लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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आजका ख़बार पढ़ लो
खून से लथपथ पड़ा है,
शाम को समाचार सुन लो
बयानबाज़ी से पटा है
ज़रा ज़रा सी बात पर
किसीने किसी को डसा है,
हर वारदात के पीछे
कोई  नकोई दल घुसा है।
छुरा घोंपा गोलीमारी,
रोज़ का किस्सा हुआ है
गाय भैसों की रक्षा मे
आदमी की जान लेलो
ये भला कौनसे धर्म में लिखा है
पत्थरों से वार करलो,
पीट कर ही मार डालो
कौनसे धर्म का  घिनौना
रूप हमने नहीं देखा।
लूटपाट मारकाट
बलात्कार और क़त्ल की
ख़बरे नहीं अब सुनी जाती,
कैसे जीते होंगे वो,
जिन्होने ये सब सहा है।
एक निर्भया के लिये
मोमबत्तियां जली थी
उसके आगे पीछे भी कई
निर्भया मरीं थी
एक अन्ना की गुहार पर
दिल्ली डटी थी
भ्रष्टचार  की जडे इतनी
गहरी हुई हैं,
अन्ना की ही जड़े खोदी
नेताओं की जेबें भरी है
मयावती, लालू हों या
नेहरू गाँधी वादरा
परिवार हो
इनकी संपति जायज़ है
ये हमें कैसे स्वीकार हो।
कोई किसी को नहीं भी यहां
जेल क्यों भेजेगा भला
क्योंकि तेरी जो कहानी
मेरी भी वही कहानी
आज तेरी सत्ता है
कल वी मेरी होगी
आज तू मुझे बचाले
कल मैं तुझे बचालूंगा
हमारी लड़ाई तो बस
एक दिखावा है
जनता को गुमराह
करने के लिये
सिर्फ एक तमाशा है।

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