसके माध्यम से देश में राजनीतिक स्थिरता को लाने और पारस्परिक समरसता के भाव में वृद्धि करने में भी सहयोग मिलना अपेक्षित था । परंतु देश का  यह दुर्भाग्य ही है कि यहां पर एक सरकार जिस अच्छे कार्य का प्रयोग करती है उसके फल आने से पहले दूसरी सरकार आकर उसे बदल देती है। राजनीतिक दलों की इस प्रकार की प्रवृत्ति को हमारे लोकतंत्र की एक दुष्टतापूर्ण विसंगति ही कहा जाएगा।  विसंगति के शिकार होकर अब शिक्षा राज्य मंत्री गोविंदसिंह डोटासरा ने अधिकारियों को भी पहली बैठक में स्पष्ट कहा कि पिछली सरकार द्वारा किए गए निर्णयों में आरएसएस और भगवाकरण के एजेंडे के अंतर्गत किए गए कार्यों को बदला जाएगा । इससे पहले इनकी समीक्षा भी की जाएगी । अब बहुत संभव है  कि  ‘ प्रताप महान ‘ के स्थान पर ‘अकबर महान ‘  पढ़ाने की  कांग्रेसी सरकार  राजस्थान में फिर से तैयारी कर ले ।  इस प्रकार अपने एक महान योद्धा  जो स्वतंत्रता के लिए दर-दर भटकता रहा  और जंगल जंगल की खाक छानता रहा ,- के स्थान पर  उस क्रूर बादशाह को  राजस्थान  की वीर भूमि के  युवा पढ़ने के लिए अभिशप्त होंगे  जो  अपने पूरे जीवन काल में  हिंदू धर्म पर  अत्याचार करता रहा  और इस पवित्र भूमि को अपने अधीन करने के  सपने बुनता रहा । अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के  लिए उसे चाहे जितना खून बहाना पड़ा – उसने निसंकोच बहाया । आप अनुमान लगा सकते हैं कि  महान कौन है ? –  ऐसे अत्याचारी से लड़ने वाला , या वह व्यक्ति जो अत्याचार से लड़ने वाले  को  मारने की तैयारी कर रहा था या उसके धर्म और देश को मिटा कर उस पर अपनी संस्कृति को लादने का प्रयास कर रहा था ? ऐसे में बीजेपी सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री रहे वासुदेव देवनानी ने उचित ही कहा है कि कांग्रेस को पहले ये स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे प्रताप की जगह अकबर महान पढ़ाएंगे ?  उन्होंने कांग्रेस द्वारा लगाए आरोपों को नकारा है.सरकार को पूरी व्यवस्था के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए ।शिक्षाविदों का कहना है कि नई सरकार के द्वारा साइकिलों के रंग बदलने से तो नहीं, लेकिन एकाएक यूनिफॉर्म बदले जाने से अवश्य विद्यार्थियों के लिए समस्या आ सकती हैं । ऐसे में सरकार को पूरी व्यवस्था के पश्चात ही कोई निर्णय लेना चाहिए ।हमारा मानना है कि देश में राष्ट्रहित के निर्णयों पर एकमत होना राजनीतिक दलों के लिए अनिवार्य किए जाने संबंधी कानून संसद से पास होना चाहिए ।जब हमारे देश का संविधान यह स्पष्ट करता है कि भारत की सामासिक संस्कृति को बलवती करना और भारत के गौरवपूर्ण इतिहास का बोध करा कर भारत को विश्व गुरु के पद पर विराजमान कराना प्रत्येक भारतीय का पवित्र कर्तव्य होगा तो इस दिशा में  किये गए या किए जा रहे ऐसे किसी भी कार्य पर राजनीति क्यों की जाती है ? – यदि किसी भी सरकार के द्वारा लिए गए निर्णयों से भारत को विश्वगुरु के पद पर विराजमान कराने में सहायता मिल सकती है तो उसे दूसरी सरकार के लिए अनिवार्यता मानना कानूनी रूप से अनिवार्य घोषित की जाना चाहिए । बदले की राजनीति देश के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रही है। इस पर लगाम लगाया जाना समय की आवश्यकता है।

Leave a Reply

%d bloggers like this: