अकबर का इस्तीफा देर से लिया सही फैसला है

विवेक कुमार पाठक

19 महिला पत्रकारों के यौन शोषण का आरोप आखिरकार केन्द्र की मोदी सरकार पर भारी पड़ गया। आरोपों की शुरुआत में जो भारतीय जनता पार्टी 10 दिन से गुड़ खाए बैठी थी वो आखिर आरोप लगाने वाली महिलाओं की बढ़ती संख्या से तनाव में आती चली गई। आखिर अकबर का वतन लौटकर मानहानि का दावा ठोंकने और इसे राजनैतिक षड़यंत्र बताने का दावा फुस्स पटाखा साबित हो गया और दो दिन में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने अकबर से अपने हाथ हटा लिए। आनन फानन में केन्द्रीय मंत्रीमंडल से विदेश राज्य मंत्री के पद से एम जे अकबर को इस्तीफा देना पड़ा।
मोदी कैबीनेट से अकबर का इस्तीफा होने के फौरन बाद ही बताना शुरु हो गया है कि पीएम नरेन्द्र मोदी महिला वोटरों को नाराज नहीं करना चाहते थे और मीटू कैम्पेन के जरिए सामने आ रहीं महिलाओं को न्याय दिलाने का समर्थन करते हैं। इस सरकारी और सत्ताधारी दल के राग के बाबजूद इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी सरकार ने इस लेटलतीफी में काफी हद तक फजीती करा ली है।
मीटू कैम्पेन #MeeToo के जरिए जब भारत में यौन शोषण के खुलासे होने शुरु हुए तो दो चार फिल्मी हस्तियों के बाद मोदी सरकार भी इससे बच नहीं सकी थी। सरकार के विदेश राज्य मंत्री और देश के नामी संपादकों में शुमार रहे एम जे अकबर पर उनकी पुरानी अधीनस्थ पत्रकार प्रिया रमानी, गजाला बहाव, मजली डै आदि ने यौन शोषण के आरोप लगा दिए।
महिला पत्रकारों ने अकबर पर जिस तरह के आरोप लगाए थे वो बहुत ही गंभीर किस्म के थे साथ ही कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ किन तरीकों से शोषण हो रहे हैं इस बात को उजागर करते थे।
मोदी सरकार ने इन गंभीर आरोपों के बाबजूद भी शुरुआत में मंत्री एम. जे. अकबर के प्रति उतना कड़ा रवैया नहीं दिखाया जिसका आरोप लगाने वाली महिलाएं और उनसे सहानुभूति रखने वाला जनसमुदाय उम्मीद कर रहा था।
अकबर के विदेश दौरे पर होने की बात कहकर मामले में अकबर को तलब करने को लटकाया गया। अकबर गंभीर यौन शोषण के अनेक आरोप लगे होने के बाबजूद विदेश में भारतीय लोकतंत्र के प्रतिनिधि बने रहे और भारत सरकार की हैसीयत से सम्मान पाते रहे।
यौन शोषण से जुडे़े इस अहम मसले पर बीजेपी का लेटलतीफ रवैया कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। अकबर पर बीजेपी की कई दिनों तक चुप्पी सवाल खड़े करती है साथ ही इससे महिलाओं के साथ खड़े आमजनमानस में सरकार की पिछले कुछ दिनों में कुछ हद तक विपरीत छवि बनी भी है।
बेशक ये केवल अभी आरोप ही हैं और आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार न तो एफआईआर दर्ज करवा पाई हैैं और अकबर के खिलाफ किसी तरह के सबूतों पर भी अब तक खुलासा नहीं हुआ है मगर फिर भी इन आरोपों को हलके में नहीं लिया जा सकता।
अगर ऐसा संभव होता तो मोदी कैबीनेट से अमित शाह के करीबी और हाईप्रोफाइल मंत्री एम. जे. अकबर को आखिरकार इस्तीफा नहीं देना पड़ता।

सरकार ने इस्तीफा लेकर या अकबर ने इस्तीफा देकर देश भर में चर्चा में छाए इस मुद्दे पर डैमेज कंट्रोल की कोशिश जरुर की है मगर आरोपों से इस्तीफे के बीच जितने दिन गुजरे हैं उनसे महिलाओं के साथ वाली मोदी सरकार की छवि को धक्का जरुर लगा है।

मौके पर अकबर के बहाने कांग्रेस ने मोदी सरकार और पूरी भाजपा को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। इस मामले में देश के विभिन्न बुद्धिजीवियों ने भी पीड़ित महिलाओं के पक्ष में बयान दिए हैं तो नामी संपादकों और अखबारों ने एम जे अकबर पर लगे आरोपों को समर्थन देतीं कई विस्तृत घटनाओं को सोशल मीडिया पर उजागर किया है। नामी पत्रकारों और संपादकों के इन कई खुलासों को देश के लोग कैसे नकार सकते हैं।
इस मामले में सरकार पिछले कुछ दिनों में हर मोर्च पर घिरी है। मोदी कैबीनेट की महिला मंत्रियों को मीडिया के सवालों से बचकर निकलने वाले दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे तो भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा तक को भी उपलब्धियों पर बोलने के बीच अकबर पर सवाल किए जाने पर मौन रहकर निकलना पड़ा।
सरकार को चैतरफा फंसते देख केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने जरुर मीटू कैम्पेन का समर्थन किया था मगर स्मृति ईरानी सरीखीं मोदी की करीबी मंत्री अकबर को लेकर सरकार को हमलों से बचाने लगभग नाकामयाब ही रहीं थीं। इस बीच भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने राजमाता विजयाराजे सिंधिया की जयंती कार्यक्रम के दौरान पीड़ित महिलाओं पर ही सवालिया निशान लगा दिया था। उन्होंने इस्तीफा मांगने का काम कांग्रेस के हवाले किया था जो उन्हीं की बात के जवाब में कहा जाए तो कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल और महिला समूह सरकार को घेरने में कामयाब रहे हैं। आखिरकार महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के मुद्दे पर पैबंद से लग रहे मंत्री एम जे अकबर से इस्तीफा लेने में ही पार्टी ने भलाई और अगले चुनाव में सुरक्षित भविष्य समझा। कैबीनेट से इस इस्तीफे के बाद अकबर को लेकर क्सरकार के बाद भाजपा भी घिरती नजर आएगी ये देखना दिलचस्प होगा।

1 thought on “अकबर का इस्तीफा देर से लिया सही फैसला है

  1. चप्पलें सस्ती हैं विवेक कुमार पाठक जी वनवासी को थोड़ा ज्ञान और थोड़ी मेहनत की सीख देने के बाद स्वयं खुद खरीदी चप्पल पहन अब फिर से प्रवक्ता.कॉम पर अकबर की छड़ी लिए आ धमके हैं| उन्हें कौन बताए कि जिस छड़ी से केंद्र में मोदी सरकार को पीटने आए हैं वह छड़ी कांग्रेस राज की प्रतीक है| तिस पर मुझे इस बात का गर्व है कि युगपुरुष मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शासन से प्रभावित मोबाशर जावेद अकबर ने स्वयं अपने पद से त्यागपत्र दे उन पर लगे दोष को न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से निपटाने का विचार बनाया है|

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