राजस्‍थान: धन को लेकर प्रबंधन और छात्रसंघ आमने-सामने

-राजीव शर्मा

राजस्थान में बीते महीने छात्रसंघों के चुनाव सम्पन्न हो गये। पूर्व चुनाव आयुक्त जे.एम लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरूप ये चुनाव पूर्ण हुये। चुनाबों में उम्मीदवारों और उनके दलों ने जम कर इन सिफारिशों की धज्जियाँ उडाई। चुनाव जीतने के बाद अब सरकारी और निजी दोनों ही महाविद्यालयों में चुने हुये छात्र प्रतिनिधियों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड रहा है। वही सभी को छात्रसंघों के नाम पर बसूली जाने वाली राशि के लिए हाथ पैर मारने पड रहे है। आलम ये है कि प्रवंधन और छात्रसंघ धन को लेकर आमने सामने हो गये है।

बीते माह की 25 तारीख को राजस्थान भर में छात्रसंघ के चुनाव सम्पन्न हुये। इससे पूर्व 4 अगस्त 2004 को चुनाव कराए गये थे। बीच की अवधि के 6 वर्ष प्रदेश भर में छात्रसंघों के चुनाव नहीं कराए गये। न्यायालय ने छात्रसंघों के चुनाबों पर रोक लगा दी थी। एक लम्बी लड़ाई के बाद कॉलेज परिसरों में लोकतंत्र की बहाली हो सकी। लेकिन ये छात्रसंघ अब काँलेज प्राचार्य और प्रवंधनों के लिए सिरदर्द बन रहे है। कॉलेज परिसरों को अपनी तानाशाही से चला रहे प्रवंधनों,प्राचार्यो को छात्रसंघ फूटी आंख नहीं भा रहे है। हालात इतने बदतर हो गये है कि इन चुने हुए प्रतिनिधियों को कॉलेज परिसरों में अपने बैठने तक के स्थानों को पाने के लिए सडक पर उतरना पड रहा है तो कुछ को भूख हडताल करने को मजबूर होना पड रहा हैं।

छात्रसंघों के लिए पृथक कक्ष उतना बडा मुददा नहीं है। इससे भी बडा मुद्दा है धन। महाविद्यालयों में सरकार की ओर से छात्रसंघों के लिए अलग से कोई मद निर्धारित नहीं है। ऐसे में छात्रसंघों के नाम पर विद्यार्थियों से राशि एकत्र की जाती है। इसी धन राशि से छात्रसंघ कुछ रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन करते है। इस सब के अलावा छात्रसंघ के पदाधिकारी अपने रूतबे के चलते महाविद्यालयों में अपने मर्जी से कुछ काम कराने में सफल हो जाते है। ऐसे में एक बडा सवाल तो यही है कि जब सरकारें महाविद्यालयों में छात्रसंघों का गठन कराती है तो उनके अधिकार क्षेत्र में कुछ बजट भी होना चाहिए जिससे कुछ गतिविधियों का संचालन छात्रसंघों के द्वारा अपनी मर्जी और रूचि के अनुसार किया जा सके। लेकिन ऐसा है नहीं। छात्रसंघ भी छात्रों से एकत्र धन के भरोसे ही जिंदा है। लगता है इस ओर कभी किसी ने ध्यान भी नहीं दिया है। वैसे सरकारें तो इस ओर ध्यान देगी भी क्यों?

प्रदेश में छात्रसंघों के चुनाव 6 वर्ष के बाद हुए है। इस बीच विद्यार्थियों की भी रूचि अपने अधिकारों के प्रति कुछ कम हुई है। हालात ये है कि अधिकांश चुने हुए प्रतिनिधियों को तो अभी तक ये ही मालुम नहीं है कि उनके अपने अधिकार क्या है? वो कौन कौन से कार्य है जिन्हें छात्रसंघ को विश्वास में लिए बगैर कॉलेज प्रशासन कर ही नहीं सकता है। जो प्रतिनिधि अभी चुन कर आये है उन्होंने खुद ने भी छात्रसंघों की कोई भी गतिविधि काँलेज परिसरों में कभी देखी नहीं हैं। यही कारण है कि स्वयं उनको ही नहीं पता कि उनके अधिकार और कर्तव्य क्या है? ऐसे में एक बडा सवाल ये खडा होता है कि जब पंचायतीराज से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के प्रतिनिधियों को उनके दल, सरकार के द्वारा प्रशिक्षण कराये जाते है तो ऐसी व्यवस्था छात्रसंघों के लिए क्यों नहीं? ये बात उस समय तो और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जबकि छात्रसंघों के चुनाव 6 वर्ष के अन्तराल के बाद कराए गये हों। लगता है राजनीति की पहली पाठशाला के प्रति ऐसी सोच किसी की भी कभी बन ही नहीं पाई है।

इस बार चुनाव हो जाने पर निरकुंश कालेज प्रशासनों के सामने सबसे बडा संकट छात्रसंघों के नाम पर एकत्र की जाति रही राशि को लेकर खडा हो रहा है।

चुने हुये छात्रसंघ प्रतिनिधियों के द्वारा गत पाँच बर्षो की राशि का हिसाब माँगा जा रहा है। वही काँलेज प्रशासन उन्हें केवल वर्तमान सत्र की राशि की जानकारी देकर टाल रहा है। विवाद का सबसे बडा कारण यही बन रहा है।

छात्रसंघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि जब गत बर्षो में चुनाव ही नहीं हुए तो छात्रसंघों के नाम पर एकत्र की गई राशि को खर्च कहाँ किया गया,जबकि विद्यार्थियों से लगातार ये राशि ली जाती रही है। अब जबकि चुना हुआ छात्रसंघ है तो उसका उस पूरी राशि पर अधिकार बनता है जिसे छात्रसंघों के नाम पर कॉलेज प्रशासन एकत्र करता रहा है। वही काँलेज प्रवंधकों के पास उस राशि के बारे में स्पष्ट कहने को तो कोई जबाब नहीं है। वो इतना ही कहकर बात को टालने की कोशिश कर रहे है कि आपकों उससे क्या मतलब है आप तो इस सत्र की राशि के ही हकदार है। इतना ही नहीं एक कन्या महाविद्यालय ने तो बाकायदा एक सत्र की राशि को 14250 रूपए बताते हुये पत्र भी जारी कर दिया है। उसमें से भी 3541 रूप्ये का खर्चा चुनाव कराने पर खर्च बता दिया है। अब छात्रासंघ के पास 10 हजार रूप्ये है छात्रासंघ को चलाने के लिए।

इस महाविद्यालय की छात्रासंघ अध्यक्ष सुमन पटेल से जब हमने बात की तो उसका कहना था कि वो प्रबंधन से शेष पाँच वर्षों की धनराशि का भी हिसाब लेकर रहेगी। इसके लिए उसे सड़क पर आना पडा तो भी कोई दिक्कत नहीं है। सुमन पटेल का तो यहाँ तक कहना है कि छात्रासंघ की ही राशि नहीं छात्राओं से दूसरे अन्य मदों में ली गई राशि का भी वो हिसाब लेगी। उसका कहना था कि उसका महाविद्यालय स्वास्थ्य परीक्षण, स्मारिका प्रकाशन, वार्षिक उत्सब के नाम पर छात्राओं से मोटी राशि बसूलता चला आ रहा है जबकि ऐसा कोई आयोजन कभी उसके महाविद्यालय प्रशासन के द्वारा नहीं किया गया है। ऐसे में निर्वाचित छात्रसंघ की जिम्मेदारी बनती है कि वो छात्राओं के लिए उपयोगी इन सभी रचनात्मक कार्यो को पूर्ण कराये। तेबर देखने में तो लगता है छात्रासंघ अध्यक्ष सुमन पटेल संघर्ष करने की तैयारी कर चुकी है। लेकिन शिक्षण संस्थानों के नाम पर दुकान चला रहे लोगों से कुछ काम करा पाना उनके लिए इतना सरल दिखाई नहीं पड़ रहा है। जो प्रबंधन शुद्ध रूप से छात्रसंघ के नाम पर एकत्र राशि का हिसाब देने में आनाकानी कर रहा है वो और मदों को खर्च करेगा ऐसा लगता नहीं है।

भरतपुर जिला मुख्यालय पर स्थित रामेश्वरी देवी कन्या महाविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्ष योगेश चौधरी की परेशानी फिलहाल दूसरी है। योगेश चौधरी का कहना है कि उसके महाविद्यालय में वर्ष 2004 तक छात्रासंघ के लिए पृथक कक्ष की व्यवस्था हुआ करती थी। इस बार उन्हें अभी तक वो कक्ष उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। योगेश चौधरी का कहना है कि इतना ही नहीं प्राचार्य उसके साथ असहयोग व अमर्यादित व्यवहार कर रहे है। योगेश चौधरी ने तो जिला कलक्टर और कुलपति सहित स्थानीय विधायकों तक अपनी शिकायत दर्ज करा दी है।

एक और छात्रसंघ अध्यक्ष रामनिवास गुर्जर का कहना है कि उसके महाविद्यालय द्वारा भी उसे चालू शिक्षण सत्र की ही राशि के बारे में जानकारी दी गई है। रामनिवास गुर्जर भी आन्दोलन करने के बारे में गंभीरता से विचार विमर्श कर रहे है।ऐसे हालात कमोबेश पूरे राजस्थान भर में उभर कर सामने आ रहे है जहाँ महाविद्यालय प्रवंधन और चुने हुये छात्रसंघ प्रतिनिधियों के बीच रोजाना तू तू में में की बात आम हो गई है। इस पूरे प्रकरण पर हमने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश उपाध्यक्ष सुनील चतुर्वेदी से बात की तो उनका कहना था कि ये सच है कि एक लम्बे अन्तराल के बाद छात्रसंघों के चुनाव हुये है जिससे दोनों ही पक्षों को एक दूसरे को समझने में परेशानी हो रही है। लेकिन धन को लेकर प्रबंधन की आपत्तियाँ अनुचित है। उन्हें चाहिये कि वो छात्रसंघों को विद्यार्थियों से एकत्र की गई राशि सुपुर्द कर दें। चतुर्वेदी इसके साथ एक बात की ओर और इशारा कर रहे थे।

उनके अनुसार अधिकांश उन छात्रसंघों के समक्ष दिक्कतें आ रही है जो सत्ताद्यारी दल के विरोधी छात्रसंघों के बैनर से जीत कर आये है। उनका तो यहाँ तक कहना था कि महाविद्यालयों की तो बात छोड दी जाये राजस्थान वि’वविद्यालय तक में जहाँ एबीवीपी का छात्रसंघ अध्यक्ष है उसे अभी तक कक्ष उपलब्ध नहीं कराया गया है।

अभी छात्रसंघों के गठन को एक महीना ही गुजरा है। आगे ये देखना बडा दिलचस्प होगा कि लोकतंत्र की पहली पाठशाला कहे जाने वाने छात्रसंघ कितना संघर्ष कर पाते है। वैसे प्रदेश में शिक्षा के निजीकरण ने उसे जिस प्रकार व्यापारियों के हाथों में सौंप दिया है उससे तो लगता है कि छात्रसंघ भी अप्रसांगिक होकर ही रह जायेगें। अभी तक के हालात तो ऐसी ही कहानी बयान कर रहे है। आगे भविष्य के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि कहते ‘जिस ओर जबानी चलती उस ओर जमाना चलता है’।

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